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इंद्र देव की प्राचीनता

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इंद्र देव का उल्लेख हिंदुओं के वेदों से लेकर पौराणिक ग्रंथों में है। वेदों में अनेकों स्तुतियाँ इंद्र को समर्पित है। निरुक्त व ब्राह्मण ग्रंथों में इंद्र शब्द ईश्वर, राजा, सूर्य, वर्षा के देव आदि अर्थों में है। उपनिषदों व व्याकरणशास्त्र में इंद्र एक विद्वान तथा व्याकरणशास्त्र के ज्ञाता के रुप में उल्लेखित हैं। पुराण व महाभारतादि इतिहास ग्रंथों में इंद्र को देवों का राजा कहा गया है। वैदिक मत के बाद वाले मतों ने भी अपना प्रभाव दर्शाने के लिए अपने मत में इंद्र का उल्लेख किया है। जैसे कि जैन और बौद्ध!

इन मतों में इंद्र को बुद्ध या जिन का अनुचारी और सेवक रुप में दर्शाया है, जिससे ज्ञात होता है कि पूर्व उपस्थित वैदिक धर्म पर अपना प्रभाव बनाने के लिए इन मतों ने इस प्रकार की कहानियाँ कल्पित की थी।

अब हम साहित्यिक विवरणों से हटकर इंद्र देव के पुरातात्विक साक्ष्यों पर बात करते हैं।

(1) कुषाणकालीन इंद्र की प्रतिमा –

Standing Indra

– The Arts Of South And Southeast Asia (The Metropolitan Museum Of Art Bulletin Spring 1994) Vol. LI, No. 4, Fig. 11 a, b. Page no. 24

यह लगभग 200 ईस्वी प्राचीन है तथा Metropolitan संग्रहालय में सुरक्षित है। इस प्रतिमा के नीचे ब्राह्मी लिपि में “इंद्र: देवराज” भी लिखा है। जो नवबौद्ध ये कहते हैं कि प्रतिमाओं पर नाम कहां है? तो वे लोग यह मुर्ति अवश्य देखें, यहां पर नीचले हिस्से पर नाम भी लिखा है, जिसे हमने लाल घेरे से दर्शाया है।

मथूरा संग्रहालय में भी वज्र धारी इंद्र देव की प्रतिमा है, जो कि कुषाण कालीन है –

Indra

– Indian Archaeology 1981 – 82 : A Review, Plate xxxiv, C

अत: इंद्र की मुर्ति की प्राचीनता बुद्ध मुर्ति निर्माण अर्थात् कुषाणकालीन तक जाती है।
अब हम और प्राचीनता पर आते हैं –

(2) पांचाल मित्र शासक अग्नि मित्र के सिक्कों पर इंद्र देव का अंकन –

Coins

– A Study Of Pancala Coins In Historical Perspective (Thesis), 2013, Plate – 9

ये सिक्के 100 ईसापूर्व से 100 ईस्वी के मध्य है। इनमें एक तरफ राजा का नाम होता है तथा दूसरी तरफ राजा का नाम जिस देवता पर आधारित है, उसका चित्र अथवा चिह्न का अंकन होता है। जैसे कि राजा का नाम अग्निमित्र है तो सिक्के के एक तरफ ब्राह्मी में “अग्निमित्रस” होगा तथा दूसरी तरफ अग्नि देव का चित्रण होगा। उसी प्रकार उपरोक्त सिक्कों पर एक तरफ ब्राह्मी लिपी में “इंद्रमित्रस” है तथा दूसरी तरफ वज्र धारण किये हुए इंद्र का चित्रण है। यहां हमने इंद्रमित्र के दो सिक्कों का चित्र दिया है तथा आकृति स्पष्टीकरण के लिए उन सिक्कों पर इंद्रदेव की आकृतियों को लाल रंग से रंगकर भी दर्शाया है। आप रंगीन तथा वास्तविक दोनों आकृतियों की तुलना कर सकते हैं। अत: यह सिक्का भी नाम के साथ – साथ इंद्र देव के अंकन की प्राचीनता दर्शाता है।

