पहले संक्षिप्त में समझते हैं पूरा प्रकरण
Bhojshala मध्य प्रदेश के धार शहर में स्थित एक ऐतिहासिक स्थल है। यहां एक प्राचीन देवी सरस्वती का मंदिर है, परंतु मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद मानता है। इसी वजह से यह विवादों में आ गया।
ASI ने 2003 में वहां नमाज करने की अनुमति दी थी, जिसे मध्यप्रदेश हाई कोर्ट में चैलेंज किया गया।Bhojshala मामले में Madhya Pradesh High Court का बड़ा फैसला 15 मई 2026 को आया। कोर्ट ने भोजशाला परिसर को देवी सरस्वती (वाग्देवी) का मंदिर माना और 2003 की ASI व्यवस्था, जिसमें शुक्रवार की नमाज़ की अनुमति थी, उसे रद्द कर दिया। इससे पहले 11 मार्च 2024 को हाई कोर्ट ने ASI को वैज्ञानिक सर्वे करने का आदेश दिया
पूरा कालक्रम
1034 में राजा भोज द्वारा भोजशाला की स्थापना
भोजशाला पर सर्वप्रथम आक्रमण कुख्यात और क्रूर आक्रमणकारी अलाउद्दीन खिलजी ने सन् 1305 ईस्वी में किया था। इतिहास गवाह है कि भोजशाला के 1200 से अधिक विद्यार्थियों और शिक्षकों का नरसंहार कर दिया गया क्योंकि उन्होंने इस्लाम धर्म अपनाने से इनकार कर दिया था।हिंदू राजा महाल देव ने वीरतापूर्वक युद्ध लड़ा और अपने प्राणों की आहुति दे दी।इसके बाद भोजशाला के एक हिस्से को ध्वस्त कर दिया गया और भवन परिसर में उत्कीर्ण देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त कर दिया गया।
1401 में शासक दिलावर खान ने सरस्वती मंदिर के एक हिस्से को मस्जिद में परिवर्तित करने का प्रयास किया था।
सन् 1514 ईस्वी में महमूद शाह खिलजी ने भोजशाला पर दूसरी बार आक्रमण किया और भोजशाला परिसर पर कब्जा करने का असफल प्रयास किया। हालांकि, उसने सरस्वती मंदिर के बाहर की भूमि का एक हिस्सा यानी मंदिर परिसर पर कब्जा कर लिया,और यहां मकबरा बना दिया।
1935 धार रियासत (ब्रिटिश काल) में हिंदुओं को मंगलवार को पूजा, मुसलमानों को शुक्रवार को नमाज की अनुमति दी।
1952 भोजशाला परिसर एक संरक्षित स्मारक के रूप में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के नियंत्रण में आ गया।
2003 विवाद बढ़ने पर हिंदुओं को प्रत्येक मंगलवार को पूजा और वसंत पंचमी पर विशेष पूजा की अनुमति। मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार 1 बजे से 3 बजे तक नमाज की अनुमति ।
2024 ASI सर्वे की मांग करते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
मुस्लिम पक्ष सर्वे पर रोक लगवाने सुप्रीम कोर्ट गया, परंतु कोर्ट ने याचिका ख़ारिज कर दी।
कोर्ट के आदेश पर ASI ने करीब 98 दिनों तक वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया। सर्वे में पुरातात्विक, स्थापत्य और वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग किया गया।
Archaeological Survey of India ने भोजशाला सर्वे की लगभग 2000 पन्नों की रिपोर्ट 15 जुलाई 2024 को Madhya Pradesh High Court में जमा की थी।
कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला (15) मई 2026) मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया। विवादित भोजशाला परिसर को मां वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर माना,और asi के 2003 की व्यवस्था को रद्द कर दिया।
ASI Findings
परिसर में वैज्ञानिक जांच, सर्वेक्षण और उत्खनन के दौरान देखी और प्राप्त की गई सभी वस्तुओं का विधिवत दस्तावेजीकरण किया गया। इन वस्तुओं में शिलालेख, मूर्तियां, सिक्के, स्थापत्य के अवशेष, मिट्टी के बर्तन और टेराकोटा, पत्थर, धातु और कांच की वस्तुएं शामिल हैं। जिन वस्तुओं को प्राथमिक उपचार की आवश्यकता थी, उनका उपचार स्थल पर ही किया।
