मित्रों! भारत में हिंदुओं द्वारा नदियों का पूजन प्राचीनकाल से ही किया जा रहा है। नदियों को माता, देवी इत्यादि मानकर हिंदू उनकी विभिन्न प्रकार से स्तुति करता है। नदियों को भेंट यथा तांबे के सिक्के आदि चढाने की हिंदुओं की प्राचीन परिपाटी रही है। विभिन्न तीर्थस्थल भी नदियों के तट पर बने हुए हैं, जहां जाना हिंदुओं में परम सौभाग्य और आध्यात्मिक शांति का प्रतीक समझा जाता है। इन प्राचीन नदी स्थित तीर्थों की यात्रा तथा नदियों के तटों पर बनाये जाने वाले महोत्सवों का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों और साहित्यों में भी है। जिसे “नदीमह” के नाम से जाना जाता था। प्रसिद्ध विद्वान वासुदेव शरण अग्रवाल जी ने अपने आलेख “इंद्रमह” के अंत में नायाधम्मकहा के अनुसार विभिन्न मह नामक उत्सवों की एक सूचि देते हैं, जिसमें “नदी मह” भी है।

– वासुदेव शरण अग्रवाल : रचना – संचयन (हिंदी खंड), पृष्ठ संख्या 497
इस प्रमाण से ज्ञात होता है कि नदियों के अत्यधिक महत्व के कारण ही उनके तटों पर उत्सवों का आयोजन हुआ करता था तथा लोग नदियों में स्नान को बहुत ही पुण्यवर्धक मानते थे। नदियों के दैवीय महत्व का उल्लेख हमें ऋग्वेद के नदीसुक्त में भी मिलता है। जिसमें सिंधु, गंगा, सरस्वती आदि नदियों की स्तुतियाँ हैं।

– ऋग्वेद 10/75/4
इस सुक्त में सिंधु के लिए कहा गया है कि जैसे माताऐं अपने शिशुओं के पास जाती है, जैसे दुधारू गायें अपने बछड़ों के पास जाती हैं, वैसे ही अन्य नदियाँ सिंधु से मिलती हैं। जैसे युद्ध करने वाला राजा सेना लेकर आगे बढता है, वैसे ही सिंधु अपनी सहायक नदियों के साथ आगे बढती है।
इसी मंडल के एक और अन्य मंत्र में विभिन्न नदियों के लिए कहा गया है –

– ऋग्वेद 10/75/5
इस सुक्त में आया है कि – है गंगा, यमुना, सरस्वती, शुतुद्री, परुष्णी, असिक्नी के साथ रहने वाली मरुद्वृद्धा, वितस्ता, सुषोमा और आर्जीकीया नदियों! तुम मेरी स्तुति स्वीकार करो।
ऋग्वेद के अलावा महाभारत में भी नदियों के महत्व को दर्शाया है। वासुदेव शरण अग्रवाल ने अपने अंग्रेजी आलेख “Nadi – maha (Festival of River Goddesses) ” में महाभारत के भीष्म पर्व के प्रमाण से आर्यों की संस्कृति विभिन्न नदियों जैसे सिंधु, सरस्वती, यमुना, गंगा, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी के तटों पर बसी थी। इन सभी नदियों को विशेष रुप से पवित्र माना जाता था, आदि बातें बतलायी हैं।

– महाभारत, भीष्मपर्व 9. 13 – 15
इसी प्रकार इन नदियों को विश्व की माताऐं भी कहा है –

– महाभारत, भीष्मपर्व 9.37
वासुदेव जी के आंग्लालेख को भी आप यहां देख सकते हैं –

– Vasudeva Sharan Agrawala : A Selection, Page no. 793
इन नदियों में से गंगा नदी का विशेष महत्व भारतीयों में रहा है। हिंदुओं में गंगा को माता माना गया है। विभिन्न धार्मिक कार्यों में भी गंगाजल का प्रयोग होता है। गंगा के तट पर स्थित विभिन्न तीर्थों की यात्राओं और नदी में स्नान से पुण्य की कामना महाभारत के वनपर्व में अनेकों स्थान पर है।
यथा –

