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देवदासी और वामपंथी प्रोपोगेंडा

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देवदासी शब्द का अर्थ

देवदासी एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है देव (ईश्वर) या देवी  की सेविका। तमिल देवदासियों को विभिन्न नामों से जाना जाता था जैसे तेवतसी, तेवरतियार, पतियिलर, तालीसेरी पेंडुकल, तेवनार मकल, कोट्टिकल, अटिकलमार, मणिकटर, कनिकैयार और कोयल पिनक्कल।

देवदासी पर वामपंथी प्रोपोगेंडा

देवदासी को लेकर कई तरह की भ्रांति फैलाई गई। इस कार्य को‌ वामपंथी इतिहासकारो ने खूब फैलाया।
आज हम पहले जानेंगे की देवदासी को लेकर प्रोपोगेंडा क्या फैलाया ।
देवदासी हिंदू धर्म की एक प्रथा है जिसमें मंदिरों में वैश्या वृत्ति होती थी।
देवदासी प्रथा निचली जाति लड़कीयो का यौन शोषण किया जाता था।
देवदासी एक हिंदू धर्म का एक धार्मिक प्रथा है।
देवदासी जबरन मंदिरों में रखा जाता था उनका कोई, सम्मान नहीं था।
देवदासी एक स्त्री विरोधी परंपरा है। जिसमें स्त्री को जबरन वैश्या वृत्ति में ढकेला जाता है।

देवदासी का अभिलेखीय प्रमाण

16वीं सदी का तमिल शिलालेख था।जो नायक कासे संबंधित था।एक देवदासी द्वारा भूमि दान किए
जाने का विवरण मिलता है।यह शिलालेख मदुरै के तिरुप्पारंगुनराम के एक गांव वडिवेलकरई से प्राप्त हुआ।

वरिष्ठ अभिलेखशास्त्री एस राजगोपाल ने कहा जिन्होंने शिलालेख को पढ़ा है। शिलालेख में लिखा है-

“यहाँ के शिव मंदिर की देवदासी सोक्की थुम्मिसी ने थट्टानकुलम गाँव के बाहरी इलाके में धान की ज़मीन मनिकम नामक व्यक्ति को दान कर दी थी।”

इससे स्पष्ट होता है कि 16 शताब्दी में देवदासी संपन्न थी।उनके पास भूमि थी और वो दान भी करती थी। आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी।

कुंदनाथुर नागेस्वनन मंदिर

कुंद्राथुर, चेन्नई  के  से 13 किमी की दूरी पर स्थित है। यह इलाका अपने कई प्राचीन मंदिरों के लिए जाना जाता है। नागेश्वर मंदिर यहाँ स्थित मुख्य मंदिरों में से एक है। चोल काल के दौरान निर्मित इस प्राचीन मंदिर में 45 से अधिक शिलालेख हैं। यहां हम कुछ शिलालेख बता रहे हैं जो देवदासी से संबंधित है।इन शिलालेख में स्पष्ट उल्लेख है कि देवदासी मंदिरों का उपहार और धन दिया करती है। इससे पता चलता है कि देवदासीयो की आर्थिक स्थिति अच्छी थी।

कुंदनाथुर नागेस्वनन मंदिर शिलालेख

कुंदनाथुर नागेस्वनन मंदिर शिलालेख
कुंदनाथुर नागेस्वनन मंदिर शिलालेख
कुंदनाथुर नागेस्वनन मंदिर शिलालेख

देवदासी द्वारा सोना दान करने का प्रमाण

देवदासी द्वारा सोना दान करने का प्रमाण 875 AD तलिचेरी शिलालेख में एक देवदासी द्वारा मंदिर में दीपक के लिए सोना दान करने का उल्लेख है।

तंजावुर जिले के सदायार  तिरुचिनमपूंडी  मंदिर के 872 AD के एक शिलालेख में एक देवदासी नक्कन काली ने 12 कलंचु शुद्ध सोना  भगवान तिरुक्कटैमुति पेरुमाणटिकल के एक नित्य दीपक के लिए दान दिया।

देवदासी के कर्तव्य के संबंध में शिलालेख

राजराजा प्रथम के 1014 ईस्वी के शिलालेख में गायन और नृत्य को देवदासी का दैनिक कर्तव्यों के रूप में निर्दिष्ट किया गया है।
कुरूवर देवर के भजन पुष्टि होती है। देवदासी मंदिरों के अनुष्ठानो की हिस्सा थी। वे शैव भजन गाती थी।
गंधरादित्य के समय का एक शिलालेख,कोनेरिराजापुरम में विभिन्न सेवाओं जैसे कि फूलों को फोड़ना, उन्हें मालाओं में पिरोना, मंदिर परिसर को गोबर से लिपना और भजनों का जाप करना कामिल है। स्तुवोरिपुर से वीरराजेंद्र के एक अभिलेख में शास्त्रीय बौली में सोलह महिला भजनों का उल्लेख है (तागामागी)।

देवदासी की आजीविका संबंध में शिलालेख

तिरूवेटीयूर और कुलाथूर शिलालेख के अनुसार देवदासी नृत्य और गायन में दक्ष थी। मंदिर में उन्हें नृत्य और गायन सिखाने की व्यवस्था थी। जो देवदासी नृत्य या गायन नहीं सीख पाती थी उन्हें मंदिर के अन्य कार्यों में लगाया जाता था।
तंजावुर राजराजेश्वरम के तालीचेरी शिलालेख और तिरुवैयारु अय्यनिप्पा कोयल परिसर में वडकैलासम कोयल इस तथ्य को बताते हैं कि देवदासीयो को घर की सुविधा और प्रति वर्ष 100 कलम धान दिया जाता था ताकि वो आजीविका और अन्य खर्चों की प्रतिपूर्ति कर सकें।

