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हिंदू कोड बिल का संपूर्ण सत्य

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सबसे पहले इस सवाल का जबाब ढुंढते है कि क्या हिंदू समाज में हिंदू कोड बिल के पहले, कोई हिंदू कानून या संहिता नहीं थी ?

लेकिन जब हम तथ्य देखते हैं तो सत्य सामने आता है और
सत्य यह है कि हिंदू समाज में सदैव संहिता विद्यमान थी। पहले वेद को हिन्दू समाज को दिशा दे रहे थे। फिर स्मृति ग्रन्थ हिंदू संहिता के रूप में कार्य किए। और फिर मिताक्षरा एवं दायभाग जैसे ग्रंथ लिखे गए जो हिन्दू स्मृति ग्रन्थो पर आधारित थे। और बाद में कई तरह के कानून बने जो मिताक्षरा एवं दायभाग के आधार पर थे।गौरतलब है कि स्वयं बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर ने कहा कि हिंदू महिलाओं को  वेदों ने अधिकार दिए साथ ही यह भी कहा कि मनुस्मृति एवं याज्ञवल्क्य स्मृति ने महिलाओं को संपत्ति का अधिकार दिया।आप इसका रिफरेंस बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण वाड्मय हिंदी खंड 31 पेज पर 531 और 533 पर देख सकते हैं।अतः स्पष्ट होता है कि हिंदू समाज में सदैव हिंदू संहिता

इसके अतिरिक्त भी आधुनिक भारत में हिंदू कोड बिल के पूर्व हिंदू समाज के सिविल अधिकारो के लिए बहुत से कानून थे। त्रावणकोर के महाराजा ने 11 वी शताब्दी मे हिंदू समाज के सिविल अधिकारो के लिए कानून बना दिया था। इसके अतिरिक्त 1937 में बना स्त्री संपत्ति अधिकार भी महत्वपूर्ण था।

आइए अब आपको कुछ कानूनो की सूची दिखाते हैं जो की हिंदू कोड बिल के पहले, हिंदूओ के सिविल अधिकारो के लिए लागू थे।

अब बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि हिंदू कोड बिल से बहुत पहले से हिंदूओ के पास अपने सिविल अधिकारो के लिए कानून थे‌।कहा जाता है कि हिंदू कोड बिल का विरोध ब्राम्हणो ने किया, पर तथ्य यह है कि पूरे भारत के लिए एक हिंदू कोड कानून बनाने का प्रयास, महामहोपाध्याय द्वारा 1921 में किया। और ये ब्राम्हण थें। इसके अतिरिक्त बीएन राव ने भी 1941 में हिंदू कोड ला का मसौदा तैयार किया। और ये भी ब्राम्हण थें। अतः यह सिद्ध होता है कि ब्राम्हण हिंदू महिलाओं को अधिकार नहीं देना चाहते थे इसलिए वो हिंदू कोड बिल के विरोध में थे।अब बात करते हैं बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर जी के हिंदू कोड बिल पर।

बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर जी ने हिंदू कोड बिल को जिस आधार पर बनाया वो हिंदू ग्रंथ ही थें। मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, पराशर स्मृति, वेद ये सभी हिन्दू ग्रंथ थे जिसका रिफरेंस लेकर बाबा साहेब ने अपना हिंदू कोड बिल बनाया। इस बात की पुष्टि बाबा साहेब उन भाषणों से हो जाती है जो उन्होंने हिंदू कोड बिल पर होने वाले बहस के दौरान कहा था।इसका रिफरेंस बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण वाड्मय हिंदी खंड 31 पेज नंबर 531 , 533 , 522 में मिलता है।

बाबा साहेब ने हिंदू कोड बिल में विवाह संबंधी जो कानून बनाया उसमें विवाह के लिए सप्तपदी अनिवार्य शर्त थी। सप्तपदी एक  वैदिक विवाह पद्धति है। जिसमें अग्नि के सात फेरे लगाने होते हैं।
साथ ही बाबा साहेब ने तलाक , पुनर्विवाह संबंधी कानून बनाने का  आधार पराशर स्मृति से लिया और महिला संपत्ति अधिकार से संबंधी कानून मिताक्षरा के आधार पर बनाए, मिताक्षरा कानून हिंदू स्मृति ग्रन्थ पर आधारित कानून हैं। अब यहां स्पष्ट हो जाता है कि बाबा साहेब ने जो हिंदू कोड बिल बनाया उसका आधार हिंदू ग्रंथ ही थें।अब देखते हैं क्या हिंदू कोड बिल के पहले हिंदू महिलाओं को अपने पति से अलग रहने का अधिकार नहीं था। जिसे आज तलाक कहा जाता है।और क्या महिलाओं को पुर्नविवाह का अधिकार नहीं था।इसका जबाब स्वयं बाबा साहेब ने बहस के दौरान अपने भाषण में दिया।अब जानते हैं क्या ब्राम्हणो ने हिंदू कोड बिल का विरोध किया? और विरोध इसलिए ताकि हिंदू महिलाओं को अधिकार नहीं दिए जाएं ? इस बात में कोई सच्चाई नहीं। यह बात सत्य है कि बाबा साहेब ने जिस हिन्दू कोड बिल को पेश किया था, उस पर विरोध था। लेकिन ये विरोध कांग्रेस के सदस्यों ने भी किया। स्वयं राजेन्द्र प्रसाद जी ने भी हिंदू कोड बिल का विरोध किया। इसके अतिरिक्त सिख समुदाय से आने वाले कुछ सदस्यों ने भी हिंदू कोड बिल का विरोध किया था।विरोध करने वाले सिर्फ ब्राम्हण नहीं थें। हिंदू कोड बिल का विरोध करने वालों का तर्क था कि सरकार यह बिल केवल हिन्दूओ के लिए क्यो ला रही है, अल्पसंख्यको के ऐसा बिल क्यों नहीं लाया जा रहा है।साथ ही यह भी तर्क था कि अभी चुनाव नहीं हुए, कोई भी सदस्य जनता द्वारा चुना हुआ नहीं है फिर जल्दीबाजी में इतना महत्वपूर्ण बिल क्यों लाया जा रहा है।

