वामपंथीयो ने भारत में बहुत लंबे समय से यह प्रोपोगेंडा फैलाते हैं कि अंग्रेज अगर न होते तो भारत में रेल्वे न होता।अंग्रेजो ने भारत को रेल्वे दिया जो भारत के लिए एक उपहार है।इस प्रपोगेंडा को बहुत से लोग सच भी मान लेते हैं।लेकिन तथ्य बिल्कुल अलग है।आज हमे इन्हीं तथ्यों पर बात करेंगे।
भारत में रेल्वे लाने के पीछे ब्रिटिशर का उद्देश्य
भारत रेलवे की कल्पना सबसे पहले ईस्ट इंडिया कंपनी ने की थी। लेकिन् भारत में रेल्वे लाने का विचार भारत के लोगों के लिए नहीं था।बल्कि रेल्वे के माध्यम से भारत के संसाधनों की लूट करना था।रेल्वे के माध्यम से कोयला सहित अन्य खनिज संसाधनो का टांसपोर्ट करना था।जिससे ब्रिटिश प्रशासन ज्यादा धन कमा सके और भारत के खनिज संपदा की लूट कर सके।
ब्रिटिश सरकार के प्रति उठ रहे विद्रोह दबाने के लिए सेना और सैन्य उपकरणों की आवाजाही आसान करना भी उद्देश्य था।भारतीय पर कर बढ़ाकर उसे सीधे तौर पर ब्रिटिश लोगों को लाभ देना था।कोयला, लौह अयस्क, कपास इत्यादि को बंदरगाहों तक पहुंचाना था, ताकि अंग्रेज़ अपने कारखानों में इस्तेमाल के लिए इन्हें अपने देश भेज सकें।संसाधनों की चोरी, क्योंकि रोड मार्ग से बड़े पैमाने पर संसाधनों का ट्रांसपोर्ट संभव नहीं था।
गवर्नर जनरल लॉर्ड हार्डिंग ने 1843 में तर्क दिया कि “रेलवे” वाणिज्य, सरकार और सैन्य नियंत्रण के लिए फायदेमंद होगा।”
मतलब यहां स्पष्ट था कि रेलवे ब्रिटिश सरकार ने सिर्फ अपने फायदे के लिए लाया।
अंग्रेजो द्वारा रेल्वे निर्माण के नाम पर कैसे भारतीयो को लूटा गया
रेलवे एक औपनिवेशिक घोटाला था।ब्रिटिश शेयरधारकों ने रेलवे में निवेश करके खूब पैसे कमाएं।
रेल्वे बनाने के लिए ब्रिटिश ने भारतीय करदाताओं को खुले तौर पर लूटा। भारतीयों की जमीन हडपना, ब्रिटिश अफसरों ने भूमि अधिग्रहण के माध्यम से भारतीयों की जमीन हड़प ली।भारतीय किसान की जमीन चली गई वो भूमिहीन हो गए। अंग्रेजी रेल्वे कंपनी को भारतीयो की जमीन मुफ्त में दी।इन सबसे भारतीय गरीब हो गये जबकि अंग्रेजी कंपनी को खूब लाभ हुआ।
अंग्रेजो ने रेल का उपयोग करके भारतीय सोने को भी लूटा।रेल द्वारा सोना बॉम्बे के बंदरगाह तक भेजा गया था और फिर वहां से ब्रिटेन भेजा जाता था।
अकाल में रेल्वे की भूमिका
मदास राजस्व बोर्ड के अध्यक्ष ऑन सुलिवन के शब्दों में, “हमारी प्रणाली एक स्पंज की तरह काम करती है जो गंगा नदी के किनारों से सभी अच्छी चीजों को खींचती है,और उन्हें टेम्स के किनारों पर निचोड़ देती है।”अंग्रेजो का रेल्वे बनाने का उद्देश्य ये ही था।
रेल्वे ने भारत में अकाल उत्पन्न करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।ब्रिटिशर ने खाद्य पदार्थ का निर्यात बड़े मात्रा में किया,क्योंकि रेल से ये काम आसान हो गया था।भारत में खाद्य पदार्थ की कमी होने से भारतीय कुपोषण के शिकार हुए। भारतीयों के लिए खाद्य पदार्थ की कमी हुई,परंतु काल के समय भी रेल्वे द्वारा खादद्य पदार्थ का निर्यात जारी रहा यहां तक कि निर्यात को बढ़ा दिया गया।इन अकाल में 10 मिलियन से ज्यादा लोग मारे गए।


