कुछ ऑनलाइन वामपंथी न्यूज़ पोर्टल और तथाकथित इतिहासकार भगत सिंह को वीर सावरकर के ख़िलाफ़ खड़ा करने की कोशिश करते हैं,जबकि सत्य यह है कि सावरकर के खिलाफ कभी नहीं थे।
1924 में उन्होंने ‘मतवाला’ पत्रिका में ‘विश्वप्रेम’ नामक लेख लिखा जिसमें उन्होंने सावरकर की प्रशंसा करते हुए उन्हें ‘वीर’ कहा।
भगत सिंह लेख में लिखते हैं कि-
“विश्वप्रेमी वह वीर है जिसे भीषण विप्लववादी, कट्टर अराजकतावादी कहने में हम लोग तनिक भी लज्जा नहीं समझते वही वीर सावरकर। विश्वप्रेम की तरंग में आकर घास पर चलते-चलते रुक जाते कि कोमल घास पैरों तले मसली जायेगी।”

1928 में भगत सिंह ने किरती पत्रिका में एक लेख लिखा जिसमें उन्होंने मदन लाल ढींगरा और सावरकर के बीच के संबंधों का वर्णन किया।उसमें भी भगत सिंह ने सावरकर की प्रशंसा की,उन्हें वीर सावरकर कहा।
भगत सिंह लिखते हैं कि-
“1 जुलाई, 1909 को इम्पीरियल इंस्टीच्यूट के जहाँगीर हॉल में एक बैठक थी। सर कर्जन बायली भी वहाँ गये हुए थे। वे दो और लोगों से बातें कर रहे थे कि अचानक ढींगरा ने पिस्तौल निकालकर उनके मुँह की ओर तान दीं। कर्जन साहिब की डर के मारे चीख निकल गयी, लेकिन कोई इन्तज़ाम होने से पहले ही मदनलाल ने दो गोलियाँ उनके सीने में मारकर उन्हें सदा की नींद सुला दिया। फिर कुछ संघर्ष के बाद वे पकड़े गये। बस फिर क्या था, दुनियाभर में सनसनी मच गयी। सब लोग उन्हें जी-भरकर गालियाँ देने लगे। उनके पिता ने पंजाब से तार भेजकर कहा कि ऐसे बागी, विद्रोही और हत्यारे आदमी को मैं अपना पुत्र मानने से इन्कार करता हूँ। भारतवासियों ने बड़ी बैठकें कीं। बड़े-बड़े भाषण हुए। बड़े-बड़े प्रस्ताव पास हुए। सब उनकी निन्दा में।पर उस समय भी एक सावरकर वीर थे, जिन्होंने खुल्लमखुल्ला उनका पक्ष लिया।”


भगत सिंह के सहयोगी भगवतीचरण वोहरा ने अप्रैल 1928 में 1857 के विद्रोह पर लेख लिखा था, उस समय भगत सिंह किरती के संपादक थे, यहां हमें सावरकर का उल्लेख मिलता है।इस लेख में वीर सावरकर की पुस्तक 1857 की आजादी की जंग का इतिहास’ (The history of the Indian war of Independence of 1857) कि प्रशंसा कि गई।
लेख का अंश इस प्रकार है –
“जहाँ तक हमें पता है, इस आज़ादी की जंग का एकमात्र स्वतन्त्र इतिहास लिखा गया, जोकि बैरिस्टर सावरकर ने लिखा था और जिसका नाम ‘1857 की आजादी की जंग का इतिहास’ (The history of the Indian war of Independence of 1857) था। यह इतिहास बड़े परिश्रम से लिखा गया था और इण्डिया ऑफिस की लाइब्रेरी से छान-बीनकर, कई उद्धरण दे-देकर सिद्ध किया गया था कि यह राष्ट्रीय संग्राम था और अंग्रेजों के राज से आजाद होने के लिए लड़ा गया था। लेकिन अत्याचारी सरकार ने इसे छपने ही नहीं दिया और अग्रिम रूप से ज़ब्त कर लिया। इस तरह लोग सच्चे हालात पढ़ने से वंचित रह गये।”



एम.एम. जुनेजा द्वारा लिखित भगत सिंह की जीवनी में ,लाइब्रेरियन राजा राम शास्त्री के संस्मरण का एक अंश है। जिसके अनुसार भगत सिंह उस लाइब्रेरी के आगंतुकों में से एक थे जो उस समय वीर सावरकर की प्रकाशित पुस्तक ‘1857, प्रथम स्वतंत्रता संग्राम’पढ़ा करते थे।एम.एम जुनेजा कि इसी पुस्तक में यह भी लिखा है कि भगत सिंह वीर सावरकर के साहसिक कदम से प्रभावित थे।


सावरकर के श्रद्धानंद में प्रकाशित एक लेख जिसका शीर्षक था “आतंक के असली अर्थ” को भगत सिंह और उनके साथियों ने मई 1928 में किरती में प्रकाशित किया था।


सावरकर की पुस्तक ‘1857, प्रथम स्वतंत्रता संग्राम’ का चौथा संस्करण भगत सिंह द्वारा प्रकाशित किया गया था।

भगत सिंह ने अपने जेल डायरी में सावरकर की पुस्तक हिंदू पदपादशाही से पंक्तियाँ उद्धृत की हैं।

निष्कर्ष
सभी संदर्भ से स्पष्ट होता है कि भगत सिंह, वीर सावरकर के खिलाफ नहीं थे।ऐसे प्रमाण है जहां भगत सिंह वीर सावरकर की प्रशंसा करते हैं।अतः वामपंथीयो द्वारा यह झूठ इसलिए फैलाया गया ताकि वीर सावरकर की गलत छवि स्थापित कि जाए सके।



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