कुछ इतिहास चोर आजकल गज–लक्ष्मी की प्राचीन मूर्तियों को “महा माया” की प्रतिमा बताने का भ्रम फैलाते हैं। परंतु तथ्य और अभिलेख उनके इस झूठे प्रचार की पूरी तरह पोल खोल देते हैं।
कुछ लोग गज लक्ष्मी प्रतिमा को महामाया की प्रतिमा बता रहे हैं। बौद्ध शिल्प कला में महामाया जी का शिल्पांकन है, जहां बुद्ध अवतरण दर्शाया गया हैं। पहली प्रतिमा गज लक्ष्मी जी और दूसरी प्रतिमा महामाया जी की यहां नीचे देख सकते हैं।


ऐतिहासिक प्रमाण:
मथुरा के मिर्जापुर गाँव से प्राप्त एक अत्यंत प्राचीन अभिलेख (150 ईसा पूर्व – 100 ईस्वी के बीच) में स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलता है कि एक ब्राह्मण ने “श्री” अर्थात लक्ष्मी देवी की प्रतिमा स्थापित की थी।
यह अभिलेख आज मथुरा संग्रहालय में सुरक्षित है। इसमें “ब्राह्मण” और “श्री” शब्दों का प्रयोग बार–बार हुआ है, जो यह सिद्ध करता है कि उस काल में “श्री” यानी लक्ष्मी की पूजा स्थापित और सम्मानित रूप में होती थी। जबकि इन फर्जी बौद्धों के पास एक ढेला भर प्रमाण नहीं है कि गज लक्ष्मी ही महामाया हैं।


यह शिलालेख “History of Early Stone Sculpture at Mathura” (CA. 150 BCE – 100 CE, fig. no. 216) में भी दर्ज है।
विद्वानों जैसे R.C. शर्मा ने भी यह स्पष्ट करते है लिपि गत विशेषता के चलते यह अभिलेख कुशाण काल से भी पूर्व का है, और “श्री” शब्द यहाँ देवी लक्ष्मी के लिए प्रयुक्त हुआ है।
निष्कर्ष:
इस प्रमाण के बाद कोई संदेह नहीं रह जाता कि —
> “श्री” अथवा लक्ष्मी देवी की पूजा वैदिक और उत्तरवैदिक काल से ही हिन्दू समाज में प्रचलित थी,
उनकी पृथक मूर्तियाँ स्थापित की जाती थीं,
और उन्हें धन, ऐश्वर्य और समृद्धि की अधिष्ठात्री देवी माना जाता था।
गज–लक्ष्मी की प्रतिमा का मूल अर्थ ‘समृद्धि का आगमन’ है — दो गज (हाथी) ऊपर से जल बरसा रहे हैं, जो वर्षा, उर्वरता और सौभाग्य का प्रतीक है।
यह बौद्ध नहीं, बल्कि शुद्ध वैदिक–वैष्णव परंपरा का प्रतीक चिन्ह है।
जो लोग इन मूर्तियों को “महामाया” बताकर इतिहास को तोड़–मरोड़ कर पेश करते हैं, वे न तो पुरालेख पढ़ सकते हैं, न उनके संदर्भ समझते हैं।
इतिहास दस्तावेजों से तय होता है, कल्पना से नहीं।
📖 संदर्भ:
History Of Early Stone Sculpture At Mathura, ca. 150 BCE – 100 CE, fig. no. 216
R.C. Sharma, “New Inscriptions from Mathura”, Government Museum Mathura



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