जैसा कि लेख का शीर्षक आपने देखा वो आपके लिए आश्चर्यजनक होगा। लेकिन जब हम शिलालेखों पर वर्णित शब्दावलियों और मान्यताओं का गहन अध्ययन करते हैं तो हम पाते हैं कि इन शिलालेखों का अनुयाई बौद्ध धर्मी तो नहीं था क्योंकि ये शब्द बौद्ध मान्यताओं और ग्रंथों में अनुपलब्ध हैं किंतु ये हमें जैनों में मिल जाते हैं। ऐसे में दो ही समाधान हो सकते हैं –
(१) सभी शिलालेख सम्राट अशोक के थे तो सम्राट अशोक बौद्ध न होकर जेन थे।
(२) सभी शिलालेख सम्राट अशोक के न होकर अन्य राजाओं जैसे सम्प्रति मौर्य के हो सकते हैं जो कि जेन हो गए थे।
क्योंकि सभी शिलालेखों के साथ अशोक नाम नहीं हैं। मात्र दो अभिलेखों में अशोक का नाम और बौद्ध, बुद्ध का उल्लेख आता है। ऐसे में उन दो शिलालेखों को छोड़कर देवानांप्रिय वाले अन्य शिलालेख अन्य राजाओं के हो सकते हैं। क्योंकि देवानांप्रिय शब्द दशरथ के शिलालेख, श्रीलंका के तिष्य के अभिलेखों पर भी है।
यदयपि अशोक नाम वाले शिलालेखों का भी अर्थ जैन मान्यताओं और संदर्भों में प्रस्तुत किया जा सकता है। जैसे बुध शब्द जैन तीर्थंकर या उनके गणधरों के लिए प्रयुक्त है।
पिछले पेज में हमने अशोक के अभिलेख पर आए अनारंभ और मंगल धम्म शब्द को देखा ये दोनों शब्द बौद्ध साहित्यों और परम्पराओं में नहीं हैं किंतु जैन परम्पराओं में है।

ऐसे में अभिलेख को लिखवाने वाला बौद्ध था ये बात आज तक किसी ने बौद्ध मूल ग्रंथों जैसे त्रिपिटक के तुलनात्मक अध्ययन से प्रस्तुत नहीं की है।

अभिलेख में पाखंड शब्द जैन कल्प सूत्रों अनुसार जैन श्रमणों के लिए हैं। इसी प्रकार श्वेत शब्द भी जैन सम्प्रदाय के श्वेताम्बर मुनियों के लिए है। ये दोनों शब्द मूल बौद्ध त्रिपिटक साहित्यों में नहीं है।
कुछ लोग श्वेत शब्द को श्वेत हाथी से जोड़ते हैं जिसे बुद्ध की माता ने स्वप्न में देखा था किंतु श्वेत हाथी से बुद्ध का सम्बन्ध त्रिपिटक में नहीं हैं। त्रिपिटक में बस बुद्ध का तुषितलोक से माता के गर्भमें आने का उल्लेख है। हाथी के स्वप्न की बात नहीं है। यह बात इन अभिलेखों से २०० वर्ष बाद सांचि स्तूप, भहुत पर मिलती है। और ग्रंथों में ये बात महायान में मिलती है जो कि १ शताब्दी ईस्वी से पहले के नहीं है। अतः श्वेत हाथी के स्वप्न की बात जैन तीर्थंकरों से बौद्धों में ली गई है और सम्राट के अभिलेख में श्वेत शब्द, गजोत्तम शब्द वास्तव में उस हाथी से है जो तीर्थंकर की माता को स्वप्न में दिखा था।

इसी प्रकार संबोधिमयाय शब्द का अर्थ बौधि वृक्ष किया जाता है किंतु यह शब्द बौद्ध साहित्य में नहीं है अतः इसका यह अर्थ गलत है किंतु जैन साहित्य में ये शब्द सम्मक् श्रद्धा या दर्शन अर्थ में है। अतः यह अभिलेख जेन सिद्धांतों के करीब है

अभिलेख में देव विमान, हस्थि दर्शन और अग्नि स्कंध दर्शन को शुभबताया है जबकि बौद्ध मान्यताओं में हाथी १०० ईसापूर्व में बुद्ध जन्म से जोड़ा गया। अग्नि स्कंध की कोई चर्चा कहीं नहीं हैं। विमान का भी बुद्ध से लेना देना नहीं था किन्तु ये सारी चीजें जैन ग्रन्थ कल्प सूत्र में तीर्थंकर की माता को आए चौदह स्वप्नों में से हैं जिनमें हाथी, अग्निशिखा, विमान भी है। अतः ये मान्मता जेनों की हैं, न कि बौद्धों की अतः अभिलेख लिखवाने वाला जैन था।

अभिलेख में अष्टमी, चातुर्मास में हिंसा का निषेध है। जबकि ये तिथियों का बौद्ध मत में कोई महत्व या पर्व नहीं हैं किंतु इन तिथियों का महत्व जैन मत में हैं।

इसी प्रकार अभिलेख में प्रयुक्त पचूपगमन, पंचगुति आसिनव, समवाय आदि बौद्ध मत में नहीं है बल्कि जैन मत में हैं। जैसे पंचगुति को जेन मत की आठ प्रवचन माताओं में से एक में पांच समिति के रुप में देखा जा सकता है।

इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि सभी शिलालेख बौद्धानुयायी अशोक के न होकर जेन मतानुयायी राजा के हैं जो कि मौर्य वंश के शालिशुक या सम्प्रति हो सकते हैं। अगर अशोक के मानें तो ये मानना पड़ेगा कि अशोक बौद्ध न होकर जेन थे। देवानांप्रिय पद का प्रयोग दसरथ के लिए भी हुआ है अतः सिर्फ देवानांप्रिय से अशोक मानना ठीक नहीं क्योंकि जो अभिलेख अशोक का हैं। जैसे कि मस्की का अभिलेख, उसमें अशोक ने अपना नाम लिखवा दिया है।

परिशिष्ट



संदर्भ –
नागरीप्रचारिणी पत्रिका,संपादक-श्यामसुंदरदास,काशी-नागरीप्रचारणी सभा द्वारा प्रकाशित



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