अकाल की भयावहता को दर्शाते कुछ चित्र भी देखें




कुछ महत्वपूर्ण तथ्य जानते हैं कैसे अंग्रेज़ो ने रेल्वे के माध्यम से भीरत को लटा और भारतीय को गरीबी में डाला,नश्लीय भेदभाव किया,भारतीय को प्रताड़ित किया
अच्छा वेतन पाने वाले रेलवे कर्मचारी ब्रिटिश थे। उदाहरण के लिए,रेलवे कंपनियों में 10,000 रुपये से अधिक वार्षिक वेतन वाले शीर्ष 105 अधिकारियों में से प्रत्येक अंग्रेज थे, साथ ही सभी तकनीकी कर्मचारी जैसे इंजन ड्राइवर, प्लेट- लेयर और पर्यवेक्षक कर्मचारी जैसे टिकट चेकर्स भी अंग्रेज ही थें।भारतीय केवल साफ सफाई और रेल पटरी के निगरानी के लिए रखे गए थे।जंगली जानवरों के हमलों से अक्सर भारतीय मारे जाते थे।ये छोटे काम में लगे किसी भी भारतीय कर्मचारी का दर्जा प्राप्त नहीं था,ये पूरी तरह से अस्थाई और न्यूनतम वेतन पर थे।इनके वेतन संबंधी कोई भी नियम नहीं थे।एक तरह से गुलामो की तरह इन्हें रखा गया था। साथ ही भारतीय यात्री को अपनी यात्रा के हर चरण में केवल श्वेत कर्मचारियों से बुरा व्यवहार एवं नस्लीय भेदभाव का सामना करना पड़ता था।
कपड़ा उद्योग
अपनी वस्त्र उत्पादन के लिए प्रसिद्ध भारत ने 1750 में विश्व औद्योगिक उत्पादन का लगभग 25 प्रतिशत उत्पादन दिया।परंतु रेल्वे के आने से अंग्रेजो ने भारतीय कपास एवं जुट की अत्यधिक निर्यात किए। और इन्हें ब्रिटिश फैक्ट्री के लिए उपलब्ध कराया जिसके कारण भारतीय कपड़ा एवं जुट उद्योग खत्म होने लगें।अंततः भारतीय कपड़ा उद्योग 1900 तक 2 प्रतिशत पर आ गया।
राय साहब चंद्रिका प्रसाद तिवारी ने 1921 में अपनी पुस्तक ‘भारतीय रेलवेः ऐतिहासिक,आर्थिक और प्रशासनिक पहलू’ में लिखते हैं कि ” न केवल विनम्र भारतीय कारीगर की आजीविका छीन गई, बल्कि देश की अप्रशिक्षित आबादी भी हैरान रह गई। लाखों लोग दरिद्रता में आ गए।”
शशि थरूर
शशि थरूर ने अपनी किताब ‘इनग्लोरियस एम्पायर’ में लिखा है कि “अंग्रेज तब हैरान रह गए जब उनके भारतीय मैकेनिक इतने कुशल हो गए कि 1857, उन्होंने अपने खुद के इंजन डिजाइन और निर्माण करना शुरू कर दिया।इससे घबराय ब्रिटिश अफसरों ने 1912 में ब्रिटिश संसद में एक कानून बना दिया और भारतीय दवारा रेल या रेल इंजन बनाने पर प्रतिबंध लगा दिया।”
यात्री रेल
अंग्रेजो ने यात्री रेल में तीन क्लास बनाए थें।क्लास 1 एवं 2 जो सुविधाओं से युक्त था।क्लास 1 एयरकंडीशनर था,इनमें सफर करने वाले अंग्रेज थे।इसी तरह सुविधा युक्त क्लास 2 में भी अंग्रेज ही सफर करते थें।भारतीय के लिए क्लास थर्ड था जिसमें कोई सुविधाएं नहीं थी लकड़ी के पटरे होते थे।परंतु भारत में यात्री किराया औसत से काफी ज्यादा था।जो कि अंग्रेजी किराए से एक तिहाई से दो तिहाई ज्यादा था।

