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षड्यंत्रकारीयों ने कैसे एक हिन्दू सम्राट को बना दिया बौद्ध

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सम्राट हर्ष वर्धन को लेकर प्राय विद्वानों द्वारा यह पक्ष रखा जाता है की वह बौध मत के अनुयायी थे। हर्ष को बौद्ध बताने के पीछे का सबसे बड़ा तर्क यह है,की हर्ष के राज्य काल में एक चीनी बौद्ध यात्री ह्वेनत्सांग(Huensang) का भारत आता है,और पुरे भारत को बस बौद्ध चश्मे से देखता है, ह्वेनत्सांग(Huensang) ने जिस चश्मे से भारत को देखा था। भारत में आज भी बहुत से इतिहासकार उसी चत्रमें से आज तक भारत का इतिहास देख रहे हैं। जबकि गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद, हर्षवर्धन ने 606 ईस्वी से 647 ईस्वी तक उत्तरी भारत पर शासन किया था। गुप्त साम्राज्य में किसी गुप्त सम्राट के बौद्ध होने का कोई प्रमाण मौजूद नहीं हैं। सभी गुप्त राजा वैदिक धर्म का पालन करते थे। इस विषय पर एक विस्तृत सामग्री में पूर्व स्ट्रीम में आप लोगो के साथ शेयर भी कर चूका हूँ। यहां पूर्व में किए गए स्ट्रीम दिया जा रहा है आप वो स्ट्रीम देख सकते हैं।

ह्वेन त्सांग(Huensang) के भारत आने से पूर्व ही भारत में गुप्त काल में सैकड़ो प्रमाण वैदिक धर्म से जुड़े प्राप्त हो जाते हैं। जिसमे वैदिक यज्ञो से लेकर वैदिक अख्यानो अभिलेखीय प्रमाणों की प्रधानता सतंत्र हैं। उसके बाद भी वर्तमान में भारतीय इतिहासकार न जाने कौन सी मज़बूरी के शिकार हैं, की वह सिर्फ एक मात्र विदेशी संदर्भ को लेकर भारतीय इतिहास की विवेचना करने बैठ जाते हैं। और कुछ तो इतने वेशर्म है की एक मात्र इसी आधार पर पुरे हर्ष साम्राज्य को बौद्ध और पूरी प्रजा और लोकमान्यता में बौध मत का अधिपत्य परोस देते हैं।  ह्वेन त्सांग(Huensang)का यात्रा वृतांत भारतीय इतिहास के संदर्भ में एक मात्र सत्य नहीं हो सकता ऐसे में तब तो बिलकुल नहीं जब हुवेशंग खुद बौध मत का अनुयायी हो। और अपने मत को लेकर कट्टर और पक्षपाती हो। ऐसे में हमे सही इतिहास जानने के लिए ह्वेन त्सांग(Huensang) से पूर्व के भारत को जानना होगा उसी के साथ वह जिस काल खण्ड में आया उस काल खंड में व्याप्त राजनैतिक सामाजिक परिस्थिति और स्वय उस काल खण्ड के शासक के स्वलेखन और मूल अभिलेखीय प्रमाणों, स्वयं निर्दिष्ट धार्मिक मान्यताओ और उपासना पद्धतियों को समझना होगा। तभी हम वास्तव में इस बात की समीक्षा कर पायेगे की हर्ष कौन थे। उनकी मूल धार्मिक निष्ठां किस धर्म में थी।

हर्षवर्धन की निष्ठा किस धर्म में थी इस बात को जानने के लिए किसी बाहरी श्र ज्यादा बेहतर विकल्प है, हर्ष द्वारा स्वलिखित नाट्य ग्रंथ। राजा हर्षवर्धन एक २. होने के साथ साथ बहुत ही तीक्ष्ण प्रतिभा के धनी थे। कला साहित्य में भी उनकी विशेष रुचि थी। इसी क्रम में हर्ष ने तीन नाट्य शास्त्रों की रचना की जिनके नाम –

1 रत्नावली
2 प्रियदर्शिका
3 नागानंद नाटकम हैं।

हर्ष द्वारा विरचित इन नाट्य ग्रंथों के माध्यम से हम हर्ष के व्यक्तित्व में झांक सकते है। और इस बात का पता लगा सकते हैं कि हर्ष की धार्मिक अभिरुचि क्या थी।

यहां आप हर्ष कृत नाट्य शास्त रत्नावली में देख सकते है कि ग्रंथ की रचना के प्रारंभ में ही हर्ष अपने इस नाट्य के निर्वित्र रूप से समाप्ति की कामना के साथ लोक कल्याण हेतु नंदी पाठ के अंतर्गत माता पार्वती की बन्दना करते हैं।

