शक कालीन या क्षत्रप राजाओं के दान अभिलेख दिखवाकर नवबौद्ध यह भ्रम फैलाते हैं कि शक राजा बौद्ध थे किंतु एक राजा सभी धर्मों को या जो धर्म भिक्षाटन करता है, भिक्षा से अपने स्थल बनाते हैं उन्हें अवश्य ही दान देते हैं। मूलतः शक राजाओं के सिक्कों, मुद्रांकों से यह स्पष्ट नहीं होता कि वो कौनसा मत मानते थे। तथापि सिक्कों पर अंकित पारसी देवों, पारसी अग्निपात्र, युनानी देवों के अंकन से स्पष्ट है कि वे लोग पारसी, ग्रीक रिलिजन में विश्वास करते थे। किंतु भारत में रहते – रहते वे शैव और शाक्त बन चुके थे। इसके प्रमाण उनके चलाए सिक्कों पर मिलते हैं। जहां वे स्वयं को परमदेव्ये भक्त अर्थात् देवी के भक्त और शर्वज अर्थात् शर्व्व – शिव के ज अर्थात् जन्म लेने वाले (पुत्र) मतलब शिव के पुत्र कहते हैं। उनके द्वारा स्वयं को देवी भक्त और शिव पुत्र कहने से स्पष्ट है कि वे शाक्त और शैव परम्परा को मानते थे।
दुर्गाशप्तसति में भी देवी के लिए दैव्ये का प्रयोग है –
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः ।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै – दुर्गासप्तशती
आप मदसेन के निम्न सिक्कों पर ये विरुध देख सकते हैं।









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