बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर ने अपनी राइटिंग में वेदों में शूद्रों की स्थिति को लेकर तथ्यों के साथ बहुत से पक्षों पर लिखा है। यहां हम बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर के पुस्तकों का कुछ संदर्भ दें रहें हैं,जो यह बताएंगे की वेदों में शूद्रों की स्थिति कैसी थी?
बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण वांग्मय हिंदी खंड 13 पेज नंबर 3 में संदर्भ मिलता है कि बाबा साहेब शूद्र आर्य और क्षत्रिय थे। ब्राम्हणो को शूद्रों के हाथों कष्ट और अपमान सहने पड़े जिसके कारण ब्राम्हणो ने शूद्रों का उपनयन संस्कार बंद कर दिया।बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर लिखते हैं कि शूद्र आर्य और क्षत्रिय थे। ब्राम्हणो को शूद्रों के हाथों कष्ट और अपमान सहने पड़े जिसके कारण ब्राम्हणो ने शूद्रों का उपनयन संस्कार बंद कर दिया।यह संदर्भ बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण वांग्मय हिंदी खंड 13 पेज नंबर 3 में लिखा है।
बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण वांग्मय हिंदी खंड 13 पेज नंबर 3 का अंश:-
“संक्षेप में मेरा उत्तर इस प्रकार है :-
1.शूद आर्यों के सूर्यवंशी समुदाय में से ही थे।
2.एक समय था जब आर्य समुदाय ने केवल तीन वर्षों ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को ही मान्यता दी।
3.शूद्रों का अलग से कोई वर्ण नहीं था। वे भारतीय आर्य समुदाय के क्षत्रिय वर्ण में आते थे।
4.शूद्र राजाओं और ब्राह्मणों के बीच अनवरत संघर्ष होते रहते थे और ब्राह्मणों को शूद्रों के हाथों अनेक कष्ट और अपमान सहने पड़े।
5.शूद्रों द्वारा किए गए उत्पीड़न और पीड़ाओं से त्रस्त होकर ब्राह्मणों ने फलस्वरूप शूद्रों का उपनयन संस्कार संपन्न करना बंद कर दिया।”

बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर ने लिखा कि शूद्रों को उपनयन का अधिकार था।

बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण वांग्मय हिंदी खंड 13 पेज 177 में, बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर ने शूद्रों के बारे में गूढ़ प्रश्नों को संकलित किया गया है।
बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण वांग्मय हिंदी खंड 13 पेज 177 का अंश:-
“कुछ महत्वपूर्ण तथ्य इस प्रकार हैं :-
1.यह कहा जाता है कि शूद्र अनार्य थे और आर्यों के विरोधी थे। आर्यों ने उन्हें पराजित किया और अपना दास (गुलाम) बना लिया था। यदि यह सत्य है कि क्या कारण था कि युजर्वेद और अथर्ववेद के सृष्टा ऋषियों ने शूद्रों का यशोगान किया? वे शूद्रों के कृपा पात्र क्यों बनना चाहते थे?
2.यह भी कहा जाता है कि शूद्रों को विद्याध्ययन तथा वेदाध्ययन का अधिकार नहीं था। उस स्थिति में शूद्र सुदास ने ऋग्वेद के मंत्रों की रचना कैसे की?
3.बताया गया है कि शूद्र यज्ञ नहीं कर सकते थे, क्योंकि वह इसके पात्र नहीं थे। तब सुदास ने अश्वमेघ यज्ञ कैसे किया? यदि ऐसा था भी तो शतपथ ब्राह्मण में यहाँ करने वाले शूद्र को संबोधित करने की विधि का वर्णन क्यों है?
4.यह कहा जाता है कि शूद्रों को उपनयन का अधिकार नहीं था। यदि शूद्रों को आदिकाल से ही यह अधिकार नहीं था तो विवाद क्यों? बदरी और संस्कार गणपति में यह उल्लेख किस कारण है कि वे उपनयन के पात्र थे?
5. यह भी कहा जाता है शूद्र संपत्ति संचय के अधिकारी नहीं थे। यदि इसे सच मान भी लिया जाए तब और कथक संहिताओं में शूद्रों को धनिक और वैभवशाली कैसे बताया गया है?
6. शूद्रों को राज्याधिकारी बनने के अयोग्य बताया गया है। फिर महाभारत में शूद्र मंत्रियों का उल्लेख क्यों है?
7.शूद्रों का धर्म तीनों वर्षों ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की सेवा करना कहा गया है। इस दशा में शूद्र राजा कैसे हुए? सायणाचार्य ने सुदास तथा अन्य अनेक शूद्र राजाओं का उल्लेख क्यों किया है?”

बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर ने लिखा कि राजा के राज्याभिषेक में शूद्रों को आमंत्रित किया जाता था। शूद्र राज्याभिषेक भी करते थे।शूद्र मंत्री बनते थे।प्राचीन आर्य समाज में शूद्रों ने उच्च राजनीतिक गौरव प्राप्त किया था।
बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण वांग्मय हिंदी खंड 7 पेज 130 का अंश:-
“राजा के राज्याभिषेक के समय शूद्रों को भी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के समान आमंत्रित किया जाता था। यह बात महाभारत में दिए गए पांडवों के ज्येष्ठ भाई युधिष्ठिर के राज्याभिषेक के वर्णन से पुष्ट होती है। शूद्र ने राजतिलक के समय समारोह में भाग लिया था। नीलकंठ नामक एक प्राचीन विद्वान के अनुसार, जो राज्याभिषेक समारोह का वर्णन करते हैं, ‘चार प्रमुख मंत्री, ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य और शूद्र ने नए राजा का अभिषेक किया। इसके पश्चात् प्रत्येक वर्ण के प्रमुखों और छोटी जातियों के प्रमुखों ने भी पवित्र जल से राजा का अभिषेक किया। इसके पश्चात् द्विजों ने जयघोष किया।’ वैदिक युग के पश्चात् और मनु के पूर्व जन-प्रतिनिधियों का एक वर्ग होता था, जिन्हें रत्नी कहा जाता था। राजा के राज्यारोहण के समय वे विशेष भूमिका निभाते थे। उन्हें रत्नी इसलिए कहा जाता था कि उनके पास रत्न होते थे, जो प्रभुता का प्रतीक होता था। राजा को प्रभुता तभी प्राप्त होती थी, जब रत्नीगण उसे सत्ता के प्रतीक स्वरूप रत्न भेंट करते थे। वह प्रभुता प्राप्त होने के उपरांत प्रत्येक रत्नी के घर जाता था और उसे उपहार देता था। महत्वपूर्ण बात यह है कि शूद्र भी एक रत्नी था।
प्राचीन समय में शूद्र दो महत्वपूर्ण राजनीतिक संस्थाओं के सदस्य हुआ करते थे, जिन्हें जनपद और पौर कहा जाता था, और वे इन संस्थाओं के सदस्य होने के कारण ब्राह्मण तक से विशेष सम्मान के अधिकारी होते थे।
यह निर्विवाद सत्य है कि प्राचीन आर्य समाज में शूद्रों ने उच्च राजनीतिक गौरव प्राप्त किया था। वे राज्य के मंत्री बन सकते थे। महाभारत में इसका प्रमाण मिलता है। महाभारतकार अपनी स्मृति के आधार पर 37 मंत्रियों की एक सूची का उल्लेख करता है, उसमें चार मंत्री ब्राह्मण, आठ मंत्री क्षत्रिय, इक्कीस मंत्री वैश्य और तीन मंत्री शूद्र तथा एक मंत्री सूत था।”

बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर ने लिखा है कि आर्य और दस्यु अलग थे,और इनके बीच कभी कोई युद्ध हुआ इसका भी प्रमाण नहीं मिलता। शूद्र आर्य थे।
बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण वांग्मय हिंदी खंड 7 पेज नंबर 309 एवं 310 का अंश:-
“आर्य भारत के मल निवासी थे। दूसरी बात यह है कि इस बात का कहीं कोई प्रमाण नहीं मिलता कि आर्यों और दस्युओं के बीच कभी कोई यद्ध हुआ हा, आर दस्युआ का शूद्रा से कोई लेना-देना नहीं था। तीसरी बात यह है कि इस बात पर विश्वास करना काठन है कि आय काई शक्तिशाली लोग थे, जिनके पास पर्याप्त बल था। जो कोई भारत में आर्यों का इतिहास देवों के साथ उनके संबंध के प्रसंग में पढ़ता है, उसे उनके उस संबंध का स्मरण हो जाता है जो सामंती युग में सामंत और उनके अधीनों के बीच होते थे। देव सामंत होते थे और आर्य उनके अधीन थे। आर्य लोग जो आहुतियां देते थे, उनका स्वरूप कुछ ऐसा ही है, जैसे देवों को शुल्क दिया जा रहा हो। देवों के प्रति आर्यों की अधीनता का कारण यह था कि उनके संरक्षण के बिना वे अमरों से अपनी रथा नहीं कर सकते थे। या है कि ऐसे अशक्त लोगों ने शूद्रों पर विजय प्राप्त की थी। अंतिम बात यह है कि शूद्रों के विषय में दो बातें स्पष्ट हैं। इस बात से कोई सहमत नहीं है कि उनका रंग काला और नाक चपटी थी। न ही किसी ने इस बात को स्वीकार किया है कि वे आर्यों द्वारा कभी पराजित किए गए या गुलाम बनाए गए थे। आर्यों और दस्युओं को एक ही मानना गलत बात है। वे बराबर के लोग थे। किंतु सांस्कृतिक रूप में वे एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न थे।’ दस्यु इस अर्थ में अनार्य थे कि वे अलग हो गए और उन्होंने आर्य-संस्कृति का विरोध किया। दूसरी ओर, शूद्र आर्य ही थे।”

बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर ने लिखा है कि शूद्र यज्ञ कर सकता था।
बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण वांग्मय हिंदी खंड 13 पेज नंबर 99 अंश:-
“इस उदाहरण में निम्नलिखित तीन महत्वपूर्ण साक्ष्य प्रकट होते हैं :-
1. पैजवन शूद्र था
2.शूद्र पैजवान ने यज्ञ किया,और
3.ब्राह्मणों ने पैजवन के निमित्त यज्ञ कर दक्षिणा ली।
उपरोक्त उद्धरण श्री राय द्वारा महाभारत की भाष्य टीका से लिया गया है।”

बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर ने लिखा है कि शूद्र स्त्री अश्वमेध यज्ञ में भाग लिया।
बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण वांग्मय हिंदी खंड 7 पेज 113 एवं 114 का अंश:-
“उस समय यदि शूद्र को अपने से संबंधित यज्ञ-कर्म करने की अनुमति नहीं थी, तो इन सब प्रावधानों का कोई अर्थ नहीं हो सकता था। ऐसे भी प्रमाण हैं कि शद स्त्री ने अश्वमेध’ नामक यज्ञ में भाग लिया था। जहां तक उपनयन संस्कार और यज्ञोपवीत धारण करने का प्रश्न है, इस बात का कहीं कोई प्रमाण नहीं मिलता कि यह शदों के लिए वाजत था। बल्कि सस्कार गणपति में इस बात का स्पष्ट प्रावधान है और कहा गया है कि शूद्र उपनयन के अधिकारी हैं।”

बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर ने लिखा है कि शूद्रों को वेद अध्ययन पर कोई प्रतिबंध नहीं था। शूद्र को ऋषि पद प्राप्त था जिन्होंने वेद के मंत्र की रचना की।
बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण वांग्मय हिंदी खंड 7 पेज 312 का अंश:-
“वेदों का अध्ययन करने के बारे में शूद्रों के अधिकारों के प्रश्न पर छांदोग्य उपनिषद उल्लेखनीय है। इसमें जनश्रुति नामक एक व्यक्ति की कथा आती है, जिसे वेद-विद्या का ज्ञान रैक्व नामक आचार्य ने दिया था। वह व्यक्ति एक शूद्र था। यदि यह एक सत्य कथा है तो इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि एक समय ऐसा भी था, जब अध्ययन के संबंध में शूद्रों पर कोई प्रतिबंध नहीं था।
केवल यही बात नहीं थी कि शूद्र वेदों का अध्ययन कर सकते थे। कुछ ऐसे शूद्र भी थे, जिन्हें ऋषि-पद प्राप्त था और जिन्होंने वेद मंत्रों की रचना की। कवष एलूष’ नामक ऋषि की कथा बहुत ही महत्वपूर्ण है। वह एक ऋषि था और ऋग्वेद के दसवें मंडल में उसके रचे हुए अनेक मंत्र हैं। वैदिक कर्म में और यज्ञादि करने के बारे में शूद्रों की आध्यात्मिक क्षमता के प्रश्न पर जो सामग्री मिलती है, वह निम्नलिखित हैं। पूर्व-मीमांसा के प्रणेता जैमिनि’ ने बदरी नामक एक प्राचीन आचार्य का उल्लेख किया है, जिनकी कृति अनुपलब्ध है। यह इस मत के व्याख्याता थे कि शूद्र भी वैदिक यज्ञ करा सकते हैं। भारद्वाज श्रौत सूत (5.28) में स्वीकार किया गया है कि विद्वानों का एक ऐस वर्ग भी है जो वैदिक यज्ञ के लिए आवश्यक तीन पवित्र अग्नियों को उत्पन कर सकता है। कात्यायन श्रौत सूत्र (1 और 5) का भाष्यकार यह स्वीकार करता है कि कुछ वैदिक ऋचाएं ऐसी हैं, जिनसे यह निष्कर्ष निकलता है कि शूद्र वैदिक कर्म करने के योग्य हैं।”

बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर ने लिखा है कि शूद्र राजा बन सकता था और शासन कर सकता था।
बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण वांग्मय हिंदी खंड 7 पेज 311 का अंश:-
“सुदास पैजवन का पुत्र था और पैजवन दिवोदास का पुत्र था, जो काशी का राजा था।सुदास का वर्ण क्या था? अगर लोगों को यह बताया जाए कि सुदास नामक राजा एक शूद्र था तो बहुत कम लोगों को विश्वास होगा। किंतु यह एक यथार्थ है और इसका प्रमाण महाभारत में उपलब्ध है। जहां शांति पर्व में पैजवन का प्रसंग आया है। वहां यह कहा गया है कि पैजवन एक शूद्र था। यहां सुदास की कथा से आर्यों के समाज में शूद्रों की स्थिति के बारे में नई रोशनी मिलती है। इससे पता चलता है कि शूद्र भी राजा हो सकता था और शासन कर सकता था। इससे यह भी पता चलता है कि ब्राह्मण और क्षत्रिय एक शूद्र राजा के अधीन कार्य करने में किसी अपमान का अनुभव नहीं करते थे, बल्कि उनमें राजा का अनुग्रह प्राप्त करने के लिए परस्पर प्रतिस्पर्धा थी और उसके यहां वैदिक कर्म करने के लिए तैयार रहते थे।”

उपसंहार
अतः बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर ने स्वयं लिखा है कि शूद्र आर्य और क्षत्रिय थे। शूद्रो को उपनयन का अधिकार था। शूद्र राजा बन सकते थे। शूद्र संपत्ति रख सकते थे। शूद्र वेद अध्ययन कर सकते थे। शूद्र यज्ञ कर सकते थे। शूद्र राजा का राज्याभिषेक कर सकते थे और मंत्री बन सकते थे।



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