सबसे पहले डेमोक्रेसी शब्द को समझते है।
डेमोक्रेसी शब्द यूनानी शब्द डेमोस” जिसका अर्थ ‘लोग’ है और “क्रेटोस जिसका अर्थ ‘शक्ति’ है से आया है। इस प्रकार डेमोक्रेसी का अर्थ है जनता का शासन।आधुनिक भारतीय राजनीति में लोकतंत्र शब्द का उपयोग किया गया, जिसका आशय वहीं है जो आशय डेमोक्रेसी से लगाया जाता है।भारत में प्रजातंत्र, गणतंत्र के बहुत प्राचीन प्रमाण उपलब्ध है।
भारतीय लोकतंत्र में धर्म (कर्तव्य) की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण है,जिसमें राजा (राज धर्म) और प्रजा (प्रजा धर्म) दोनों के दायित्व सम्मिलित हैं।भारतीय लोकतंत्र के मूल मूल्य सद्भाव, स्वतंत्रता, स्वीकार्यता, समानता और समावेशिता – नागरिकों के सम्मानजनक जीवन का आधार हैं।इसकी पुष्टि प्राचीन भारतीय ग्रंथों से हो जाती है, जो हम आगे बताएंगे।
क्या भारत में लोकतंत्र फ्रेंच क्रांति से आया?
वामपंथी इतिहासकार अक्सर ये कहते रहते हैं कि भारत लोकतंत्र की जननी नहीं है। लोकतंत्र की अवधारणा एथेंस ग्रीक से आया है जबकि आधुनिक लोकतंत्र की अवधारणा फ्रेंच क्रांति के बाद ब्रिटिशर ने भारत में लाया।आज हम वामपंथीयो के इसी प्रोपोगेंडा पर तथ्यों के साथ बात करेंगे।और यह साबित करेंगे कि भारत में लोकतंत्र के प्राचीन प्रमाण उपलब्ध है जिससे यह पुष्टि होती है कि भारत ही लोकतंत्र की जननी है।
सबसे पहले एथेंस पर बात करते हैं
507 ईसा पूर्व में, एथेनियन नेता क्लीस्थेनेस ने राजनीतिक सुधारों की एक प्रणाली शुरू की जिसे उन्होंने डेमोक्रेतिया कहा गया।इस प्रणाली में तीन अलग-अलग संस्थाएँ शामिल थींः एक्लेसिया, एक संप्रभु शासी निकाय जो कानून लिखता था और विदेश नीति तय करता था।बौले, दस एथेनियन जनजातियों के प्रतिनिधियों की एक परिषद और डिकैस्टेरिया जिसमें अदालतें थी,जहां नागरिक जूरी सदस्यों के समूह के समक्ष मामलों पर बहस करते थे। यह एथेनियन लोकतंत्र केवल दो शताब्दियों तक ही जीवित रहा।
फ्रेंच क्रांति
फ्रांस की क्रांति में नागरिकों ने राजशाही और सामंती व्यवस्था उखाड़ फेंका।राजशाही और सामंती व्यवस्था के अंत को ही फ्रेंच रिवोल्यूशन कहते हैं। इसके बाद फ्रांस में कई तरह के बदलाव आए।फ्रेंच रिवोल्यूशन कई घटनाएं घटी, जो 1789-1799 के बीच हुई।आज हम फ्रेंच रिवोल्यूशन के कारण आदि को यहां डिस्कस नहीं करेंगे। हम यह देखेंगे क्या भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था फ्रांस या एथेंस की देन है।
भारत लोकतंत्र की जननी, ये रहे प्रमाण
फ्रांस की क्रांति 1789-1799 के बीच की है जबकि एथेंस में लोकतंत्र का जो प्रमाण दिया जाता है वो 507 ईसा पूर्व का है।आज हम इससे पूर्व का प्रमाण दिखाएंगे जो यह सिद्ध करेगा की भारत में लोकतंत्र का सिध्दांत कहीं बाहर से नहीं आया, बल्कि भारत ही लोकतंत्र की जननी है।
लोकतंत्र की मूल सिद्धांत की अवधारणा