– महाभारत, वनपर्व, 85. 4 – 5
उपरोक्त श्लोकों में गंगासागर संगम तीर्थ स्थित गंगा में स्नान का फल दस अश्वमेध यज्ञ के बराबर बतलाया गया है। तथा गंगा के दूसरे पार पहुंचकर स्नान करने और तीन रात्रि तक निवास करने का फल सब पापों से मुक्त होना कहा है।

– महाभारत, वनपर्व 85. 65 – 67
उपरोक्त श्लोकों में गंगा स्थित शृङ्गवेरपुर नामक तीर्थ की यात्रा का महत्व दर्शाया है। इस तीर्थ में स्थित गंगा नदी में ब्रह्मचर्य पूर्वक स्नान करने से वाजपेय यज्ञ के समान फल बताया है। इसके बाद मुंजवट तीर्थ की यात्रा और गंगा स्नान का फल बताया है।

– महाभारत, वनपर्व 85. 87 – 88
इन श्लोकों में गंगा तट स्थित दशाश्वमेधिक और हंसप्रपतन तीर्थ का उल्लेख है। यहां गंगा स्नान को कुरुक्षेत्र के समान पुण्यदायिनी माना है।

– महाभारत, वनपर्व 85. 89 – 94
इन श्लोकों में गंगा तीर्थ, गंगा स्नान और गंगा जल के विभिन्न पुण्य फलों का वर्णन किया गया है।
गंगा के देवीय प्रभाव और पवित्रता के अत्यंत महत्व के कारण, इस नदी के विभिन्न तटों पर अनेकों तीर्थों की स्थापना हुई थी। गंगा स्नान से पुण्य रुपी फल की प्राप्ति के कारण नदीमह के अंतर्गत “गंगामह” नामक उत्सव को अत्यंत मान्यता प्राप्त हुई। वासुदेव शरण अग्रवाल जी ने अपने “Nadi – maha (Festival of River Goddesses)”
आलेख में अष्टाध्यायी 5.1.109 पर काशिकावृत्ति से गंगामह का प्रमाण दिया है। आप काशिकावृत्ति के मूल वचन को भी देख सकते हैं –

– अष्टाध्यायी 5.1.109 पर काशिकावृत्ति
यहां जैसे इन्द्रमह का प्रयोजन ऐन्द्रमहिकम् दिया है वैसे ही गाङ्गामहिकम् के लिए गंगामह: प्रयोजनमस्य गाङ्गामहिकम् होगा।
वासुदेव शरण अग्रवाल जी लिखते हैं –

– Vasudeva Sharan Agrawala : A Selection, Page no. 793
यहां गंगामह का तात्पर्य है कि देवीय नदी गंगा से सम्बंधित उत्सव या तीर्थादि यात्रा।
गंगा स्नान और तीर्थयात्रा से सम्बंधित पुण्यफलों की मान्यताओं को हम ऊपर सप्रमाण उद्धृत कर चुके हैं तथा साथ ही गंगामह नामक नदीमह के अंतर्गत आने वाले उत्सव का भी सप्रमाण विवेचन कर चुके हैं। हिंदुओं की नदियों के प्रति और विशेषरूप से गंगा के प्रति सम्मान, और दैवीय भावना के कारण ही मनीषियों ने इस महान पवित्र नदी का मानवीय प्रतीकात्मक अंकन किया। गंगा के मानवीय चित्रांकन के विषय में विभिन्न पुराणों में उल्लेख मिलता है। जिनमें गंगा को एक ऐसी देवी के रूप में दर्शाया है जो कि मगरमच्छ की सवारी करती है।

