सोशल मीडिया पर आपने नांगेली के मार्मिक कथा को जरूर सुना होगा।आपको ऐसे कई लोग मिल जाएंगे जो स्तन कर और नांगेली की कथा पर चर्चा कर, हिंदू धर्म पर सबाल उठाते हैं।इनकी चर्चा का कोई प्रमाण नहीं होता।सिर्फ एक काल्पनिक मार्मिक घटना का प्रमुख होती है।
आज हम केरल के स्तन कर और नांगेली कथा से संबंधित संपूर्ण प्रकरण पर तथ्यों और प्रमाणो के आधार पर आपको सत्य से अवगत कराएंगे।
ब्रेस्ट टैक्स प्रपोगेंडा
ब्रेस्ट टैक्स और नांगेली को लेकर प्रोपोगेंडा जो फैलाया गया आइए वो देखते हैं।इस विषय पर लेख लिखे गए,पुस्तक लिखी गई, फिल्म बनी,पेंटिंग बनी बेबसाइट और सोशल मीडिया पर भी नैरेटिव चलाया गया।आप नीचे स्क्रीन शॉट पर देख सकते हैं नांगेली को लेकर कितने सारे बेबसाइट ने अपने लेख प्रकाशित किए और विकिपीडिया ने भी इसे प्रकाशित किया।

अब विकिपीडिया को देखिए इसने भी नांगेली पर लेख प्रकाशित किया है।
विकिपीडिया के इस लेख के अगर रिफरेंस सेक्शन में जाएंगे तो रिफरेंस बिल्कुल नई पुस्तकों या न्यूज वेबसाइट के लेखों को संदर्भ के रूप में लिखा गया है। विकिपीडिया के इस लेख पर केवल आपको कहानी मिलेगी, नांगेली का जन्म कब हुआ, कहा हुआ आदि कोई जानकारी नहीं मिलेगी। जबकि नांगेली की घटना 18 वी से 19 वी सदी का बताया जाता है। ऐसे में नांगेली के समकालीन प्रमाण आसानी से मिलना चाहिए।


नांगेली पर अभी कुछ नवीनतम पुस्तकें लिखी गई जिनमे कोई प्रमाण नहीं,ध्यान देने वाली बात है यह किताबें 2019 से 2022 के बीच प्रकाशित है। और इनमें कोई प्रमाण नहीं।पुस्तकों के अतिरिक्त ग्राफिक स्टोरी, फिल्म, पेंटिंग, और हजारों विडियो बनाएं गए बिना किसी प्रमाण के।