भारतीय संस्कृति में लोकतंत्र की मूल सिद्धांत की अवधारणा को देखा जा सकता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए समानता एक प्रमुख आधार दार्शनिक विचार है,जो भारतीय संस्कृति के प्राचीन ग्रंथों में स्पष्ट दिखती है।ऋग्वेद में कहा गया है
” एकम् सद विप्रा बहुधा वदन्ति”
अर्थात सर्वोच्च वास्तविकता एक है ऋषि उसे विभिन्न नामों से बुलाते हैं।”
समानता ही लोकतंत्र का मूल आधार है। भारत में इसे भारतीय संस्कृति के दार्शनिकों, संतों और कवियों ने इसे पहचाना तथा सदियों से इसके महत्त्व का प्रचार किया।
वैदिक काल में लोकतांत्रिक व्यवस्था का सिद्धांत
चार वेद (ऋग्वेद, अथर्ववेद, सामवेद और यजुर्वेद) लोकतंत्र की मूल अवधारणा का उल्लेख मिलता है।विश्व की सबसे प्राचीनतम रचना ऋग्वेद और अथर्ववेद में सभा, समिति तथा संसद जैसे प्रतिनिधि निकायों का उल्लेख है, ये शब्द आज भी उपयोग में हैं।
महाकाव्यों में लोकतांत्रिक व्यवस्था का उल्लेख
रामायण राज्य के नागरिकों के कल्याण पर ज़ोर देती है। अयोध्या के नागरिकों का भगवान श्री राम का विश्वास यह बताता है कि भगवान श्री राम अपने नागरिकों के हितों के लिए समर्पित थे।
महाभारत में धर्म,नैतिकता और शासन पर प्रकाश डाला गया है। विशेष रूप से युद्ध के मैदान में युधिष्ठिर को भीष्म की सलाह, भगवद् गीता में कर्त्तव्यों पर मार्गदर्शन प्रदान किया गया है।
कौटिल्य और अर्थशास्त्र (350-275 ईसा पूर्व)
कौटिल्य ने चंद्रगुप्त मौर्य के सलाहकार रहे और इन्होंने अर्थशास्त्र लिखा। इस पुस्तक में लोकतंत्र नागरिकों के अधिकारो को प्राथमिकता दिया गया।
अर्थशास्त्र में यह बताया गया है कि शासक की खुशी और कल्याण नागरिकों की भलाई पर निर्भर करता है,यह भाव स्थायी लोकतांत्रिक सिद्धांत का प्रतीक है।
मेगस्थनीज़ और डायोडोरस सिकुलस के रिकॉर्ड
मेगस्थनीज़ एक यूनानियों यात्री थे और ये भारत आए थे, इन्होंने उल्लेख किया कि भारतीयों की एक सराहनीय प्रथा थी कि,किसी को भी गुलाम नहीं बनाना। इस कथन से स्पष्ट होता है कि भारत में प्राचीन समय से ही समान स्वतंत्रता सुनिश्चित रही,यह लोकतांत्रिक व्यवस्था को ही सिद्ध करती है।
भारत में लोकतंत्र के प्राचीन प्रमाण
वैदिक देवता का उल्लेख-
बोगाज कुई नामक एक स्थान पर कीलाक्षर लिपि में एक शिलालेख प्राप्त हुआ था। यह शिलालेख मित्तानी और हित्तानी नामक दो प्राचीन राज्यों के मध्य एक संधि पत्र था। इस शिलालेख में अन्य देवों के साथ साथ एक पंक्ति में वैदिक देवों का भी उल्लेख था। यह अभिलेख Hugo Winckler ने 1907 में खोजा था। इसका प्रकाशन भी Winckler ने किया था। Winckler द्वारा प्रकाशित पाठ का ही रोमन लिप्यन्तरण हमने ऊपर दिया है।
अभिलेख में उल्लेखनीय वैदिक देवों के पंक्ति वाले पाठ का पुनः प्रकाशन Jacobi ने रायल एशियाटिक सोसाइटी के एक शोधपत्र में किया था, जो इस प्रकार है-

यहां अभिलेख में वैदिक देवों के नाम इस प्रकार है मित्र, वरुण, इंद्र और नास्त्यो।