बाबा साहेब ने कहा

“जिस समय नारद स्मृति या पराशर स्मृति लिखी गई तो इस बात को मान्यता प्रदान की गई जब एक पति अपनी पत्नी को छोड़ देता है तो वह उसे तलाक दे सकती है। जब उसका पति मर जाता है जब वह परिव्रिज्य ले लेती है। तो वह दूसरा पति पाने की हकदार हैं।”

अतः यहां बाबा साहेब ने स्वयं स्पष्ट किया कि हिंदू ग्रंथों के अनुसार हिंदू महिलाओं को तलाक व पुर्नविवाह का अधिकार था।

अब बात करते हैं अभी जो वर्तमान में हिंदू कोड बिल लागू है उस पर । वर्तमान में हिंदू कोड बिल क़ानून हिंदू कोड बिल नाम से न होकर बल्कि चार कानूनो के नाम से है । जो इस प्रकार है

हिंदू मैरिज एक्ट
हिंदू सक्सेशन एक्ट
हिंदू एडाप्टेशन एक्ट
हिंदू मायनोरीटी एंड गार्जियनशिप एक्ट।

ये चारों कानून 1955 से 1956 के बीच संसद से पास हुए। यहां ध्यान देने की बात है कि जब बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर जी द्वारा बनाया गया हिंदू कोड बिल 1951 में नेहरू सरकार द्वारा वापस ले लिया गया था तो 1951 में ही बाबा साहेब ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। और पहले हुए लोकसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा और वो लोकसभा नहीं पहुंच सके। चुनाव के बाद हिंदू कोड बिल को चार कानूनो में बनाकर 1955 में एच वी पाटस्कर द्वारा संसद में पेश किया।एच वी पाटस्कर उस समय कानून मंत्री थे। इन कानूनों को इन्होंने ही बनाया।एच वी पाटस्कर के द्वारा पेश ये कानून 1955 से 1956 के बीच में पास हुए और देश में लागू हूए।

अब बौद्ध महिलाओं की स्थिति देखें तो किसी भी बौद्ध ग्रंथ में विवाह तलाक पुनर्विवाह और महिलाओं के संपत्ति संबंधी कानून या कोई प्रावधान नहीं मिलते। और न ही कोई ऐसा कानून बौद्ध महिलाओं के पहले बना जो उनके अधिकारों को उन्हें देता हो।पूरे भारत में  बौद्ध सिविल अधिकारो के लिए एक कानून मिलता है। जो लद्दाख में लागू किया गया था।
जिसका नाम लद्दाख बुद्धिस्ट सक्सेशन टू प्रापर्टी एक्ट 1943 है। इस एक्ट के अनुसार संपत्ति में केवल पुत्रों को अधिकार है। यह एक्ट महिलाओं को अधिकार नहीं था।अब अंत में यह जानना जरूरी है क्या हिंदू कोड बिल से केवल हिन्दू महिलाओं को अधिकार मिलें?

हिंदू कोड बिल में बौद्ध जैन सिख को भी हिंदू माना गया है। इसलिए यह कानून सिर्फ हिन्दू महिलाओं को अधिकार नहीं देता अपितु यह बौद्ध जैन सिख महिलाओं को भी अधिकार देता है।साथ ही बौद्ध समाज में बहुपति प्रथा प्रचलित थी। एक बौद्ध महिला को  कई पतियों के साथ रहना पड़ता था। इस प्रथा को रोकने के लिए कश्मीर के हिंदू राजा ने कानून बनाया था। जिसका नाम बुद्धिस्ट पालीएंड्री मैरिज प्रोहिबिशन एक्ट 1941 बनाया।

हिंदू कोड बिल आने से बौद्ध महिलाओं को संपत्ति में अधिकार मिला साथ ही विवाह तलाक पुनर्विवाह का भी अधिकार मिला। इसके अतिरिक्त बहुपति विवाह से कुप्रथा से भी हिंदू कोड बिल ने बौद्ध महिलाओं को बचाया।

अतः यह भी स्पष्ट है कि हिंदू कोड बिल से पहली बार बौद्ध महिलाओं को , हिंदू के तौर पर पहली बार कानूनी अधिकार मिलें।

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