इसी तरह काल्पनिक नांगेली पर फिल्म विडियो पेंटिंग ग्राफिक बुक आदि बनाए गए।



प्रोपोगेंडा को आसानी से समझें
झूठा प्रोपोगेंडा कैसे फैलाया जाता है,नांगेली इसका सबसे अच्छा उदाहरण है।बिना किसी प्रमाण पुस्तक लिखे गए ।बेबसाइट पर लेख प्रकाशित किए गए। इंटरनेट में विडियो,चित्र, फिल्म आदि भर दिए गए।
नांगेली की कहानी लोगों के दिमाग तक ठीक से बैठ जाएं, इसलिए पेंटिंग, चित्र कथा, चित्र प्रदर्शनी, कविता, साहित्य, विडियो आदि का सहारा लिया गया।आप नांगेली पर लिखी बहुत सी कविता और साहित्य भी इंटरनेट पर देख सकते हैं।यहां तक भी नांगेली की कथा को पाठ्यक्रम में भी शामिल किया गया।सीबीएसई बोर्ड ने अपने पाठ्यक्रम में शामिल करके इस प्रोपोगेंडा को बच्चों तक पहुंचा दिया।
अब तक हमने आपको यह बताया कि बिना कोई प्रमाण कितना व्यापक यह प्रोपोगेंडा फैलाया गया।
आइए अब देखते हैं कि आखिर नांगेली की झूठी कहानी क्यों प्रचारित कि गई
वामपंथीयो द्वारा काल्पनिक नांगेली की कथा को प्रचारित करने के पीछे मुख्य रूप से तीन कारण नजर आते हैं।
(1)हिंदू धर्म कि एकता भंग कर धर्मांतरण के उद्देश्य हेतु।
(2)त्रावणकोर के हिंदू राजा मार्तण्ड वर्मा कि छवि खराब करने क्योंकी त्रावणकोर एक ऐसा हिंदू राज्य था जो कभी किसी का गुलाम नहीं हुआ।डच को पराजित किया।टीपू सुल्तान त्रावणकोर में हार गया।
(3)पद्मनाभ मंदिर के अपार धन को दलित पिछड़ों से अमानवीय कर द्वारा एकत्रित धन बताकर उस पर सेंध लगाना।
नांगेली की कहानी पहली बार कब आई
आइए अब हम आपको बताते है कि नांगेली की कहानी प्रथम बार कब संज्ञान में आई।नांगेली की कहानी की शुरुआत सी. राधाकृष्णन ने की। इस कहानी में उन्होंने नांगेली और कडप्पन नामक किरदारों को गढ़ते हुए बेहतरीन कहानी लिखी।इसमें मसाला डालने के लिए उन्होंने नांगेली के पति की आत्महत्या की कहानी को भी जोड़ दिया।यह कहानी पहली बार अंग्रेजी में 8 मार्च,2007 को ‘पायोनियर’ में प्रकाशित हुई थी।इसका मलयालम अनुवाद उसी दिन ‘मातृभूमि’ और ‘मनोरमा’ में भी प्रकाशित हुआ था। इसके बाद वर्ष 2009 में इसी नांगेली की कथा को,ब्लागर माइकल डेविड ने इसे अपने ब्लॉग बेवसाइट डेविड एंड डेवियन पर प्रकाशित किया। फिर 2016 में द हिंदू ने नांगेली की कथा को प्रकाशित किया। इसके बाद 2016 में बीबीसी ने भी नांगेली की कथा को प्रकाशित किया।और फिर हजारों जगह इसे प्रकाशित किया गया।
यहां सी. राधाकृष्णन का विडियो देखिए जहां वो बता रहे हैं कि नांगेली उनकी लिखी गई एक काल्पनिक कहानी की पात्र है।
आप हमारी केबीटी रिएक्शन यूट्यूब चैनल पर पूरा विडियो भी देख सकते हैं, जहां हमने सी राधाकृष्णन की विडियो दिखाया साथ ही कुछ अन्य तथ्य भी दिखाया गया है ।
आइए अब देखते हैं क्या ब्रेस्ट टैक्स के कोई प्रमाण है ?
Breast tax का पहली बार जिक्र आर एन येशुदास की पुस्तकें A People’s Revolt in Travancore: A Backward Class Moverment for Social Freedom, के पेज नंबर 41 में आता है जो 1975 में लिखी गई थी।
आर एन येशुदास ने 1980 में अपनी The history of the London Missionary Society in Travancore, page no 19 में पुनः ब्रेस्ट टैक्स का जिक्र किया।आर एन येशुदास एक ईसाई मिशनरी थे। आप इनके येशुदास सरनेम से ये देख सकते हैं। इन्होंने मिशनरी कार्य के लिए ये पुस्तकें लिखी।इनकी किसी भी पुस्तकों में प्राथमिक सोर्स नहीं बताया गया। अतः इनके पुस्तकें भी महज एक प्रोपोगेंडा का हिस्सा है प्रमाण नहीं।