यह अभिलेख लगभग 1400 ईसापूर्व प्राचीनतम है। इस अभिलेख में न केवल इंद्र अपितु अन्य भी वैदिक देवों का उल्लेख है। इस अभिलेख के प्रमाण से पुरातात्विक रुप से यह निष्कर्ष निकलता है कि इंद्र देव की मान्यता न केवल कुषाण, न केवल मौर्यों अपितु बुद्ध के जन्म से भी सैकडों वर्ष प्राचीनतम है। जो नवबौद्ध वैदिक देवों के बुद्ध से प्राचीनतम पुरातात्विक सबूत मांगते हैं तो यह लेख उनकी सेवा में हाजिर है। अतः इंद्र देव बुद्ध के पुरातात्विक तथाकथित साक्ष्यों से हजारों साल प्राचीनतम है।
(ऋग्वेद 3/38/6)
मंत्रः- त्रीणि राजाना विदथे पुरूणि परि विष्वानि भूषयः सदासि । अपश्यमत्र मनसा जगन्वान्व्रते गनवां अपि वायुकेशान ॥ (ऋग्वेद 3/38/6)
भावार्थः हे मनुष्यो/प्रजाजनो! मैं आप द्वारा निर्वाचित राजा उत्तम गुण कर्म और स्वभावयुत सत्यनिष्ठ विद्वान पुरुषों की राजसभा, विद्यासभा और धर्मसभा द्वारा नियत सिद्धांतों का अनुपालन करते हुए संपूर्ण राज्य संबंधी कर्मों को यथायोग्य सकल प्रजा के निरंतर सुख के अनुरूप संपन्न करूंगा ॥
अथर्ववेद 15/9/2
अथर्ववेद के मंत्रः- तं सभा च समितिश्च सेना च ॥ (अथर्ववेद 15/9/2)
(तम) उस राजधर्म को (सभा च) त्रिसभा (समितिश्च) मतादि की व्यवस्था, और (सेना च) सेना मिलकर स्थापित करें ॥1॥
अथर्ववेद 3-4-2
“वर्षानराष्ट्रस्य ककुदि श्रयस्व ततो न उग्रो वि भजा वसुनि ॥”
इस मंत्र में राजा को प्रजा के द्वारा चुनने को कहा गया है।
महाभारत अनुशासन पर्व
महाभारत के अनुशासन पर्व’ में राजा और प्रजा के आपसी सम्बन्ध को भी बताया है
“प्रजाकार्ये तु तत्कार्ये प्रजासौख्यं तु तत्सुखं”
यानी प्रजा का कार्य ही राजा का कार्य है, प्रजा का सुख ही राजा का सुख, और प्रजा के हित में ही राजा का हित भी है।
महाभारत कर्ण पर्व
महाभारत में कर्ण पर्व में में लिखा गया है:
“धारणात् धर्म इत्याहुः धर्मों धारयति प्रजाः। यः स्यात् धारणसंयुक्तः स धर्म इति निश्चयः “
जिसका इसका अर्थ है धर्म ही समाज को पोषित करता है। जो धारण करता है, एकत्र करता है, अलगाव को दूर करता है उसे धर्म कहते हैं। ऐसा धर्म प्रजा को धारण करता है। जिसमें प्रजा को एकसूत्रता में बांध देने की ताकत है वह निश्चय ही धर्म है।
कौटिल्य अर्थशास्त्र
कौटिल्य ने राजा को प्रजा के प्रति विनम्न और उदार रहने के भी निर्देश दिए हैं और कहा है कि इनका नाश होते ही राजधर्म का नाश हो जाता है। वो लिखते हैं:
” प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां तु हिते हितम् नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम् ॥”
यानी “प्रजा के सुख में राजा का सुख निहित है, प्रजा के हित में ही उसे अपना हित दिखना चाहिए। जो स्वयं को प्रिय लगे उसमें राजा का हित नहीं है, उसका हित तो
प्रजा को जो प्रिय लगे उसमें है।”
अभिलेखिय प्रमाण समुद्र गुप्त का शिलालेख
समुद्र गुप्त के चौथी शताब्दी के इस अभिलेख में गणतंत्र का उल्लेख है।

उथिरामेरुर शिलालेख, 919 ई.