इस स्थल पर निर्मित इन सबसे प्राचीन संरचनाओं के अवशेष आज भी यथास्थान मौजूद हैं और चबूतरे के निर्माण के दौरान प्रयुक्त बेसाल्ट की मोटी और भारी शिलाओं के नीचे दबे हुए हैं। जांच के दौरान प्राप्त कलाकृतियों के आधार पर, इन ईंट संरचनाओं को परमार काल, अर्थात् 10वीं-11वीं शताब्दी ईस्वी का माना जा सकता है।
बेसाल्ट से निर्मित विस्तारित संरचना को बारीक दानेदार बेसाल्ट की बड़ी शिलाओं पर उत्कीर्ण अनेक शिलालेखों से सुशोभित किया गया था। वर्तमान संरचना में और उसके आसपास पाए गए कई शिलालेख इसी संरचना में स्थापित किए गए होंगे। ‘शारदा सदन’ का उल्लेख परिजातमंजरी में मिलता है, जो एक बड़ी शिला पर उत्कीर्ण है जिसे वर्तमान संरचना में स्थापित किया गया है।
स्तंभों की कतारों में स्थित इन स्तंभों और स्तंभों की कला और वास्तुकला से संकेत मिलता है कि ये मूल रूप से मंदिरों का हिस्सा थे। मौजूदा संरचना में इनके पुन: उपयोग के लिए, इन पर उकेरी गई देवी-देवताओं और मानव आकृतियों को विकृत कर दिया गया था
इस स्थल पर पाए गए सबसे पुराने सिक्के इंडो-ससानियन हैं, जिन्हें 10वीं-11वीं शताब्दी का माना जा सकता है, जब परमार राजा धार को अपनी राजधानी बनाकर मालवा में शासन कर रहे थे।
जांच के दौरान कुल 94 मूर्तियां, मूर्तिकला के टुकड़े और मूर्तिकला चित्रण वाले वास्तुशिल्पीय भाग पाए गए। ये बेसाल्ट, संगमरमर, शिस्ट, मृदुपयोगी पत्थर, बलुआ पत्थर और चूना पत्थर से बने हैं। संरचना में प्रयुक्त खिड़कियों, स्तंभों और बीमों पर चार भुजाओं वाले देवताओं की मूर्तियां उकेरी गई थी
इस स्थल पर पाए गए सबसे पुराने सिक्के इंडो-ससानियन हैं, जिन्हें 10वीं-11वीं शताब्दी का माना जा सकता है, जब परमार राजा धार को अपनी राजधानी बनाकर मालवा में शासन कर रहे थे।
उकेरी गई मूर्तियों में गणेश, ब्रह्मा अपनी पत्नियों सहित, नरसिम्हा, भैरव, देवी-देवता, मानव और पशु आकृतियाँ शामिल हैं।
पशु आकृतियों में शेर, हाथी, घोड़ा, कुत्ता, बंदर, साँप, कछुआ, हंस और पक्षी शामिल हैं। पौराणिक और मिश्रित आकृतियों में विभिन्न प्रकार के कीर्तिमुख (मानव चेहरा, शेर का चेहरा, मिश्रित चेहरा शामिल हैं।
मस्जिदों में मानव और पशु आकृतियों की अनुमति न होने के कारण कई स्थानों पर ऐसी छवियों को छेनी से तराशकर या विकृत कर दिया गया है।
नागरी लिपि में महीन दानेदार बेसाल्ट पर उत्कीर्ण 150 से अधिक शिलालेख और टुकड़े मिले हैं।
इन शिलालेखों में परमार राजाओं द्वारा रचित साहित्यिक कृतियाँ थीं, जो परमार शासन के दौरान रचित या प्रतिलिपि की गई थीं।
पूर्वी स्तंभों की कतार में लगे एक बड़े शिलालेख में प्राक्तित भाषा में दो कविताएँ हैं, जिनमें से प्रत्येक में 109 छंद हैं। इनमें से पहली कविता को उपसंहार में अवनिकूर्माशतम कहा गया है और इसके रचयिता महाराजाधिराज परमेश्वर भोजदेव माने जाते हैं। यद्यपि दूसरी कविता के अंत में कोई उपसंहार नहीं है, फिर भी कहा जाता है कि इसकी रचना भी परमार राजा भोज ने की थी।ये शिलालेख सरस्वतीनमः, ओम नमः शिवाय जैसे देवताओं के आह्वान से शुरू होते हैं।
पूर्वी स्तंभों में स्थापित एक अन्य बड़ा शिलालेख परिजातमंजरी-नाटिका या विजयश्री को समाहित करता है और इसके रचयिता मदन, राजा अर्जुनवर्मन के गुरु, परमार वंश के धरा के राजा, जो सम्राट (सर्वभौम) भोजदेव के वंशज हैं, के नामों का उल्लेख करता है।
एक शिलालेख में यह भी उल्लेख है कि परिजातमंजरी-नाटिका का पहला प्रदर्शन देवी सरस्वती (सारदादेव्याहसदमणि) के मंदिर में हुआ था। वर्तमान संरचना में और उसके आसपास पाए गए कई टुकड़ों में समान पाठ और सैकड़ों की संख्या में श्लोक संख्याएँ हैं, जो यह दर्शाती हैं कि ये रचनाएँ लंबी साहित्यिक रचनाएँ थीं।