– नीलमतपुराण 159
यहां नीलमतपुराण में भी गंगा को मकर पर आरुढ बताया है। इसी शास्त्रीय सिद्धांत पर गंगा का अनेकों जगह चित्रण हमें प्राप्त होता है, जिसमें से कुछ इस प्रकार है –

– Studies In Indian Art, Plate no. V
गंगा का यह मृणशिल्प अहिच्छत्र के गुप्तकालीन शिव मंदिर से प्राप्त हुआ था। गुप्तकालीन इस प्रतिमा में गंगा को देवी रूप में दर्शाया है, जिनके एक हाथ में जलपात्र है तथा देवी मकर के ऊपर खडी हैं। ऐसा ही मानवीय चित्रांकन अन्य स्थानों पर भी मिलता है।

– A History Of Fine Art In India & Ceylon (Second edition), Plate no. 46 fig. A
यह मकरारूढ गंगा की प्रतिमा भोपाल जिले की उदयागिरी नामक गुफा से प्राप्त हुई है। इसमें भी देवी गंगा एक मकर पर सवार है तथा यह गुप्त कालीन है।

– Saga Of Indian Sculpture, Plate 36, fig. B
गंगा की यह प्रतिमा भी मकर पर विराजमान है तथा यह बेसनगर से प्राप्त हुई थी। यह गुप्तकालीन है।
गंगा की एक और प्रतिमा R.C.Sharma जी ने अपनी पुस्तक “The Splendour Of Mathura Art & Museum” में दी है जो कि पश्चगुप्त-कालीन है।

– The Splendour Of Mathura Art & Museum, fig. 59, page no. 149
पश्च गुप्तकालीन यह प्रतिमा भी मकर पर खडी है।

– Corpus Of Eastern Kharosti and Kharosti – Brahmi Inscription, Pl. XLIX, fig. 53, Page no. 259
टेराकोटा निर्मित गंगा देवी की यह प्रतिमा बंगाल के चंद्रकेतु गढ नामक स्थान से प्राप्त हुई थी। इस समय यह इंडियन म्यूजियम में Accession no. 90/139 से सुरक्षित है। इसमें देवी गंगा की पहचान उनके मकर पर आरूढ़ होने से होती है। यह फलक लगभग कुषाणकालीन है।

– Gupta temple architecture, Plate xiii, b
यह फलक उदयगिरि की गुफा संख्या 24 से है। गुप्तकालीन इस फलक में गंगा मकर पर है।

– The golden age : Gupta art – Empire, Province and influence, page no. 92, fig. 13
यह फलक पुन्नार से प्राप्त है। यह वाकाटक कालीन लगभग 5 शताब्दी ईस्वी प्राचीन है। मकर पर स्थापित गंगा की यह प्रतिमा केंद्रीय संग्रहालय नागपुर में सुरक्षित है।

– Indian Sculpture : the scene, themes and legends, page no. 153, fig. no. 116
यह प्रतिमा एलौरा की रामेश्वर गुफा xxi से है। इसमें देवी गंगा का अंकन है। यह लगभग सातवीं शताब्दी ईस्वी की है।

– Ellora :a handbook of verul (Ellora caves), plate no. 30
यह फलक ऐलोरा के कैलाश मंदिर से है, जिसमें गंगा देवी की मकरारूढ प्रतिमा स्पष्ट है।

– Aksayanivi : Essays presented to Dr. Debala Mitra in admiration of her scholarly contributions , page no. 201ff, fig no. 4
यह प्रतिमा छोटी खाटू राजस्थान से प्राप्त हुई थी। सातवी शताब्दी ईस्वी की इस प्रतिमा में गंगा देवी का चित्रण है जो कि मकर पर खडी है।
– The Temple Of Bhitargaon , Plate no. 58, fig. no. E 1.2
यह प्रतिमा गुप्तकालीन मंदिर भीतर गाँव से है। यह बहुत ज्यादा खंडित अवस्था में है। किंतु इसमें मकर और देवी का कुछ हिस्सा देखा जा सकता है, इससे प्रतिमा के गंगा होने में कोई संदेह नहीं रहता है।