दक्षिण भारत के उधिरामेरुर मंदिर में शासक परंतक चोल प्रथम के शिलालेख, एक हजार साल पहले लोकतांत्रिक चुनाव और स्थानीय शासन की पुष्टि करते हैं।

खलीमपुर ताम्रपत्र (9वीं शताब्दी ई.)
खलीमपुर ताम्रपत्र में लोकतंत्र के सिध्दांत का उल्लेख मिलता है। यहां लिखा है कि “लोगों ने एक अयोग्य शासक को प्रतिस्थापित करने के लिये चुना था।”
डॉ अम्बेडकर का कथन
अपनी पुस्तक’ एनीहिलेशन ऑफ कास्ट’ (1936) में उन्होंने लिखाः
“ऐसे धार्मिक सिद्धांतों के लिए जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के अनुरूप होंगे, आपके लिए विदेशी स्रोतों से उधार लेना आवश्यक नहीं होगा और आप ऐसे सिद्धांतों के लिए उपनिषदों का सहारा ले सकते हैं।”
छत्रपति शिवाजी (1630-1680 ई.)
मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी (1630-1680 ई.) ने लोकतांत्रिक शासन का समर्थन किया। उनके आज्ञा पत्र में अष्ट-प्रधान के लिये कर्त्तव्यों की रूपरेखा दी गई, समान अधिकार सुनिश्चित किये गए। शिवाजी की लोकतंत्र विरासत उनके उत्तराधिकारियों के माध्यम से कायम रही।
उपसंहार
आज हमने शास्त्रीय एवं अभिलेखिय प्रमाण दिखाए, जिससे सिद्ध होता है कि भारत में लोकतंत्र का अस्तित्व बहुत प्राचीन है।जो लोग लोकतंत्र का जनक एथेंस और कुछ लोक भारत में लोकतंत्र की देन फ्रांस की क्रांति को बताते है, उनका यह क्लेम सर्वथा भ्रामक है।वेद में लोकतंत्र के प्रमाण मिलते हैं जो भी कम से कम 2500 ईसा पूर्व के है।इसी तरह महाभारत में भी लोकतंत्र के प्रमाण मिलते हैं। एहोल अभिलेख के अनुसार महाभारत के प्रमाण 3000 ईसा पूर्व के मिलते हैं।हमने पूर्व की स्ट्रीम में भगवान श्री के 1000 ईसा पूर्व के प्रमाण दिखा चुके हैंगणतंत्र शब्द का प्रयोग ऋग्वेद में 40 बार, अथर्ववेद में 9 बार तथा ब्राह्मण ग्रंथों में अनेक बार किया गया है।बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर ने भी माना है कि स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का सिद्धांत उपनिषदो में है, (उपनिषद 600 ईसा पूर्व),किसी भी लोकतंत्र के लिए स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व आवश्यक होते हैं।उपरोक्त सभी प्रमाण से सिद्ध होता है कि भारत ही लोकतंत्र की जननी है।



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