पश्चिमी स्तंभों की पंक्ति में दो अलग-अलग स्तंभों पर उत्कीर्ण दो नागकर्णिका शिलालेख व्याकरणिक और शैक्षिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। ये दोनों शिलालेख एक शिक्षा केंद्र के अस्तित्व की परंपरा को दर्शाते हैं, जिसकी स्थापना राजा भोज द्वारा की गई मानी जाती है।
एक शिलालेख के शुरुआती श्लोकों में परमार वंश के उदयदित्य के पुत्र राजा नरवर्मन (1094-1133 ईस्वी के बीच शासन किया) का उल्लेख है।
सभी संस्कृत और प्राकृत शिलालेख अरबी और फारसी शिलालेखों से पहले के हैं, जो यह दर्शाता है कि संस्कृत और प्राकृत शिलालेखों के उपयोगकर्ता या उत्कीर्णक पहले से ही इस स्थान पर मौजूद थे।
1455 ईस्वी) के खिलजी बादशाह महमूद शाह के शिलालेख के पंक्ति 17-18, जो धार में अब्दुल्ला शाह चांगल के मकबरे के द्वार पर अंकित है (एपोग्राफिया इंडो-मोस्लेमिका 1909-10), में उल्लेख है “(पंक्ति 17) यह वीर पुरुष लोगों की भीड़ के साथ इस पुराने मठ में धर्म के केंद्र से पहुंचा (पंक्ति 18) मूर्तियों को नष्ट कर दिया और इस मंदिर को हिंसक रूप से मस्जिद में बदल दिया”।
प्राप्त स्थापत्य अवशेष, मूर्तिकला के टुकड़े, साहित्यिक ग्रंथों से युक्त शिलालेखों की बड़ी शिलाएँ, स्तंभों पर नागकर्णिका शिलालेख आदि से संकेत मिलता है कि इस स्थल पर साहित्यिक और शैक्षिक गतिविधियों से संबंधित एक विशाल संरचना विद्यमान थी। वैज्ञानिक जाँचों और जाँचों के दौरान प्राप्त पुरातात्विक अवशेषों के आधार पर, इस पूर्व-मौजूद संरचना को परमार काल का माना जा सकता है।
वैज्ञानिक जांच, सर्वेक्षण और पुरातात्विक उत्खनन, प्राप्त वस्तुओं के अध्ययन और विश्लेषण, स्थापत्य अवशेषों, मूर्तियों और शिलालेखों के अध्ययन, कला और मूर्तिकला के आधार पर यह कहा जा सकता है कि वर्तमान संरचना पूर्व के मंदिरों के भागों से बनाई गई थी।
दिनांक 11.3.2024 के न्यायालय आदेश के अनुसार किए गए एएसआई के वैज्ञानिक सर्वेक्षण में की गई videography में finding




मकबरा निर्माण
मौलाना कमालुद्दीन की मृत्यु के 204 वर्ष बाद ‘कमल मौला’ के नाम से एक मकबरा बनवाया। यह लिखित इतिहास में दर्ज है कि मौलाना कमालुद्दीन की मृत्यु सन् 1310 में कर्णावती (जिसे अब अहमदाबाद के नाम से जाना जाता है) में हुई थी और उन्हें अहमदाबाद में दफनाया गया था। मुस्लिम आक्रमण के कारण भोजशाला की स्थिति बदल गई और भोजशाला क्षेत्र में तलवार की नोक पर कई मकबरे/कब्रें जबरन और अवैध रूप से बनाई गईं। (जजमेंट पेज संख्या 11)
संस्कृत शिलालेख एवं सिक्के
ASI को 150 से अधिक संस्कृत और प्राकृत शिलालेख मिले। इनमें ‘सरस्वत्यै नमः’ और ‘ॐ नमः शिवाय’ जैसे उल्लेख थे। एक बड़े शिलालेख में ‘पारिजातमंजरी-नाटिका’ का उल्लेख मिला, जिसमें लिखा था कि इसका मंचन “शारदा देवी के सदन” में हुआ था। कोर्ट ने कहा कि ‘शारदा’ का संबंध देवी सरस्वती से है और ‘सदन’ शिक्षा केंद्र का संकेत देता है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यह स्थल संस्कृत अध्ययन और देवी सरस्वती उपासना से जुड़ा था। एवं शिलालेखों में परमार वंश के राजाओं का नाम मिलता है एवं परमार राजा के शासन काल के सिक्के भी मिलते हैं।
खंभे, स्तंभ, मूर्ति
ASI को परिसर में 106 खंभे और 82 स्तंभ मिले। रिपोर्ट में कहा गया कि इनकी स्थापत्य शैली मंदिरों जैसी है। इनमें देवी-देवताओं और मानव आकृतियों को बाद में विकृत किए जाने के संकेत मिले। कई आकृतियां छेनी से काटी गई थीं उकेरी गई मूर्तियों में गणेश, ब्रह्मा अपनी पत्नियों सहित, नरसिम्हा, भैरव, देवी-देवता, मानव और पशु आकृतियाँ शामिल हैं।
मुस्लिम पक्ष का दावा क्यों अस्वीकार हुआ?