– The golden age : Gupta art – Empire, Province and influence, page no. 113, fig. no. 9
यह सिक्का कुमारगुप्त का है। इस सिक्के में पश्च भाग पर गंगा देवी मगर पर खडी है।
इन सब प्रतिमाओं के अलावा गंगा का मानवीय चित्रांकन हमें विदर्भ से प्राप्त कुछ सिक्कों पर भी मिलता है। जो कि गंगा के सर्वाधिक प्राचीन अंकन में से एक हैं।


– Ancient Indian Coins :A Comprehensive Catalogue, Coin no. 2326 – 27, Page no. 362
विदर्भ से प्राप्त यह सिक्के लगभग पश्च मौर्यकालीन (200 – 100 ईसापूर्व) प्राचीनतम है। इन सिक्कों के अग्रभाग पर देवी गंगा को मकर पर खडे हुए दर्शाया गया है। गंगा का यह मानवीय अंकन, बुद्ध के मानवीय अंकन से लगभग 200 वर्ष प्राचीन है। जो कि प्राचीन काल में हिंदू मान्यताओं की पुष्टि करता है।
इन सब प्रमाणों से निष्कर्ष निकलता है कि हिंदुओं द्वारा नदियों के पूजन, गंगा नदी के मानवीय अंकन की प्रथा अत्यंत प्राचीन है। इनकी पुष्टि पुरातात्विक साक्ष्यों से भी होती है।
संदर्भित ग्रंथ एवं पुस्तकें –
1) वासुदेव शरण अग्रवाल : रचना – संचयन (हिंदी खंड) – सम्पा. कपिला वात्स्यायन
2) ऋग्वेदसंहिता (श्रीमत्सायणाचार्यविरचितभाष्यसमेता) चतुथा भागः, वैदिक संशोधन मण्डलेन प्रकाशिता
3) महाभारत (द्वितीय खण्ड) – अनु. साहित्याचार्य पण्डित रामनारायणदत्त शास्त्री पाण्डेय
4) महाभारत (तृतीय खण्ड) – अनु. साहित्याचार्य पण्डित रामनारायणदत्त शास्त्री पाण्डेय
5) Vasudeva Sharan Agrawala : A Selection – Ed. by Kapila Vatsyayan
6) अष्टाध्यायी – गुगल प्ले एप पर काशिकावृत्ति सहित
7) नीलमतपुराण (सांस्कृतिक तथा साहित्यिक अध्ययन, संस्कृतपाठ एवं हिन्दी अनुवाद) – प्रो. वेदकुमारी घई
8) Studies In Indian Art – Vasudeva S. Agrawala
9) A History Of Fine Art In India & Ceylon (Second edition) – Vincent A. Smith, Revised by K. DE B. Codrington
10) Saga Of Indian Sculpture – K. M. Munshi
11) The Splendour Of Mathura Art & Museum -R. C. Sharma
12) Corpus Of Eastern Kharosti and Kharosti – Brahmi Inscription – B. N. Mukherjee
13) Ancient Indian Coins :A Comprehensive Catalogue – Wilfried Pieper
14) ऋग्वेद – अनु. डॉ. गंगा सहाय शर्मा
15) Gupta temple architecture – Prithvi kumar agrawala
16) The golden age : Gupta art – Empire, Province and influence – Ed. by Karl Khandalavala
17) Indian Sculpture : the scene, themes and legends – Mohinder Singh Randhawa and Doris Schreier Randhawa
18) Ellora :a handbook of verul (Ellora caves) – Shrimant Bhawanrao Shriniwasrao & Balasaheb Pant Pratinidhi B. A.
19) Aksayanivi : Essays presented to Dr. Debala Mitra in admiration of her scholarly contributions – Ed. by Dr. Gouriswar Bhattacharya
20) The Temple Of Bhitargaon – Mohammad Zaheer
Follow



Leave a Reply