Latest Blog

, ,

जापान में हिंदू धर्म

Listen to this article

जापान में हिदू धर्म का प्रचार प्रसार ७ – ८ शताब्दी से ही शुरू हो गया था।हालांकि यह प्रचार प्रसार बौद्ध धम्म की महायान शाखा के कारण हुआ था। हम महायान शाखा के बौद्ध भिक्षुओं के आभारी हैं कि उन्होंने हिदू वेद, देवी देवताओं का परिचय जापान में करवाया। ये परिचय खंडन रुप आलोचना से लेकर, तंत्र पुजा में स्तुति रुप स्वीकार्यता पर भी है। अतः जापान में हिदू धर्म बौद्ध भिक्षुओं द्वारा देव स्तुति से लेकर खंडनात्मक साहित्य के द्वारा गया था। कितु आज भी जापान में बौद्ध देवों, बुद्ध के साथ साथ हिदू देवों की भी अराधना होती है। इस बारे में भारतीयों ने बहुत सीमित लिखा है, कितु प्रसिद्ध भारतविद् चीनी जापानी संस्कृत प्राकृत के उद्भट विद्वान, अनेकों पांडुलिपियों, देश देशांतर की यात्रा करने वाले लोकेश चंद्रा जी ने इस विषय में विस्तृत लिखा है। इनमें उनकी एक लघु पुस्तिका में इस बारे में थोड़ा संक्षिप्त जानकारी है अतः हम उसी पुस्तक से कुछ प्रमाण रख रहे हैं ।

जापान में ब्राह्मण बोधिसेन ने ७ सदी में प्रवेश किया था। ये चीन से गए थे। इस अवसर पर जापान में ऋग्वेद के पेदु राजा का अभिनय किया। यह ऋग्वेद के एक आख्यान का अभिनय था।

यह प्रमाण जापान में ऋग्वेद के प्रचार की प्राचीनता दर्शाता है।

जापानी भाषा ने संस्कृत से प्रभावित होकर अनेकों संस्कृत शब्दावली का ग्रहण किया है

जापानी-संस्कृत शब्दावली

जापान में नवग्रह पूजा होती है, जहां बृहस्पति को उरुम्स कहा जाता है, सिद्धं लिपि में उनका नाम भी लिखा मिलता है –

बृहस्पति(उरुम्स)

जापान के कोयसान नगरी में शियोंग सम्प्रदाय के अनेकों स्थल है, यहां कुछ जगह पर १००० वर्ष प्राचीन उत्तर गुप्त कालीन सिद्धू में शिव और लक्ष्मी जी का नामोल्लेख है।

शिव और लक्ष्मी

जापान में त्रिमुर्ति का भी पूजन होता है, महाकरुणा गर्भ मंडल जो कि ८ शताब्दी में जापान गया था। इस मंडल में तीनों देवताओं की पूजा अब तक विद्यमान है। यहां ब्रह्मा जी का नाम बोनतेन, उमा महेश्वर का नाम उमाहि, दाइजिजाइतेन, विष्णु जी का नाम नाराएन्द्रेन हैं।

ब्रह्मा जी (बोनतेन), उमा महेश्वर (उमाहि ,दाइजिजाइतेन), विष्णु (नाराएन्द्रेन)

जापानी में उमा महेश्वर की मुद्रा का भी अंकन किया जाता है। पूजा समय इस हस्तमुद्रा का प्रयोग होता है। जापानी कला के अभिसंबोधि मंडल में लगभग ४०० हिदू देवी देवताओं के अंकन होते हैं, यह लगभग १००० ईस्वी से है।

जापानी में उमा महेश्वर की मुद्रा का अंकन

जापानी लिपिटक में महाभारत के अनेकों पों का उल्लेख मिलता है –

जापान में महाभारत

जापान में शू एई ने ९ शताब्दी में सप्तमातृकाओं का चित्रण किया था –

सप्तमातृकाओं का चित्रण

जापान के शियोंग सम्प्रदाय में १२ हिदू देवों की पूजा होती है तथा उनकी मुद्राएं भी बनती है –

पूजा की मुद्राएं
पूजा की मुद्राएं
पूजा की मुद्राएं

देवों के साथ साथ वैदिक ऋषियों के नाम से भी हस्त मुद्राओं का निर्माण होता है।

वैदिक ऋषियों के नाम से  हस्त मुद्राओं

बौद्ध देवी प्रज्ञापारमिता की भी पूजा होती है कितु उसे सिद्धम् लिपि के लिखे एक मंत्र में श्रुति – वेद, स्मृति अर्थात मनु आदि स्मृतियों की रक्षक कहा है।

सूती वस्त्र का प्रचार भारत से ही जापान में हुआ था।

जापान में सरस्वती जी पुस्तक की देवी हैं। इसी प्रकार जापान में सात मंगल देवों की एक नौका का चिलण होता है, जिनमें तीन हिदू देव महाकाल, वैश्रणव और सरस्वती हैं। इनके ऊपर जापानी औरसिद्ध में बीज मंल होते हैं। सरस्वती जी के ऊपर स भी लिखा होता है।

ऐसे सैंकड़ों चिह्न जापान में हिंदू संस्कृति या उससे प्रभावित मिल जायेगें। इस क्षेत्र में अभी विस्तृत खोजबीन और जापानी प्राचीन इतिहास और धार्मिक ग्रंथों को टटोलने, अनुवाद करने की आवश्यकता है। विद्वान रघुवीरा जी और लोकेश चंद्रा जी की प्रदान की गई दृष्टि और मार्गदर्शन में कार्य हो तो हम लोग इस चीज को और भी उजागर कर सकते हैं। इससे यह भी सिद्ध होता है कि जापान में बौद्ध मत के साथ साथ हिदू धर्म भी समान रुप से चला था। सम्भवतः अधिकतर चीन या भारत से जापान जाने वाले बौद्ध भिक्षु धार्मिक सहिष्णु थे।

संदर्भ पुस्तक:

पुस्तक – एशिया की संस्कृतियों में भारत की झंकार
लेखक – लोकेश चंद्र

Follow


Discover more from Sanatan Samiksha

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply

Discover more from Sanatan Samiksha

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading

Discover more from Sanatan Samiksha

Subscribe now to stay up to date with our latest, blog by joining our newsletter.

Continue reading