बात करे हर्ष कृत नाट्य ग्रंथ प्रियद‌र्शिका की तो यहां हमने अंग्रेजी संदर्भ के तौर पर प्रियदर्शिका के अंग्रेजी में जी. के. नरीमन, ए.वी. विलियम्स जैक्सन और चार्ल्स जे. ओग्डेन द्वारा अनुवादित पुस्तक लिया है। इसी के साथ मूल संस्कृत श्लोकों के सन्दर्भ के लिए M.R. KALE की पुस्तक को भी साथ रखा है साथ ही संस्कृत सन्दर्भों के हिन्दी अनुवाद के लिए गंगाधर इंदूकरन साहित्य रत्न की की पुस्तक का अंश आप सब के बीच रखा है।

प्रियदर्शिका

– अंग्रेजी में जी.के. नरीमन, ए.वी. विलियम्स जैक्सन और चार्ल्स जे. ओग्डेन द्वारा अनुवादित।

– जी.के. नरीमन और ए.वी. विलियम्स जैक्सन द्वारा लिखित परिचय और नोट्स के साथ ।

– इसमें अंग्रेजी अनुवाद के सामने (लिप्यंतरित) संस्कृत पाठ शामिल है।

नागानंद नाटकम

हर्षचरितम्

हर्षचरितम्, वाणभट्ट द्वारा रचित हर्षवर्धन का जीवनचरित है। यह संस्कृत काव्य है। वाणभट्ट, हर्ष के दरबारी कवि थे। हर्षचरित, बाणभट्ट की प्रथम रचना है। यह संस्कृत में ऐतिहासिक ग्रन्थ लेखन का आरम्भ करने वाला ग्रन्थ भी है। यह ग्रंथ हर्ष के दरबारी कवि की रचना है जो यह बताने के लिए पर्याप्त है कि उस काल में हर्ष राज्य की क्या सामाजिक धार्मिक स्थिति थी। हर्ष चरित्र में हर्ष में तत्कालिक समाज और धार्मिक मान्यताओं का जो चित्रण प्रस्तुत किया है। वह एक भी प्रसंग ह्वेन त्सांग(Huensang) के यात्रा विरावण में दिखाई नहीं देता। ऐसा लगता है यह हुवेनशंग किसी दूसरे ही ब्रह्माण्ड के हर्ष से मिल कर आया था। ह्वेन त्सांग(Huensang) का पूरा विवरण पक्षपात पूर्व और और अपूर्ण है सिर्फ बौद्ध चश्मे से भारतीय इतिहास और हर्ष राज्य काल को देखने और लिखने का घृणित प्रयास हैं। आइए इस विषय को विस्तार से समझते हैं।

अभिलेख

अभिलेखीय साक्ष्यों के सानिध्य में भी हर्ष काल और हर्षवर्ध की धार्मिक मान्यता और धर्म विषयक आस्था का पता लगाया जा सकता हैं। आइए हम बात करते है हर्षवर्धन के बंसखेरा ताम्रलेख की जो हर्ष संवत 22 में लिखवाया गया था ।इसी के साथ बात करेंगे मधुवन ताम्रलेख के बारे में जिसे हर्ष संवत 25 में लिखवाया गया। इन दोनों ही ताम्रलेख में हर्ष ने अपने पूर्वजों के साथ साथ अपनी स्वयं की धार्मिक मनःस्थिति की सुंदर व्याख्या की हैं।

निष्कर्ष

अतः इन सभी प्रमाणों से हर्ष के व्यक्तिगत धार्मिक निष्ठा के विषय में कोई संदेह शेष नहीं रह जाएगा । यह सभी प्रमाण जो अभी हमने प्रस्तुत किये हैं वह सब हर्ष के जीवन से जुड़े मूल प्रमाण हैं, जिससे यह पूरी तरह सिद्ध होता हैं की, हर्ष निजी रूप से भगवान शिव के उपासक थे ।उनके पूर्वज भी मुख्य रूप से आदित्य अर्थात भगवान सूर्य के उपासक थे। यह अवश्य है कि हर्ष के बड़े भाई निसंदेह भगवान बुद्ध के प्रति विशेष श्रद्धावान थे ,किंतु वह भी अपने पूर्वजों की ही तरह भगवान आदित्य के भी उपासक थे। अतः इन सभी विवरणों को ध्यान में रखते हुवे सिर्फ  ह्वेन त्सांग(Huensang) के यात्रा वृतांत को आधार बना कर सम्राट हर्ष की धार्मिक मान्यता का बौध हेतु नहीं सिद्ध किया जा सकता। ऐसे में तो तब और नहीं जब स्वयं अपने नाट्य ग्रंथों से लेकर और ताम्रलेखो तक, हर्ष खुद को भगवान शिव का उपासक कह रहे हो।

(हमार कार्य आगे बढ़ाने के लिए आर्थिक सहयोग स्वेक्षा से अवश्य करे)

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