मध्यकालीन यूरोप में अनेक ऐसे चिकित्सा विधि प्रचलित थें जो पूरी तरह अवैज्ञानिक और मरीज के जीवन को खतरें में डालने वाले थें।इन विधियों से मरीज की मृत्यु तक हो जाया करती थी।15 वी शताब्दी से 18 शताब्दी तक ऐसे अजीब तरह की चिकित्सा पद्धति प्रचलित हुई जो बहुत कष्ट पूर्ण और अवैज्ञानिक थी। कुछ महत्वपूर्ण मध्यकालीन चिकित्सा विधि जो यूरोप में प्रचलित हुई वो इस प्रकार है।
1.हकलाने का उपचार
18वीं और 19वीं शताब्दियों में हकलाने का उपचार यातना देकर किया जाता था ।डॉक्टरों हकलाने वालों को ठीक करने के लिए जिस विधि का इस्तेमाल करते थे वह कष्ट पूर्ण थी। डाक्टर उनकी जीभ का एक हिस्सा काट देते थे । इस विधि में ज्यादा खून बह जाने और बाद में संक्रमण होने से रोगी की मृत्यु हो जाती थी।यह विधि पूरे यूरोप में प्रचलित थी।
2.पारा से उपचार
आज, यह सर्वविदित है कि पारा विषैला होता है। लेकिन मध्य काल यूरोप और मिस्र में इसका प्रयोग उपचार में किया जाता था।इस विधि का प्रयोग सिफलिस के इलाज के लिए किया जाता था।इसका इस्तेमाल घावों के लिए एंटीसेप्टिक के रूप में भी किया जाता था। इस विधि में पारा उपचार के लिए उपचार को मुंह से, मलाशय से या दिया जा सकता था। “पारा, नींबू का रस, चरबी, राख और तेल से बना मरहम पूरे तन पर सात बार [सात एक जादुई संख्या है] फैलाया जाता है।यह उपचार “ तंत्रिका और प्रतिरक्षा प्रणाली, पाचन तंत्र, त्वचा, फेफड़ों और गुर्दे के लिए विषाक्त है।” इसके दुष्प्रभाव कंपन, अनिद्रा, स्मृति हानि और मस्तिष्क रोग से रोगी में आ जाता था।

3. ट्रैपनेशन
सिरदर्द और मिर्गी के इलाज के लिए मस्तिष्क में नुकीले वस्तु से छेद कर दिया जाता था।
यह अत्यंत दर्द पूर्ण विधि थी
यह विधि यूरोप और मिस्र में प्रचलित थी।इस विधि में चिकित्सक यह मानते थे कि मस्तिष्क पर छेद करने से बिमारी निकल जाती है।

4.तम्बाकू धुआं एनीमा
यूरोपीय चिकित्सा के इतिहास में तम्बाकू एनीमा के इस्तेमाल के अनगिनत उदाहरण हैं। इस तकनीक में इस उद्देश्य के लिए डिज़ाइन किए गए उपकरणों का उपयोग करके गुदा के माध्यम से रोगी तक तंबाकू का धुआँ पहुँचाया जाता था।
इस पद्धति का उद्देश्य श्वसन संबंधी समस्याओं से लेकर सर्दी-जुकाम तक हर तरह के इलाज के लिए था। इसका इस्तेमाल हैजा से लड़ने या डूबे हुए लोगों को होश में लाने के लिए भी किया गया।यह मध्यकालीन यूरोप में प्रचलित चिकित्सा विधि थी।

5.बवासीर को खत्म करने के लिए गर्म लोहे का प्रयोग
यूरोपीय मध्य काल में बाबासीर के उपचार के लिए यूरोपियन जो तकनीक अपनाते थे, उनमें से एक थी लाल गर्म लोहे की छड़ का इस्तेमाल।गर्म लोहे की छड़ को गुदा मार्ग से स्पर्श कराया जाता था,इससे गुदा द्वार की त्वचा जल जाती थी
और संक्रमण फैल जाता था और रोगी की मृत्यु हो जाती थी।

