रिडल इन हिंदूज्म एक ऐसी पुस्तक जिसे लेकर सबसे ज्यादा चर्चा की जाती है। कहा जाता है कि बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर ने इस पुस्तक को लिखा और हिंदू धर्म ग्रंथों को लेकर कई तरह की बात की।इस किताब का रिफेरेंस देकर वामपंथी और नवबौद्ध भी यह बताते हैं कि बाबा साहेब हिंदू धर्म के विरोधी थे, और बाबा साहेब के नाम पर ये वामपंथी और नवबौद्ध अपना एजेंडा चलाने की कोशिश करते हैं।
आज हम यह जानने की कोशिश करेंगे की क्या रिडल इन हिंदूज्म बाबा साहेब ने ही लिखी? और तथ्यों के आधार पर यह भी जानने की कोशिश की रिडल इन हिंदूज्म कैसे एक पुस्तक के रूप में आई।
नानक चंद रत्तू
नानक चंद रत्तू का जन्म पंजाब के एक दलित परिवार में हुआ था। वह नौकरी की तलाश में पंजाब से दिल्ली आए थे। बाबा साहेब डॉ अंबेडकर के पद से इस्तीफा देने के बाद।रत्तू बाबा साहेब के निजी सहायक बन गए और बाबा साहेब के अधिकांश लेखन को टाइप किया जिसमें द बुद्ध एंड हिज धम्म और रिडल्स इन हिंदूइज्म भी शामिल रही।

प्रमुख घटनाएं
आइए रिडल इन हिंदूज्म से जुड़ी प्रमुख घटनाओ को समझते हैं।
बाबा साहेब ने हिंदू कोड बिल पर गतिरोध के बाद सितंबर 1951 में नेहरू के मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया।इस्तीफा देने के बाद बाबा साहेब डॉ अंबेडकर ने दिल्ली में अपने आखिरी साल 26 अलीपुर रोड पर बिताए। यह बंगला उन्होंने ने सिरोही (दक्षिण राजस्थान में) के पूर्व राजा से किराए पर लिया था।बाबा साहेब अपनी पत्नी सविता अंबेडकर के साथ यहां रहने लगे।इस्तीफा देने के बाद बाबा साहेब डॉ अंबेडकर के पास मदद के लिए कोई कर्मचारी नहीं था। उन्होंने नानक चंद रत्तू से पूछा कि क्या वह उनके सहायक के तौर पर काम करेंगे।रत्त ने तुरंत हामी भर दी। रत्तू हर शाम बाबा साहेब डॉ अंबेडकर के घर आ जाते और देर रात तक काम करते। अक्टूबर 1951 से दिसंबर 1956 तक रत्तू ने ही बाबा के लगभग सभी पत्रों और लेखने को टाइप किया।रत्तू ने ही बुद्धा एंड हिज धम्मा और रिडल इन हिंदूज्म को टाइप किया।बाबा साहेब डॉ अंबेडकर की मृत्यु 6 दिसंबर 1956 को गई।रत्तू ने अपनी दो पुस्तकें लिखी। पुस्तक का नाम था,डॉ. बी.आर. अंबेडकर की यादें और स्मरण,औरडॉ. अंबेडकर के अंतिम कुछ वर्ष।रत्तू के अनुसार, बाबा साहेब की मृत्यु के बाद 1966 में मदन लाल जैन नामक व्यक्ति अलीपुर रोड पर वाला बंगलों खरीदने आया था, जिसमें डॉ सविता रहती थी। जैन ने डा सविता को दो कमरे रहने के लिए दिए।17 जनवरी, 1967 को जैन डॉ सविता को नोटिस भेजा। 20 जनवरी को, डॉ सविता अंबेडकर अलवर (राजस्थान) चली।रत्तू के अनुसार श्रीमती आंबेडकर के चले जाने पर, जैन और उनके दामाद बाहूबालियो के साथ परिसर में दाखिल हुए और श्रीमती आंबेडकर के नौकर मोहेन सिंह से चाबियां छीनकर जबरन कमरे खोल कर अंदर चले गए।जैन और उनके आदमियों ने एक बड़े स्टोर रूम में रैक में रखें सभी कागजात हटा दिए और इन्हें बाहर में फेंक दिया गया था, कमरे में बहुत से कीमती दस्तावेज, कागज़ात्त और पांडुलिपियाँ थीं जो बाहर फेंक दी गई थी। उस रात बारिश हुई। बाबा साहेब के कई कागजात हमेशा के लिए नष्ट हो गए।1976 में डॉ अंबेडकर की मृत्यु के बीस साल बाद सरकार ने डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर स्रोत सामग्री प्रकाशन समिति का गठन किया, जिसमें वसंत मून को विशेष कार्य अधिकारी नियुक्त किया गया।
रत्तू ने लिखा है कि डॉ अंबेडकर ने जनवरी 1954 के पहले सप्ताह में हिंदू धर्म में पहेलियाँ लिखना शुरू किया और नवंबर 1955 के अंत तक इसे पूरा कर लिया।जिन्हें रतू ने “एक बढ़िया मजबूत कागज़ पर” टाइप किया।
बाबासाहेब अंबेडकर स्रोत सामग्री प्रकाशन समिति का गठन होने के बाद अंततः रिडल इन हिंदूज्म 1987 में डा अम्बेडकर सम्पूर्ण वाड्मय अंग्रेजी खंड 4 के अंतर्गत प्रकाशित हुई।और 1995 में इसका हिंदी अनुवाद अम्बेडकर सम्पूर्ण वाड्मय हिंदी खंड 8 में प्रकाशित हुई।
डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण वाड्मय हिंदी खंड 8 के कुछ संपादकीय नोट
वैसे तो डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण वाड्मय हिंदी खंड 8 और अंग्रेजी खंड 4 में जगह जगह पृष्ठ के नीचे संपादकीय नोट दिए गए हैं।हम यहां डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण वाड्मय हिंदी खंड 8 से कुछ संपादकीय नोट दिखा रहे है और जानने की इन संपादकीय नोट का क्या अर्थ लगाया जाए?
कलियुग की पहेली
कलियुग की पहेली नाम के इस अध्याय में लगे संपादकीय नोट में स्पष्ट उल्लेख है कि “इस अध्याय के पांडुलिपि की केवल कार्बन कापी मिली है लेखक के कोई भी संशोधन नहीं है।” मतलब संपादकीय नोट में खुद यहां माना गया है कि कोई मूल पांडुलिपि प्राप्त नहीं हुई। यहां यह पुष्टि नहीं हो रही है कि यह अध्याय बाबा साहेब ने ही लिखा था। (चित्र 1)

