इतिहास केवल घटनाओं का संग्रह नहीं होता, बल्कि वह उन कथाओं से भी बनता है जिन्हें समय-समय पर समाज के सामने सत्य के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। कई बार कुछ कहानियाँ इतनी बार दोहराई जाती हैं कि वे लोगों की स्मृति में “इतिहास” बन जाती हैं, चाहे उनके पीछे ठोस प्रमाण हों या नहीं। काशी विश्वनाथ मंदिर और औरंगजेब से जुड़ा एक वामपंथी प्रोपोगेंडा ऐसा ही एक उदाहरण है।
आज सोशल मीडिया, पॉडकास्ट और अनेक चर्चाओं में यह दावा किया जाता है कि औरंगज़ेब ने काशी विश्वनाथ मंदिर इसलिए तुड़वाया क्योंकि मंदिर परिसर में रानी के साथ दुर्व्यवहार एवं लूट हुआ था। यह कहानी भावनात्मक रूप से प्रभावशाली अवश्य है, लेकिन इसका कोई ऐतिहासिक साक्ष्य मौजूद नहीं है।
वामपंथी प्रोपोगेंडा की उत्पत्ति
1946 में प्रकाशित एक पुस्तक फेदर एंड स्टोन में पट्टाभि सीतारमैया ने औरंगजेब के बचाव में एक झूठी कहानी लिखा। जो इस प्रकार है
“अपने वैभव के चरम पर, औरंगज़ेब, किसी भी विदेशी राजा की तरह, अपने दल में कई हिंदू सरदारों को रखता था। वे सभी एक दिन बनारस के पवित्र मंदिर के दर्शन के लिए निकले। उनमें कच्छ की एक रानी भी थी। मंदिर के दर्शन के बाद जब दल लौटा, तो कच्छ की रानी गायब थी। उन्होंने उसे हर जगह, पूरब, उत्तर, पश्चिम और दक्षिण में खोजा, लेकिन उसका कोई सुराग नहीं मिला। अंत में, गहन खोज के बाद एक तहखाना या गुप्त स्थान मिला।
मंदिर का निचला तल, जो देखने में दो मंजिला ही लगता था। जब वहाँ जाने का रास्ता बंद पाया गया, तो उन्होंने दरवाजे तोड़ दिए और अंदर रानी की धुंधली परछाई देखी, जिनके गहने गायब थे। पता चला कि महंत धनी और गहने पहने तीर्थयात्रियों को चुनकर उन्हें मंदिर दिखाने के बहाने तहखाने में ले जाते थे और उनके गहने लूट लेते थे। उनके जीवन का क्या हुआ होगा, यह कोई नहीं जानता था। खैर, इस मामले में शरारत करने का समय नहीं था क्योंकि तलाशी पूरी लगन और तेजी से की जा रही थी। पुजारियों की इस दुष्टता का पता चलने पर औरंगजेब ने घोषणा की कि इस तरह की लूटपाट की जगह ईश्वर का घर नहीं हो सकती और इसे तुरंत ध्वस्त करने का आदेश दिया। और खंडहर वहीं छोड़ दिए गए। लेकिन इस तरह बच निकली रानी ने खंडहर पर मस्जिद बनाने की जिद की और उन्हें प्रसन्न करने के लिए बाद में एक मस्जिद का निर्माण किया गया।”
(फेदर एंड स्टोन , पेज नंबर 177 एवं 178)
श्री सीतारमैया ने अपनी कहानी के पक्ष में कोई भी प्रमाण नहीं दिया, बल्कि अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए वापस एक कहानी सुना दी, जो उसी पुस्तक में है।
श्री सीतारमैया ने अपनी झूठी कहानी के प्रमाण में जो कहानी लिखी वह कहानी इस प्रकार है –
“यह कहानी लखनऊ में एक दुर्लभ पांडुलिपि में मिलती है, जो एक सम्मानित मुल्ला के पास थी। उन्होंने इसे पांडुलिपि में पढ़ा था और हालांकि उन्होंने इसे खोजकर पांडुलिपि अपने एक मित्र को देने का वादा किया था, जिसे उन्होंने यह कहानी सुनाई थी, लेकिन वे अपना वादा पूरा किए बिना ही मर गए।”( फेदर एंड स्टोन पेज नंबर 178)