6.पशु गोबर का मलहम
यूरोप और मिस्र के चिकित्सक बीमारियों और चोटों के इलाज के लिए मानव और पशु मल का इस्तेमाल करते थे। 1500 ईसा पूर्व के एबर्स पेपिरस के अनुसार, गधे, कुत्ते, हिरन और मक्खी के गोबर को उनके उपचार गुणों और बुरी आत्माओं को दूर भगाने की क्षमता के लिए जाना जाता था। हालाँकि इन घृणित उपचारों से कभी-कभी टेटनस और अन्य संक्रमण हो सकते हैं, लेकिन वे संभवतः पूरी तरह से अप्रभावी नहीं थे – शोध से पता चलता है कि कुछ प्रकार के जानवरों के गोबर में पाए जाने वाले माइक्रोफ्लोरा में एंटीबायोटिक पदार्थ होते हैं।
7..केनिबल क्योर
इस विधि में मृत आदमी की लाश को ममी बना लिया जाता था।
फिर ममी का पाउडर बनाकर उसका उपयोग किया जाता था
रोमन यह विधि का अपनाते थे मिस्र के लोग भी इस चिकित्सा विधि के आधार पर इलाज करते थे।
इंग्लैंड के राजा चार्ल्स द्वितीय मानव कंकाल का पाउडर एल्कोहल के साथ पिया था। यह एक चिकित्सा विधि थी। यह इलाज मिर्गी और सिरदर्द तथा अन्य बिमारी में दिया जाता था।

8.रक्तपात
इस विधि में मरीज के शरीर से नुकीली वस्तु चुभाकर रक्त बहने दिया जाता था
चिकित्सक का मानना था कि बिमारी रक्त में होती है।
और इस विधि में रक्त निकाल कर बिमारी ठीक की जा सकती है।
यह विधि यूरोप मध्य काल में प्रचलित थी

9.मानव मूत्र चिकित्सा
1666 में लंदन के एक चिकित्सक जॉर्ज थॉमसन ने प्लेग के लिए मूत्र का उपयोग करने की सिफारिश की थी। दाने के मामले में राख के साथ मिश्रित बासी मूत्र को बच्चे के नितंबों पर लगाया जाता था। उस समय के औषध विक्रेता बेचने के लिए संसाधित या आसुत मूत्र बनाते थे। मध्यकालीन यूरोपीय महिलाएँ सौंदर्य उपचार के रूप में अपनी त्वचा पर अपने मूत्र का उपयोग करती थीं। यह मूत्र चिकित्सा यूरोप और खासकर इंग्लैंड में लोकप्रिय थीं।

10. ग्रीक व्हाइट(Greek white)
इस विधि में कुत्ते के सूखें मल पर सफेद लेप लगाकर रोगी को
दिया जाता था।
यूरोप के मध्यकालीन चिकित्सक गले की खराश, टॉन्सिलिटिस और फेफड़ों की बीमारियों के उपचार के लिए करते थे।
आपने देखा की यूरोप में मध्यकालीन और प्राचीन समय में चिकित्सा विधि बहुत अवैज्ञानिक और दर्द पूर्ण थी। चिकित्सा का मूलभूत ज्ञान भी नहीं था। स्वयं इंग्लैंड के राजा ने कंकाल का चूर्ण एल्कोहल के साथ पिया दवाई समझकर। यूरोप में चिकित्सा पद्धति 19 सदी के आरंभ तक ऐसे ही विचित्र तरह से चलती रही।
जबकि भारत में प्राचीन और वैदिक काल से बहुत वैज्ञानिक तरीके से चिकित्सा पद्धति विकसित थी। चरक व सुश्रुत ने वैज्ञानिक चिकित्सा और शल्य चिकित्सा विधि विकसित की। अतः आप यहां देख सकते हैं कि भारत चिकित्सा के क्षेत्र में बहुत आगे था।
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