वर्णाश्रम धर्म की पहेली
यहां संपादकीय नोट में बताया गया है “इस अध्याय कि मूल पांडुलिपि में है ही नहीं और लेखक के कोई संशोधन भी नहीं है।” अतः यह बाबा साहेब ने ही लिखा था इसकी पुष्टि नहीं हो रही। (चित्र 2)

उन्नीसवीं पहेली
यहां संपादकीय नोट में लिखा है “यह अध्याय कि 11 पेज की टाइप पांडुलिपि में है। हस्तलिखित केवल अध्याय का नाम है।” अतः यह कह पाना मुश्किल है कि यह अध्याय बाबा साहेब ने ही लिखा है। (चित्र 3)

सत्रहवीं पहेली
इस संपादकीय नोट में लिखा है कि “लेखक का हस्तलिखित पांडुलिपि थोड़ा सा है।” पर कितना है वो नहीं बताया गया। अतः यह अध्याय बाबा साहेब ने ही लिखा,यह स्पष्ट नहीं। (चित्र 4)

राम और कृष्ण कि पहेली
यह रिडल इन हिंदूज्म का सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण अध्याय है। इसी अध्याय को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा की जाती है। यहां संपादकीय नोट में बताया गया कि पांडुलिपि टाइप फार्म में प्राप्त हुई वो भी सिंबल आफ हिंदूज्म की पांडुलिपि के साथ।चूंकि इस अध्याय की कोई भी हस्तलिखित पांडुलिपि प्राप्त नहीं हुई है और न ही टाइप मैटर में लेखक के कोई संशोधन प्राप्त हुए हैं, इसलिए डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण वाड्मय के संपादक ने , इस अध्याय को पुस्तक के मूल विषय अनुक्रमणिका में शामिल नहीं किया।साथ ही यहां यह भी नोट दिया गया है कि यहां उल्लेखित विचारों से सरकार की सहमति हो ये ज़रूरी नहीं।यह अध्याय परिशिष्ट में है। (चित्र 5)

प्रास्तावना में अंतर
बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण वाड्मय हिंदी खंड 8 (इस खंड में ही रिडल इन हिंदूज्म प्रकाशित है)की प्रास्तवना और बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण वाड्मय हिंदी के अन्य खंड की भी प्रास्तावना देखने पर बहुत बड़ा अंतर दिखता है।बाबा साहेब अपनी पुस्तक के अंत में स्थान और दिनांक अंकित करते थे। पर डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण वाड्मय हिंदी खंड 8 (रिडल इन हिंदूज्म) में यह अंकित नहीं है।(चित्र 6) जबकि डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण वाड्मय के अन्य खंडों के प्रास्तावना में स्थान और दिनांक अंकित है। (चित्र 7) इससे यह प्रतीत होता है कि डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण वाड्मय हिंदी खंड 8 और अंग्रेजी खंड 4 की प्रास्तवना बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर ने रिडल इन हिंदूज्म के लिए लिखि थी यह अस्पष्ट है। अतः यह कहना मुश्किल है कि रिडल इन हिंदूज्म बाबा साहेब ने ही लिखा।