रेल लाइन पर काम करने वाले भारतीय मजदूरों की स्थिति
ब्रिटिश अफसरों ने रेल लाइन बनाने के कार्य में भारतीयो को लगाया।उनसे दिन रात काम लिया गया। उन्हे गुलाम बनाकर कार्य कराए गए।इन मजदूरों को जंगलों में अकेले रेल लाइन,पुल,घाट आदि के कार्य में छोड़ दिया जाता था।इन्हें किसी तरह की सुविधाएं नहीं थी। बहुत से मजदूर बिमारी और कुपोषण से मर जाते थे।उनका अंतिम संस्कार भी नहीं किया जाता था।लाशें ऐसे ही जंगल पर फेंक दिया जाता था।कार्य करने की जगह पर महामारी फैल जाती थी। महामारी से भी बहुत बड़ी संख्या में मजदूर मर जाते थे।परंतु अंग्रेज अफसर भारतीय की जान बचाने के लिए कोई कोशिश नहीं करते थे।उन्हें केवल सस्ते मजदूर से मतलब था।


भोर घाट
भोर घाट में निर्माण के दौरान लगभग 25,000 भारतीय मजदूरों ने अपनी जान गंवा दी। जिसमें बच्चे और महिलाएं थे।पुरुषों,महिलाओं और बच्चों को भोर घाट साइट पर काम में लगाया गया।ये लोग मिट्टी और पत्थर खोदने थे और खुदाई से निकली मिट्टी,पत्थर के टूकडों को वहां से हटाते थे।वे नंगे पैर थें।इनको मूलभूत सुविधाएं भी नहीं दी गई।खाना और पीने के पानी तक मुश्किल से प्राप्त होता था।मलेरिया और हैजा जैसी महामारी साइट पर व्याप्त थी।साथ ही
यह काम में बहुत ज़्यादा जोखिम भी था।खड़ी चट्टानों पर पैर रखने की जगह नहीं थी।पहाड़ों में ड्रिलिंग करने के लिए मज़दूरों को रस्सियों से लटकाया जाता था।कई बार वे नीचे गहरी खाई में गिरकर मर जाते थे।जंगल में मजदूर खुलें में रहने को मजबूर थे जंगली जानवरों के हमले से भी मजदूर मर जाते थे।इसके अलावा मजदूर गिरते हुए मलबे के भी शिकार हो जाते थे।



कोलंबिया यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा प्रकाशित शोध
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री उत्सा पटनायक द्वारा हाल ही में कोलंबिया यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा प्रकाशित किया गया नया शोध में बताया गया कि ब्रिटेन ने 1765 से 1938 की अवधि के दौरान भारत से कुल लगभग 45 ट्रिलियन डॉलर लूटे।ये राशि भारतीय संसाधनों से प्राप्त हुआ।यह एक बहुत बड़ी रकम है। $45 ट्रिलियन आज यूनाइटेड किंगडम के कुल वार्षिक सकल घरेलू उत्पाद से 17 गुना अधिक है।”संसाधनों की इस लूट में ब्रिटिश रेल्वे ने अहम भूमिका निभाई।
उपसंहार
भारत में रेल का प्रयोग अवश्य ही अंग्रेजों के समय ही हआ हो, किन्तु इसका उद्देश्य भारतीयों को सुविधा देना नहीं था,बल्कि भारत में अंग्रेजों ने अपनी सुविधा और व्यापार में आसानी के लिए किया था। साथ ही ब्रिटिश हुकूमत को भी भारत में मजबूत करने के उद्देश्य से रेल लाया गया। अंग्रेजो ने रेल के माध्यम से भारत और भारतीयो के लिए कोई भी भलाई का कार्य नहीं किया और न ही वो करना चाहते थें।
अंग्रेजो ने रेल और पटरियों को बनवाने में कुल व्यय को भारतीयों से अंधाधुंध टैक्स के रुप में वसूल किया गया था जिसके कारण भारत में गरीबी और भुखमरी बढने लगी थी।साथ ही रेल के माध्यम से भारतीय संसाधनों की लूट कि गई।अतः स्पष्ट होता है कि रेल अंग्रेजो का भारतीयो को दिया कोई उपहार नहीं था बल्कि इसका उद्देश्य भारत में लूट और ब्रिटिश सत्ता को मजबूत करना था।



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