त्रावणकोर पर लिखे गए किसी भी पुराने पुस्तकों में नांगेली या ब्रेस्ट टैक्स का जिक्र नहीं है
यहां हम त्रावनकोर के कुछ महत्वपूर्ण रिफेरेंस की बात करेंगे और देखेंगे क्या त्रावनकोर के पुराने रिफेंरेंस में कहीं भी नांगेली या स्तन कर का कोई प्रमाण मिलता है?
• मयिलाकम रिकॉर्ड, त्रावणकोर के प्रशासनिक विवरणों का रिकॉर्ड हैं। इसमें कहीं भी ब्रेस्ट टैक्स या नांगेली का कोई जिक्र नहीं।
इसके अतिरिक्त निम्नलिखित किसी भी पुस्तको में नांगेली या ब्रेस्ट टैक्स का कोई रेफरेंस नहीं-
• नेटिव लाइफ इन त्रावणकोर, सेम्युअल माटीर 1883 और A History of Travancore: From the Earliest Time, PS menon 1878
• Travancore tribe and caste, shri LA krishna alyer 1937
• R. Narayana Panikkar (18 April 1933). Travancore History (in Malayalam)
• Mateer, Samuel (1871). The Land of Charity
उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि –
नांगेली कथा पूरी तरह काल्पनिक है। नांगेली की कहानी की शुरुआत सी. राधाकृष्णन ने की। इस कहानी में उन्होंने नांगेली और कडप्पन नामक किरदारों को गढ़ते हुए बेहतरीन कहानी लिखी।इसमें मसाला डालने के लिए उन्होंने नांगेली के पति की आत्महत्या की कहानी को भी जोड़ दिया।यह कहानी पहली बार अंग्रेजी में 8 मार्च,2007 को ‘पायोनियर’ में प्रकाशित हुई थी।इसका मलयालम अनुवाद उसी दिन ‘मातृभूमि’ और ‘मनोरमा’ में भी प्रकाशित हुआ था। इसके बाद 2009 में इस कथा को विदेशी ब्लागर माइकल डेविड ने प्रकाशित किया और एक ईसाई मिशनरी ने भी 1975 में ब्रेस्ट टैक्स का उल्लेख किया वो भी बिना किसी प्रमाण के। अतः यह सिद्ध होता है कि नांगेली और ब्रेस्ट टैक्स केवल प्रपोगेंडा है।
प्रोपोगेंडा में सबसे ज्यादा प्रयोग होने वाली फोटो
हम आपको दो ऐसे फोटो दिखाएंगे जिन्हें प्रोपोगेंडा फैलाने के लिए सबसे ज्यादा प्रयोग किया गया है।ये फोटो पुराने हैं, ब्लेक एंड व्हाइट है। इसलिए जानबूझकर इन्हें हर जगह नांगेली और ब्रेस्ट कथा के काल्पनिक घटना के साथ जोड़ा गया ताकि कहानी प्रमाणित और सच्ची लगे।हम इन दोनों फोटो की सच्चाई बताएंगे।
पहली फोटो
इस फोटो के साथ नांगेली और ब्रेस्ट टैक्स की कहानी जोड़ी गई, सीबीएसई बोर्ड ने भी इसका प्रयोग किया था।इंटरनेट पे आपको इस फोटो के साथ नांगेली ब्रेस्ट टैक्स की कहानी मिलेगी।

पहली फोटो की सच्चाई
यह फोटो भारत की नहीं है।यह श्रीलंका के रोडिया समुदाय की है जो की श्रीलंका में बौद्ध अनटचेबल्स है।





दूसरी फोटो
इस फोटो के साथ भी नांगेली और स्तन कर की कहानी जोड़ी गई।

दूसरी फोटो की सच्चाई
यह फोटो ट्रावनकोर किंगडम की नहीं है।यह फोटो मालाबार के टियन समुदाय की है।टियन दलित या आदिवासी या अनटचेबल्स नहीं है।

