महारानी थिरुनल गौरी पार्वती बाई
वैसे आपने त्रावनकोर का नाम सुना ही होगा, अक्सर वामपंथी नावनकोर शासन पर आरोप लगाते हैं कि त्रावनकोर में छोटी जाति के महिलाओं को स्तन ढकने का अधिकार नहीं था।उन्हें मंदिर जाने का अधिकार नहीं था। वामपंथी का नैरेटिव होता है कि त्रावनकोर में एक ब्राम्हण शाही परिवार का शासन था इसलिए शाही शासन भेदभाव करता था। आज हम इसी शाही परिवार की महारानी थिरुनल गौरी पार्वती बाई जी की बात करेंगे।
कौन थी महारानी थिरुनल गौरी पार्वती बाई
महारानी गौरी पार्वती बाई का जन्म 1802 में त्रावणकोर राजघराने में हुआ था । जब उनकी बड़ी बहन महारानी गौरी लक्ष्मी बाई की 1815 में प्रसव के बाद मृत्यु हो गई, तो गौरी पार्वती बाई केवल तेरह वर्ष की थीं। महारानी गौरी पार्वती बाई अपनी बहन की मृत्यु के बाद महारानी बनी। महारानी के रूप में इनका कार्य काल 1815-1829 रहा और इस दौरान इन्होने राज्य के लिए बहुत से महत्वपूर्ण कार्य किए, जिसमें से शिक्षा के लिए किए जाने वाला कार्य बहुत महत्वपूर्ण रहा।

महारानी द्वारा शिक्षा के लिए किया गया कार्य
आपने महारानी के दवारा शिक्षा के लिए किए गए योगदान के बारे में कभी नहीं सुना होगा। वामपंथी ने त्रावनकोर शाही शासन को केवल नकारात्मक रूप में प्रस्तुत किए। आइए त्रावनकोर की महारानी द्वारा किए गए कार्यो के बारे में संक्षिप्त में जानते हैं।
माता सावित्रीबाई फुले जी ने 1848 में स्कूल खोला जो समाज के लिए योगदान था और हम इनका इसका आदर करते हैं।परंतु 1817 में निशुल्क अनिवार्य शिक्षा के लिए आदेश लाने वाली त्रावनकोर की महारानी पार्वती गौरी जी को भुला दिया गया।
महारानी पार्वती गौरी जी ने 1817 में एक आदेश पारित किया और शिक्षा को राज्य का दायित्व बना दिया। राज्य के सभी लोगों के लिए निःशुल्क शिक्षा को अनिवार्य कर दिया।1817 की महारानी रानी की घोषणा को इतिहासकारों ने इसे मैग्ना कार्टा’ कहा।
1817 के आदेश में कहा गया है: “राज्य को अपने लोगों की शिक्षा का पूरा खर्च वहन करना चाहिए, ताकि उनके बीच ज्ञान के प्रसार में कोई पिछड़ापन न रहे, शिक्षा के प्रसार से वे बेहतर प्रजा और लोक सेवक बन सकें तथा इससे राज्य की प्रतिष्ठा बढ़े।”
इस आदेश के माध्यम से, राज्य अपनी पूरी जिम्मेदारी की घोषणा कर रहा था कि वह इसमें शामिल लागतों के लिए बजटीय समायोजन प्रदान करेगा। एक नियम यह भी लागू किया गया था कि व्यवस्थित तरीके से चलने वाले प्रत्येक स्कूल में दो शिक्षक होने चाहिए जिनका वेतन राज्य द्वारा दिया जाएगा। इसे सार्वजनिक राजस्व से शिक्षा के अधिकार को राज्य द्वारा पहली औपचारिक मान्यता माना जा सकता है।



त्रावनकोर महाराजा की घोषणा
महारानी पार्वती गौरी के बाद स्वाति थिरुनल महाराजा बने। इन्होंने ने महारानी के कार्य को आगे बढ़ाया। महाराजा ने 1834 में अंग्रेजी स्कूल स्थापित किया जो निशुल्क था। इसे किंग फ्री स्कूल भी कहते हैं।


किंग फ्री स्कूल के बाद महाराजा ने किंग गर्ल्स फ्री स्कूल 1839 में खोला।

त्रावनकोर महाराजा ने 1866 में डिग्री कॉलेज और 1888 में किंग आयुर्वेद कॉलेज खोला।

टाइमलाइन, 1848 के पहले के स्कूल
1817 महारानी पार्वती गौरी का सभी के लिए प्राथमिक निशुल्क शिक्षा का आदेश जारी किया।
1834 किंग फ्री स्कूल प्रारंभ हुआ।
1839 किंग फ्री गर्ल स्कूल प्रारंभ हुआ।
1847 में पश्चिम बंगाल के काली कृष्ण ने कन्या पाठशाला प्रारंभ किया।हालांकि यह त्रावनकोर के बाहर का संदर्भ है फिर भी यह इसलिए दिखा रहे हैं क्योंकि यह भी एक पुराना स्कूल है।
महारानी गौरी पार्वती बाई द्वारा किए गए कुछ अन्य सुधार
ईसाई समुदाय को रविवार को अपने धार्मिक रीति-रिवाजों से संबंधित सार्वजनिक कार्यों में भाग लेने से मुक्त कर दिया गया।सोने के आभूषणों के उपयोग के लिए विशेष लाइसेंस (आदियारा पणम) खरीदना पड़ता था। इसे समाप्त कर दिया गय।पालकी, हाथी पर और गाड़ी में यात्रा करने का अधिकार उन सभी को दिया गया जो इसे वहन कर सकते थे।कॉफी की खेती पहली बार त्रावणकोर में शुरू की गई थी। और काफी उत्पादन में कार्य शुरू किया गया।व्यापार को बढ़ाने पर जोर दिया गया।टीकाकरण की शुरुआत उनकी बहन महारानी गौरी लक्ष्मी बाई के शासनकाल के अंत में हई थी। इसे उनकी बहन रीजेंट महारानी गौरी पार्वती बाई ने लोकप्रिय बनाया जो इनके लिए एक बड़ी उपलब्धि थी। महारानी पार्वती गौरी ने टीकाकरण को को राज्य में विशेष महत्व दिया और इसे राज्य को दायित्व बनाया।महारानी ने त्रावणकोर में ईसाई मिशनरी को अपने राज्य मे चर्चो के निर्माण के लिए भूमि भी दान की।1818 में महारानी के शासन काल में त्रावणकोर में कुछ निश्चित शर्तों और कीमतों साथ तम्बाकू आपूर्ति के लिए सीलोन के साथ एक व्यापार सन्धि की।
महारानी ने 1823 में अपने देश की महिलाओं को राजकीय जलूसों के दौरान मशाल लेकर चलने के उनके धार्मिक दायित्वों से मुक्त कर दिया था।न्यायिक अधिकारियों को पक्षकारों के साथ किसी भी प्रकार की निजी बैठक करने पर रोक लगा दी गई।

उपसंहार
त्रावनकोर की महारानी पार्वती गौरी द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में किया गया योगदान बहुत महत्वपूर्ण है। हमें इनके इस योगदान को याद रखना चाहिए। जो लोग नांगेली आदि की काल्पनिक कथा सुनाकर त्रावनकोर पर सवाल उठाते हैं, उन्हें महारानी पार्वती गौरी जी के योगदान को देखना चाहिए।हम सभी सावित्रीबाई फुले जी के योगदान को याद रखते हैं क्योंकि उन्होंने ने शिक्षा के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए।इसी तरह हमें महारानी पार्वती गौरी जी को भी याद रखना चाहिए।



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