मनु कुल महादेव ईश्वर मंदिर शिलालेख

1119 ईस्वी मनु कुल महादेव ईश्वर मंदिर शिलालेख में , वर्णन है कि देवदासी ने जमीन खरीदकर मंदिर के लिए जमीन दान में दी थी।

मनु कुल महादेव ईश्वर मंदिर शिलालेख
मनु कुल महादेव ईश्वर मंदिर

श्रीकालहस्तीश्वर एवं वृहदेश्वर मंदिर शिलालेख

1213 के तमिलनाडु तंजावुर के श्रीकालहस्तीश्वर मंदिर में एक शिलालेख मिलता है। जिसमें वर्णन है कि एक देवदासी ने राजा से मिलकर मंदिर के लिए टैक्स फ्री जमीन लिया था।
11 वी शताब्दी के बृहदेश्वर मंदिर के  प्राचीन  शिलालेखो  में 400 से अधिक देवदासियाँ के नाम अंकित है।इनका स्थान मंदिर के पुजारी के बाद दिया गया है।

मधुसूदनन कलैचेलवन वास्तुकार, तमिलनाडु में मंदिरों के संरक्षण के लिए सरकार द्वारा गठित पैनल में कार्यरत हैं , के अनुसार

“चिदंबरम के नटराज मंदिर में कोप्परमचिंगन के सातवें शासनकाल के एक शिलालेख में मंदिर की दीवारों पर देवी थिरुकामकोट्टम उदय पेरियानाचियार को फूल चढ़ाने के लिए खरीदे गए फूलों के बगीचे को उपहार में लिखने का आदेश दर्ज है। यह काम दो देवराडियारों ने किया था। बगीचे की देखभाल के लिए जमीन खरीदने और दो नौकरों के रखरखाव के लिए एक राशि का योगदान दिया गया था।
देवराडियारों को मंदिर के कर्मचारी के रूप में माना जाता था, यह उन शिलालेखों से स्पष्ट है जिनमें उनके वेतन का उल्लेख है।

14वीं शताब्दी में, संभुवरैयार शासन के तहत, अमरपति-कथल की बेटी और सांबा की पोती कदली ने वंदावसी गांव में शिव के मंदिर में ताड़कापुरेश्वर के रूप में नृत्य हॉल का निर्माण किया। विक्रम पांड्या के शासनकाल के दौरान, मरागाथा पेरुमल की बेटी वडिवुडई मंगई ने कन्नीश्वर के मंदिर में एक मंडपम के शिखर पत्थर, बीम और छत के स्लैब की मरम्मत की। बगीचों का दान, और उन्हें बनाए रखने और मालियों को भुगतान करने के लिए कोष जमा की स्थापना भी देवदासियों द्वारा की जाती थी।”

देवदासी का साहित्यिक प्रमाण

12 शताब्दी के तमिल साहित्य पेरियापुरम में देवदासी का उल्लेख मिलता है है।इस ग्रंथ में एक शैव संत की पत्नी के लिए पतियिलर शब्द प्रयोग किया गया है। पतियिलर का अर्थ देवदासी होता है।
12 शताब्दी के राजतरंगिणी में मंदिर में नृत्य करने वाली महिलाओं का उल्लेख मिलता है।

विदेशी यात्रियों द्वारा देवदासी को लेकर उल्लेख

7वीं शताब्दी में भारत का दौरा करने वाले चीनी यात्री Hsüen Tsang(ह्वेन त्सांग) ने मंदिर में स्थापित नृत्य करने वाली महिलाओं के बारे में लिखा।
पुर्तगाली यात्री डोमिंगो पेस जिन्होंने 16वीं शताब्दी में विजयनगर साम्राज्य का दौरा किया था , साम्राज्य में देवदासियों की उपस्थिति का वर्णन करते हैं। उन्होंने लिखा कि

“देवदासी हीरे, मोती, मानिक सहित वे आभूषण पहनती हैं।उनमें से कुछ महिलाएँ ऐसी भी हैं जिनके पास ज़मीनें दी गई हैं, और बच्चे हैं, और इतनी नौकरानियाँ हैं कि कोई उनकी सारी चीज़ों की गिनती नहीं कर सकता।इन महिलाओं को राजा की पत्नियों के सामने भी जाने की अनुमति है, और वे उनके साथ रहती हैं और उनके साथ पान खाती हैं, जो कोई अन्य व्यक्ति नहीं कर सकता, चाहे उसका पद कुछ भी हो।”

उपसंहार

उपरोक्त वर्णनों से स्पष्ट है कि देवदासियां प्राचीन काल में कोई सेक्स स्लेव या नौकरानियां नहीं थी। वे मंदिरों में श्रद्धापूर्वक भजन और नृत्य गायन करती थी। इसके साथ – साथ वे आर्थिक रुप से भी अत्यंत सम्पन्न हुआ करती थी तथा मंदिरों को दान दिया करती थी। उनकी आर्थिक सम्पन्नता यह सिद्ध करती है कि देवदासियां समाज में एक उच्च स्थिति रखती थी।


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One response to “देवदासी और वामपंथी प्रोपोगेंडा”

  1. Dhanyawad sanatan samiksha ka jinhone itna hard work kiya hai hamari Sanskriti and history ko ujjagar krne me.ies yogdan ko her ek sanatani ko nhi bhulna chahiye.
    Asal mein devdasi kewal dasi matra nhi thi apitu unka samarthya ek mahan sanatani sevika jo kisi rajya ke maharani tulya thi.
    Jai sanatan

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