अब कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को देखते हैं।
1662 ईस्वी के एक डच आगंतुक विलियम् वान नीहॉफ ने त्रावणकोर की तत्कालीन रानी अश्ववयी थिरूनल उमायम्मी के पोशाक के बारे में अपने पुस्तक वॉयजेस एंड ट्रेवल्स टू द ईस्ट इंडीज में,रानी और उनके परिचारकों का एक रेखाचित्र बनाया।जहां यह बताते हैं कि कि रानी और उनके परिचारक अपनी छाती को ढकने के लिए कोई वस्त्रे नहीं पहने थें।
डच आंगतुक लिखते हैं कि-
“मुझे महामहिम की उपस्थिति से परिचित कराया गया। उसके चारों ओर 700 से अधिक नायर सैनिकों का पहरा था।जो सभी मालाबार शैली के कपड़े पहने हुए थे।रानी की पोशाक उसके मध्य के चारों ओर लिपटे कैलीको के एक टुकड़े से अधिकर नहीं थी। उसके शरीर का ऊपरी हिस्सा ज्याद्वातर नग्न दिखाई देता था।उनके कंधों के चारों और लापरवाही से लटका हुआ कैलीको का एक टुकड़ा था।इस घटना का चित्रण अपनी पुस्तक पर किया।


केरल की ब्राम्हण महिलाएं
आप यहां केरल की ब्राम्हण, नायर महिलाओं को उनके परम्परागत परिधान में देख सकते हैं।यह सभी महिलाएं ब्राम्हण है,और इन्होंने उपर वस्त्र धारण नहीं किया है।




सावित्री अंतरजनम
सावित्री अंतरजनम जी केरल ब्राह्मण समाज की प्रमुख थी।वे उपरी वस्त्र नहीं धारण नहीं करती थी,और एक महिला होकर समाज की प्रमुख पद पर आसीन रही।उनकी 20 वी शताब्दी की फोटो आप यहां नीचे देख सकते है।

एझावा महिलाएं
एल.के. अनंत कृष्ण अय्यर ने पुस्तक में एझावा महिलाओ की फोटो प्रकाशित की है।आप देख सकते हैं कि एझावा महिलाएं ऊपरी वस्त्र पहने हुए है।नागेली को एझावा समुदाय का बताया जाता है,यहां आप देख सकते हैं कि एझावा महिलाएं ऊपरी वस्त्र धारण किए हुए हैं। एझावा समुदाय भी दलित समुदाय नहीं है, फिर भी वामपंथी इस समुदाय को जबरन दलित समुदाय बताते हैं।

नाडर समुदाय
कई वामपंथी नागेली को नाडर समुदाय का बताते हैं।जबकि नाडर दलित समुदाय नहीं है। फिर भी ये वामपंथी नाडर को दलित बताने में लगे रहते हैं।
निष्कर्ष
अतः समकालीन प्रमाण से यह सिद्ध हो गया की स्वयं महारानी उपर वस्त्र नहीं पहनती थी। और केरल में ब्राम्हण महिलाएं भी उपर वस्त्र नहीं पहनती थी। जो लोग यह कहते हैं कि भारत में छोटे जाति के महिलाओं को वस्त्र ढकने का अधिकार नहीं था। उन्हें अपने स्तन ढकने के लिए टैक्स देना पड़ता था। यहां यह पूरी तरह से गलत सिद्ध हो जाता है।
आइए हम वस्त्रो के इतिहास से मूल कारण को समझते हैं
भारत के कई क्षेत्रो में मातृसत्तात्मक समाज रही खासकर दक्षिण भारत और भारत के अन्य क्षेत्रों के आदिवासी समुदाय में यह व्यवस्था देखने को मिलती है।स्त्री बीना किसी दबाव के स्वेच्छा से अपने वस्त्र चयन करती थी।भारतीय समाज में शरीर के अंगों को लेकर गलत भावना नहीं रही। बाड़ी पार्ट को सेक्सुलाइज नहीं किया गया। इसलिए भारतीय समाज में वस्त्र का चयन शरीर को लेकर बनी किसी धारणा के दबाव में नहीं किया जाता था।अपितु जलवायु के आधार पर किया जाता था।लेकिन जब अब्राहमिक विचारधारा दुनिया में फैलने लगे, तो इस विचारधारा ने शरीर को लेकर धारणा बना दी, जिससे शरीर को छिपाने को महत्व दिया।अंगों को सेक्सुलाइज किया गया। ईसाई मिशनरी जहां भी गए अपनी ये धारणा साथ लेकर गए। भारत सहित अफ्रीका व दुनिया के सभी नेटिव कल्चर के पहनावा को प्रभावित किया।
Clothing, global history by Robert ross
इस किताब में बताया गया है ईसाई मिशनरी ने बड़ी संख्या लोगों को कनवर्ट किया और फिर उन्हें चर्च द्वारा निर्धारित वस्त्र पहनने को मजबूर किया।लांग स्लीव ब्लाउज महिलाओं के ड्रेस कोड में था।