मुस्लिम पक्ष ने दावा किया था कि यह शुरू से मस्जिद थी और वक्फ संपत्ति है। लेकिन अदालत ने कहा कि ऐसा कोई साक्ष्य पेश नहीं किया गया, जिससे साबित हो कि 1034 ईस्वी से पहले यहां मस्जिद थी। कोर्ट ने कहा कि केवल लंबे उपयोग से दूसरे समुदाय के अधिकार समाप्त नहीं हो जाते। साथ ही मस्जिद केवल वक्फ भूमि पर बन सकती है, लेकिन भूमि के वक्फ होने का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला।
रेवेन्यू रिकार्ड में भूमि
रिकॉर्ड में प्रस्तुत दस्तावेजों के माध्यम से, यह कहा गया है कि 1935-1936 तक के राजस्व अभिलेखों में ग्राम धार के सर्वेक्षण क्रमांक 313 (पुराना 604) के अंतर्गत परिसर का विवरण भोजशाला एवं मंदिर के रूप में दर्ज है। चूंकि भोजशाला को 1904 के स्मारक अधिनियम के तहत और उसके बाद 1951 में पुनः संरक्षित स्मारकों में से एक के रूप में अधिसूचित किया जा चुका है, इसलिए इसका प्रबंधन और नियंत्रण पूरी तरह से भारत सरकार/एएसआई द्वारा किया जाता रहा है। राजस्व अभिलेखों में कहीं भी ‘जामा मस्जिद’ का उल्लेख नहीं है। राज्य सरकार का यह भी तर्क है कि भोजशाला परिसर की संपूर्ण भूमि राज्य सरकार की है और स्वतंत्रता से पूर्व से ही एएसआई के प्रबंधन एवं नियंत्रण में रही है। इसलिए इसे कभी भी वक्फ संपत्ति घोषित नहीं किया जा सकता था। यह वक्फ अधिनियम की धारा 2 के तहत वैध वक्फ घोषित करने के लिए आवश्यक शर्तों को पूरा नहीं करता है और यह संपत्ति कभी भी किसी मुस्लिम व्यक्ति की नहीं थी जिसे वैध वक्फ बंदोबस्ती घोषित किया जा सके।
रिगवेद का उल्लेख
कोर्ट ने ऋग्वेद का उल्लेख करते हुए कहा कि देवी सरस्वती ज्ञान की देवी हैं और भोजशाला संस्कृत शिक्षा केंद्र था। अदालत ने कहा कि यह मानने से इनकार नहीं किया जा सकता कि संस्कृत शिक्षा के लिए बने उस स्थल पर मां सरस्वती का मंदिर रहा होगा।
बुद्ध कि प्रतिमा के संबंध में कोर्ट जजमेंट
ASI ने कोर्ट में बताया कि बुद्ध की कोई भी प्रतिमा स्थल से प्राप्त नहीं हुई।

कोर्ट का फैसला
अदालत ने माना कि भोजशाला मूल रूप से माँ वाग्देवी/सरस्वती का मंदिर थी।
2003 में Archaeological Survey of India (ASI) द्वारा बनाया गया वह प्रबंध, जिसमें मुसलमानों को शुक्रवार को नमाज की अनुमति थी, उसे रद्द कर दिया गया।
कोर्ट ने कहा कि परिसर को मंदिर के रूप में माना जाएगा और ASI इसकी देखरेख जारी रखेगा।
ASI सर्वे में मिले मंदिर-संबंधी अवशेष, शिलालेख, स्तंभ और मूर्तिकला के आधार पर अदालत ने कहा कि संरचना में परमारकालीन मंदिर के अवशेष मौजूद हैं।
Madhya Pradesh High Court ने अपने फैसले में यह भी कहा कि मुस्लिम पक्ष यदि मस्जिद बनाना चाहता है, तो वह धार जिले में वैकल्पिक जमीन (alternate land) के लिए राज्य सरकार से संपर्क कर सकता है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को वाग्देवी मूर्ति वापस लाने के विषय पर विचार करने के /सुझाव दिए।



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