हमारा सनातनधर्मी सदैव से ‘आनन्द ‘ से परिपूर्ण परमानन्द के सानिध्य में रहने वाली संस्कृति के रूप में विकसित हुआ है । यहाँ अलग अलग समय पर अलग – अलग तरह के तीज , त्योहार और समारोहों का प्रावधान है। होली , दीपावली , दशहरा जैसे आनन्दोत्सव हमारे यहाँ हर्षोल्लास से मनाया जाता है । बहुत से पर्व महिला मूलक हैं जिसमें व्रत , संकल्प और मनोरंजन है । यहाँ विवाह भी एक ऐसा समारोह है जिसमें कई दिन पहले से कई दिन बाद तक गीत-संगीत , नाच-गाना, आनन्द और उल्लास रहता है ।
अन्ततः हम सनातनी आनन्दित रहने के अवसर तलाश करते रहते हैं । इस आनन्द और सहकार का परिणाम एक सभ्य और संगठित समाज हमें प्राप्त होता है , जो हमारी सामाजिक संरचना को दृढ़, स्थायी और अतिसुरक्षित बनाता है , साथ ही साथ इन समारोहों में बच्चों की भागीदारी से उच्च गुणयुक्त संस्कार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानान्तरित हो कर हमारी सनातन संस्कृति के अक्षुण्ण प्रवाह को निरंतरता प्रदान करते है और हमारी सांस्कृतिक विरासत को और अधिक सुदृढ़ बनाते हैं।
इससे इतर जितने भी नास्तिक सम्प्रदाय हैं उनमें इस तरह के आयोजनों का सर्वथा लोप होता है । इनका जीवन नितांत नीरस और आनन्दहीन होता है । विवाह जैसी सामाजिक प्रक्रिया भी मात्र एक औपचारिकता ही होती है । इनकी संस्कृति में सांस्कृतिक कार्यक्रम जैसा कोई विधान ही नहीं है । 2500 वर्ष बाद भी ये एक स्थायी विवाह पद्घति की रचना भी नहीं कर पाए । त्योहार जैसी विचारधारा ही नहीं विकसित कर पाए । आनंद , मनोरंजन , प्रसन्नता आदि की कल्पना भी इनके लिए अभिशाप है , परिणामस्वरूप ये एक एकाकी और अभिशप्त जीवन जीने के लिए बाध्य है । गीत – संगीत , नाच-गाना , आनन्दोत्सव आदि इनके धर्मशास्त्रों में वर्जित है । सांस्कृतिक विरासत का पूर्णतया लोप है , जिसके कारण ये दुःखी , तनावग्रस्त , झगड़ालू और संकीर्ण मानसिकता के हो जाते है । इनके सामाजिक बन्धन अत्यन्त कमजोर और क्षीण होने के कारण ये सदैव असुरक्षा और हीनभावना के शिकार होते रहते है । ये कटु वचन बोलने वाले और संस्कार विहीन रहते हैं।
हमारा सनातनी समाज आनन्द का उच्चतम शिखर प्राप्त कर सामाजिक, मानसिक और शारीरिक रूप से सुदृढ हो जो भी संकल्प लेता है उसे अवश्य पूर्ण करता है और नित सफलता की ओर अग्रसर होता रहता है ।
इसके ठीक विपरीत नास्तिक सम्प्रदाय असफलता के कारण हीनभावना का शिकार हो नशा इत्यादि में लिप्त हो कर अपना जीवन नष्ट कर लेता है ।
अन्तिम वक्तव्य के रूप में कहना चाहूंगा कि सनातन की इस उर्जान्वित , आनन्दित , ओजपूर्ण , मर्यादित , गौरवशाली संस्कृति के सांस्कृतिक विरासत को धर्म से सुसज्जित कर एक आदर्श समाज के निर्माण में अपनी भूमिका को सुनिश्चित करें ।
डॉ दुष्यंत सिंह
BHMS
होम्योपैथिक चिकित्सक और लेखक



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