यहां ये जानना आवश्यक है, श्री सीतारमैया जिस पाडूलिपि की बात कर रहे हैं, उसे वह कभी स्वयं नहीं देखे, और वह पांडुलिपि कभी सार्वजनिक नहीं हुई और न ही उसका कोई प्रमाण सामने आया।जब श्री सीतारमैया ने कोई प्रमाण ही नहीं दिया फिर यह कहानी महज एक प्रोपोगेंडा सिद्ध हो जाती है, जिसे औरंगजेब के बचाव के लिए लिखा गया था।
बी. एन. पांडे द्वारा प्रोपोगेंडा का विस्तार
B. N. Pande ने श्री सीतारमैया की पुस्तक का संदर्भ देकर वापस सीतारमैया कि कहानी को पेश किया।BN pande कि पुस्तक इतिहास के साथ अन्याय में उसी कथा को और विस्तार दिया गया।यह पुस्तक 1993 में श्री पांडेय द्वारा दिए गए व्याख्यान पर आधारित थी।श्री पांडेय ने वापस वहीं कहानी बताई जो श्री सीतारमैया ने अपनी पुस्तक फेदर एंड स्टोन में लिखी थी, परंतु श्री पांडेय ने इसमें और भी भावनात्मक विवरण जोड़ते हुए यह तक लिखा कि रानी की अस्मिता लूटी गई थी। दिलचस्प बात यह है कि यह विवरण श्री सीतारमैया के पुस्तक में मौजूद नहीं था। अतः श्री पांडेय ने भी औरंगजेब के बचाव में प्रोपोगेंडा फैलाया।
समकालीन प्रमाण
जब किसी ऐतिहासिक घटना की जांच की जाती है, तो सबसे अधिक महत्व समकालीन और प्राथमिक स्रोतों को दिया जाता है। औरंगज़ेब के शासनकाल के लिए सबसे महत्वपूर्ण स्रोतों में से एक है मआसिर-ए-आलमगीरी। यह ग्रंथ SIQI MUSTAD KHAN द्वारा लिखा गया था, जो मुगल दरबार से जुड़े अधिकारी थे।
इस ग्रंथ में स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलता है कि
“सम्राट के आदेश पर काशी स्थित विश्वनाथ मंदिर को ध्वस्त किया गया। “(MAASIR-I-‘ALAMGIRI , Translate By JADU-NATH SARKAR, ROYAL ASIATIC SOCIETY OF BENGAL, Page No 55)
लेकिन पूरे विवरण में कहीं भी किसी रानी के अपहरण,लूट, अस्मिता भंग,तहखाने या पुजारियों द्वारा किए गए कथित अपराध का उल्लेख नहीं मिलता।
यह तथ्य महत्वपूर्ण इसलिए भी है क्योंकि यह ग्रंथ औरंगज़ेब की मृत्यु के कुछ ही वर्षों बाद पूरा हुआ था और इसे मुगलकाल का एक प्रमुख प्राथमिक स्रोत माना जाता है। प्रसिद्ध इतिहासकार Jadunath Sarkar ने भी इसका अंग्रेज़ी अनुवाद किया था, जिसे अकादमिक जगत में व्यापक मान्यता प्राप्त है।
निष्कर्ष
इतिहास को समझने के लिए किसी भी कहानी से अधिक साक्ष्यों पर भरोसा करना आवश्यक होता है। काशी विश्वनाथ मंदिर का विध्वंस एक ऐतिहासिक घटना है, जिसका उल्लेख मुगलकालीन दस्तावेजों में मिलता है। परंतु इसके पीछे रानियों से जुड़े प्रसंग की कहानी महज एक प्रोपोगेंडा है जो वामपंथी इतिहासकारों ने औरंगजेब के बचाव के लिए बनाए थे। सबसे पहले सीतारमैया ने औरंगजेब के बचाव में, रानी वाली कहानी बनाई ताकि औरंगजेब के मंदिर तोड़ने के कृत्य को न्याय संगत बताया जाए, फिर BN pande ने इसी झूठ को आगे बढ़ाया और आज भी बहुत से वामपंथी, सीतारमैया एवं BN pande का संदर्भ देकर यह झूठ फैला रहे हैं।