(3) बौद्ध स्तूप के फलकों पर –

Miracle of sankasya

– Sanchi, Plate no.V

जैसा कि हमने आपको ऊपर बताया था कि पूर्व उपस्थित वैदिक मत पर अपना प्रभाव दर्शाने के लिए बौद्धों ने अपने मत में इंद्रादि वैदिक देवों का प्रयोग किया था। इंद्र का उल्लेख त्रिपिटकों में अनेकों स्थानों पर है। यहां हमने सांचि स्तूप के एक फलक का चित्र दिया है। यह बुद्ध से जुडे एक चमत्कार का चित्रांकन है। इस चमत्कार के अनुसार बुद्ध अपनी माता को उपदेश देने के लिए 33 देवताओं के स्वर्ग लोक में गये थे। वहां तीन महीने रुकने के पश्चात् वे संकिशा नामक स्थान पर इंद्र और ब्रह्मा के साथ स्वर्ग से सीढ़ियों के द्वारा नीचे उतरे थे।

Miracle of sankasya

– Sanchi, Page no. 37

यहां चमत्कारिक कथा का चित्रांकन सांचि स्तूप के फलक पर हुआ है, इससे कथा की प्रामाणिकता पर कोई भी संदेह शेष नहीं रहता है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि सांचि स्तूप निर्माण से पूर्व तथा इन कथाओं के निर्माण के पूर्व भी इंद्रादि वैदिक देवों की मान्यताऐं थी।

(3) पंचमार्क सिक्कों पर इंद्र तथा इंद्रध्वज का अंकन –

GH450-61

– The Numismatic Chronical (1966-), Vol. 163 (2003), Plate no. 18, fig. no. 8, Coin no. GH450 – 61

इस सिक्के पर बने संकेताक्षर निम्न सारणी में देखें –

Indian punch marked coins

– The Numismatic Chronical (1966-), Vol. 163 (2003), Plate no. 19

यहां उपरोक्त दर्शाया गया सिक्का क्रमांक GH450 – 61 पर अंकित संकेत चित्रों का प्रत्यांकन दर्शाया है। यहां सारणी में क्रमांक 12 पर GH450 – 61 के संकेत चित्र अंकित है। इस सारणी तथा वास्तविक चित्र में हमने एक संकेत को लाल घेरे से दर्शाया है। इस चिह्न की मुद्राशास्त्रियों के द्वारा “इंद्रध्वज” के रुप में पहचान की गई है। अत: मौर्य तथा पूर्व मौर्य काल में भी इंद्रदेव और इंद्रध्वज का प्रचलन था।
इस संकेत के इंद्रध्वज होने का एक सबसे बडा प्रमाण हम पांचाल मित्र शासक इंद्रमित्र के ही एक सिक्के से देते हैं। जैसा हमने ऊपर बताया था कि पांचाल मित्र शासकों के सिक्कों में एक तरफ राजा का नाम होता है तथा दूसरी तरफ राजा का नाम जिस देव पर आधारित है उस देव का चित्र अथवा उससे सम्बंधित चिह्न होता है। इसी प्रकार इंद्रमित्र के सिक्कों के दूसरी तरफ वज्रधारी इंद्र देवता, वज्र तथा इंद्रध्वज का चित्र होता है।

1344.AE

– Ancient Indian Coins: A Comprehensive Catalogue, coin no. 1344, page no. 207

यहां आप देख सकते हैं कि सिक्के के एक तरफ इंद्रमित्र लिखा है तथा दूसरी ओर इंद्रध्वज का प्रतीक है। अत: अब किसी को भी इस चिह्न के वैदिक देवता इंद्र से सम्बन्धित होने में संदेह नहीं रहना चाहिए।