ईसाईयों ने त्रावणकोर के नेटिव पहनावा के साथ एक विवाद उत्पन्न किया। त्रावणकोर के शहरी व कस्बाई क्षेत्रों में चर्च द्वारा निर्धारित ईसाई पहनावा लोकप्रिय हुआ। क्योंकि ज्यादातर कन्वर्जन इन्ही क्षेत्रों में हुआ था। जो कन्वर्टड हुए उन्होने ईसाई पहनावा अपनाया।
राबर्ट रास की पुस्तक क्लोथिंग ए ग्लोबल हिस्ट्री में, लिखते हैं कि
“कन्वर्टड ईसाईयो ने नेटिव महिलाओं के पहनावा का मज़ाक उड़ाया, जिससे बचने के लिए वो भी लांग स्लीव ब्लाउज पहनने लगे। त्रावणकोर के ग्रामीणों क्षेत्रों में कन्वर्जन बहुत कम था, इसलिए वहा नेटिव ड्रेस प्रचलन में बने रहे।”

त्रावणकोर ग्रामीण क्षेत्रों और शहरी क्षेत्रों के महिलाओं के पहनावे में अंतर देखे


त्रावणकोर के बाहर उपनिवेशवाद का स्थानीय पहनावे पर असर




भारत में वस्त्रो के प्राचीनता के प्रमाण



(2) पल्लव किंग एंड क्लीन आदि वराह मंदिर

उपसंहार
अब्राहमिक विचारधारा स्त्री को सेक्सुलाइज किया गया।उसे उपभोग की वस्तु समझा गया।इसलिए उसे पूरा शरीर छिपाने पड़ता था।उसी हिसाब से स्त्री के लिए ड्रेस निर्धारित किया गया।जबकि भारत एवं अन्य ट्राइबल व अन्य कई स्थानीय कूल्चर में,स्त्री को उपभोग की वस्तु नहीं समझा गया।स्त्री के अंगो के प्रति गलत भावना नहीं थी। इसलिए स्त्री जलवायु के आधार पर वस्त्र धारण करती थी।स्तन नहीं ढकना कोई बरी बात नहीं थी।पर जैसे ही कोलोनियल समय आया, इन अब्राहमिक विचारधारा वाले ने स्थानीय लोगों की संस्कृति को नष्ट किया।उनके पहनावा को अभद्र बना दिया।त्रावणकोर में भी कोलोनियल काल खंड का असर पड़ा।आपको हमने प्राचीन शिल्प भी दिखाए और भारत में उच्च जाति कहे जानी वाली महिलाओं के चित्र भी दिखाएं।इन महिलाओं ने स्तन नहीं ढका, साथ ही भारत के बाहर भी ऐसे प्रमाण मिलते है यह भी दिखाया।अतः आज की इस पूरी स्ट्रीम से यह सिद्ध होता है की नांगेली की घटना और ब्रेस्ट टैक्स जैसी बाते काल्पनिक है उनका कोई प्रमाण नहीं है।



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