डॉ. भदन्त आनंद कौसल्यायन की हिन्दू धर्म की रिडल पुस्तक
डॉ. भदन्त आनंद कौसल्यायन ने 1988 में बाबा साहेब के नाम से हिंदू धर्म की रिडल नाम से एक पुस्तक प्रकाशित की।जबकि भारत सरकार ने बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण वाडमय हिंदी खंड 8 जिसमें रिडल इन हिंदूज्म की सामग्री थी उसे 1995 में प्रकाशित किया और यह खंड हिंदी में था।अगर आप डॉ. भदन्त आनंद कौसल्यायन की पुस्तक की विषय वस्तु देखें तो यह डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण वाड्मय हिंदी खंड 8 और अंग्रेजी खंड 4 से बिल्कुल अलग है। अतः डॉ. भदन्त आनंद कौसल्यायन की हिन्दू धर्म की रिडल पुस्तक भ्रामक है । (चित्र 8)

बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण वाड्मय अंग्रेजी खंड 4, पुस्तक परिचय
बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण वाड्मय अंग्रेजी खंड 4 में संपादकीय मंडल द्वारा शुरू में एक परिचय लिखी गया है।इस परिचय में बाबा साहेब की पांडुलिपि के प्रकाशन के संबंध में बातें लिखी हैं।
यहां यह लिखा है कि बाबा साहेब के फालोवर मानते हैं कि उन्होंने रिडल इन हिंदूज्म पुस्तक लिखी थी। यहां ” beleived ” शब्द का प्रयोग आप देख सकते हैं।अतः संपादक मंडल स्वयं यह नहीं बता रहे हैं कि यह पुस्तक बाबा साहेब ने ही लिखी।साथ ही यह भी बताया गया कि इस पुस्तक की फाइनल पांडुलिपि प्राप्त नहीं है। (चित्र 9)

उपसंहार
हमने तमाम तथ्यों को को देखा, इन सभी तथ्यों को देखने के बाद कुछ प्रश्न जरूर उठते हैं जैसे
रिडल इन हिंदूज्म अगर बाबा साहेब ने ही लिखा तो पूर्ण हस्तलिखित पांडुलिपि प्राप्त क्यों नहीं हो पाई?
साथ ही यह भी प्रश्न उठता है कि इस पुस्तक का प्रकाशन इतने विलंब से क्यों किया गया?
रत्तू जी के अनुसार बाबा साहेब की पांडुलिपि बारिश में नष्ट हो गई थी। फिर पांडुलिपि को कैसे प्राप्त किया गया और पुस्तक कैसे तैयार की गई यह भी स्पष्ट नहीं है।
अब तथ्यों के आधार पर कुछ निष्कर्ष भी हम यहां बताने की कोशिश कर रहे हैं।
पहली बात यह की डॉ. भदन्त आनंद कौसल्यायन ने हिंदू धर्म की रिडल नाम से जो पुस्तक प्रकाशित की वो भारत सरकार के डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण वाड्मय से मेल नहीं खाती, अध्याय की संख्या और अध्याय के नाम तक मेल नहीं खाते। अतः यह पुस्तक भ्रामक है।
रिडल इन हिंदूज्म पुस्तक का महत्वपूर्ण अध्याय जहां भगवान राम और कृष्ण के संबंध में लिखा गया है।इस अध्याय का नाम राम और कृष्ण कि पहेली नाम दिया गया है।इस अध्याय की पहेली के बारे में डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण वाड्मय के संपादक द्वारा बताया गया है कि इस अध्याय की पांडुलिपि उपलब्ध नहीं है। साथ ही सरकार ने इस अध्याय पर एक नोट भी लिखा है कि इस अध्याय के विचारों से सरकार सहमत हो यह जरूरी नहीं है।इस अध्याय को मूल विषय सूची से बाहर रखा और इसे परिशिष्ट में रखा गया है क्योंकि इस अध्याय की पांडुलिपि प्राप्त नहीं हुई है।
रिडल इन हिंदूज्म को लेकर बहुत कुछ अस्पष्ट है, रिडल इन हिंदूज्म बाबा साहेब ने ही लिखा यह भी स्पष्ट नहीं है।इसलिए जरूरी है कि हमें इस पुस्तक के विभिन्न प्रकाशनों द्वारा प्रकाशित प्रति को पढ़ते समय हमें सावधानी बरतनी चाहिए।



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