अब पंच मार्क सिक्के पर हम इंद्र की आकृति की पहचान करते हैं।

Coin

इस सिक्के के संकेत चिह्नों को निम्न सारणी में देखें –

Indian punch marked coins

– The Numismatic Chronical (1966-), Vol. 163 (2003), Plate no. 22

यहां इस सिक्के का क्रमांक GH572 है तथा यह सिक्का मौर्य एवं पूर्व मौर्य कालीन है। यहां हमने सारणी तथा वास्तविक सिक्के पर एक आकृति को लाल घेरे से चिह्नित किया है। इस आकृति की तुलना आप लोग इंद्रमित्र के सिक्कों पर बनी इंद्र देवता की आकृति से करें तो आप लोग देखेगें कि दोनों आकृतियों में अत्यंत समानता है। यह आकृति पांचाल शासक इंद्रमित्र के सिक्के पर अंकित वज्रधारी इंद्र देवता के समान ही है। अत: पंचमार्क सिक्के पर बनी यह आकृति वज्रधारी इंद्र ही है। इससे इंद्र देव की प्राचीनता मौर्य तथा पूर्व मौर्य काल सिद्ध होती है। अब हम इंद्र देव की मान्यता तथा पूजन की इससे भी पूर्व प्राचीनता को देखते हैं।

(4) मित्तानी व हित्तानी सभ्यताओं के संधिपत्र में वैदिक देवों का नाम –

Vedic Dev

– Mitteilungen der Deutschen Orient – Gesellschaft zu Berlin, Dezember 1907, No. 35, page no. 51

बोगाज कुई नामक एक स्थान पर कीलाक्षर लिपि में एक शिलालेख प्राप्त हुआ था। यह शिलालेख मित्तानी और हित्तानी नामक दो प्राचीन राज्यों के मध्य एक संधि पत्र था। इस शिलालेख में अन्य देवों के साथ – साथ एक पंक्ति में वैदिक देवों का भी उल्लेख था। यह अभिलेख Hugo Winckler ने 1907 में खोजा था। इसका प्रकाशन भी Winckler ने किया था। Winckler द्वारा प्रकाशित पाठ का ही रोमन लिप्यन्तरण हमने ऊपर दिया है।
अभिलेख में उल्लेखनीय वैदिक देवों के पंक्ति वाले पाठ का पुनः प्रकाशन Jacobi ने रायल एशियाटिक सोसाइटी के एक शोधपत्र में किया था, जो इस प्रकार है –

In-dar

– Journal Of The Royal Asiatic Society Of Great Britain And Ireland (Jul. 1909), Page no. 723

यहां अभिलेख में वैदिक देवों के नाम इस प्रकार है – मित्र, वरुण, इंद्र और नास्त्यो।

यह अभिलेख लगभग 1400 ईसापूर्व प्राचीनतम है। इस अभिलेख में न केवल इंद्र अपितु अन्य भी वैदिक देवों का उल्लेख है। इस अभिलेख के प्रमाण से पुरातात्विक रुप से यह निष्कर्ष निकलता है कि इंद्र देव की मान्यता न केवल कुषाण, न केवल मौर्यों अपितु बुद्ध के जन्म से भी सैकडों वर्ष प्राचीनतम है।
जो नवबौद्ध वैदिक देवों के बुद्ध से प्राचीनतम पुरातात्विक सबूत मांगते हैं तो यह लेख उनकी सेवा में हाजिर है। अत: इंद्र देव बुद्ध के पुरातात्विक तथाकथित साक्ष्यों से हजारों साल प्राचीनतम है।

संदर्भित ग्रंथ एवं पुस्तकें –                                                     
1) The Metropolitan Museum Of Art Bulletin Spring (1994) Vol. LI, No. 4

2) A Study Of Pancala Coins In Historical Perspective (Thesis), 2013 – Swati Gupta

3) Sanchi – Debala Mitra                             

4) The Numismatic Chronical (1966-), Vol. 163 (2003)

5) Mitteilungen der Deutschen Orient – Gesellschaft zu Berlin, Dezember 1907, No. 35

6) Journal Of The Royal Asiatic Society Of Great Britain And Ireland (Jul. 1909)

7) Ancient Indian Coins: A Comprehensive Catalogue – Wilfried Pieper

8) Indian Archaeology 1981 – 82 : A Review

संदर्भित लिंक

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