Latest Blog

, ,

बौद्ध धम्म में जातिवाद

Listen to this article

भारत में जब भी जातिवाद और भेद भाव का ठीकरा किसी पर फोड़ना होता है तो आज वर्तमान में कुछ बौद्ध धम्म के,धम्म अनुयायी सारा ठीकरा वेदों एवं और हिंदुओं पर फोड़ देते हैं। 

लेकिन लेकिन लेकिन

आज हम आप को इन बौद्ध धम्म अनुयायियों के विषय में वह जानकारी देने वाले है जिसके विषय में शायद ही आप ने कभी सोचा होगा या किसी ने आप को बताया होगा।आज हम लोग बात करेंगे भगवान गौतम बुद्ध के कुल के बारे में अर्थात जब बुद्ध थे,  उस समय उनके कुल में कितनी समानता थी।

आज जिसको देखो वह मुंह उठा कर भगवान बुद्ध और उनके  कुल  से खुद को जोड़ लेता हैं और फिर हिन्दुओं को जातिवाद भेदभाव के नाम पर गालियां देना शुरू कर देता हैं।लेकिन वह यह कभी नहीं बताता कि भगवान बुद्ध खुद जिस कुल वंश से जुड़े थे उस कुल वंश के लोगों में दूसरे कुल वंश या जाति के लिए कितना आदर भाव या समानता थी।

आज हम आप को धम्मपद गाथा और कथा में वर्णित एक प्रकरण से आप को अवगत करवा रहे हैं। इसमें भगवान बुद्ध के कुल वंश का सारा सच सामने आ जाएगा और यह भी पता चल जाएगा कि भारत में भेद भाव ,जातिवाद किन लोगों ने शुरू किया था।

गौतम बुद्ध के कुल अर्थात शाक्यवंश को इस बात का अहंकार हो गया था कि वे मनुष्यों मे सबसे ऊँचे हैं।

यहां आप को बता दे आज वर्तमान में स्वघोषित शाक्य बन्धु खुद को बौद्ध ग्रंथों मे”महासम्मत (मनु)” का वंशज घोषित करके बैठे हैं , वहीं दूसरी तरफ़ राजनैतिक महत्वाकांक्षा के निमित्त,मनु अर्थात महासम्मत को अर्थात अपने ही पितामह को गालियां भी देते हैं। अब वह ऐसा क्यों करते हैं यह तो भगवान बुद्ध ही जाने।

मगर आइए हम लोग बुद्ध वंश की हकीकत क्या थी वह जानते हैं।जब भगवान गौतम बुद्ध को पीपल के पेड़ के नीचे सुजाता द्वारा खीर खाने के बाद बोधि प्राप्त हो गई। तब भगवान ने उपदेश देना शुरू किया। अब बुद्ध स्वयं क्षत्रिय थे तो क्षत्रिय राजाओं पर भगवान बुद्ध का बहुत व्यापक प्रभाव पड़ा। ज्यादातर राजा तो क्षत्रिय होते थे। ऐसे में यह एक अलग क्षण था जब कोई राजकुमार संन्यासी बना था।

इस लिए भगवान बुद्ध के सम्पर्क मे आने वाले बड़े-बड़े राजा-महाराजा भी भगवान बुद्ध के शिष्य बनते चले गए। इसमें स्वजातीय बंधुत्व की भावना ने बहुत अहम रोल निभाया। परंतु आज इस बात को कुछ लोग मानने को तैयार नहीं होगे, लेकिन निष्पक्ष लोग, जरूर मेरी बात का समर्थन करेंगे।

अब क्योंकि बौद्ध ग्रंथों के अनुसार बुद्ध शाक्यकुल मे पैदा हुये थे, अतः शाक्यों को घमण्ड हो गया कि हम मनुष्यों मे सबसे श्रेष्ठ हैं।

इस पुस्तक में दिए विवरण के अनुसार _ भगवान बुद्ध के समय मे ही कौसल नामक राज्य मे प्रसेनजित (पसेनदि) नाम का राजा राज्य करता था।

जो भगवान बुद्ध की बढ़ती ख्याति से बहुत प्रभावित था और मन ही मन उनका अनन्य अनुयायी भी था। भगवान बुद्ध के प्रति विशेष श्रद्धा के चलते प्रसेनजित ने एक बार सोचा कि यदि मै शाक्यकुल की किसी लड़की से विवाह कर लेता हूँ।जिस कुल में भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था।भगवान बुद्ध के साथ मेरा जुड़ाव और भी मजबूत हो जायेगा, और वे मेरे सम्बन्धी भी बन जायेंगे, जो मेरे लिये गौरव की बात होगी।

यही सोचकर प्रसेनजित ने अपने दूत से विवाह का प्रस्ताव कपिलवस्तु के शाक्यों के पास भेजा। जब शाक्यों को यह खबर मिली की कौसलराज किसी शाक्य-कन्या से विवाह को इच्छुक है, तब शाक्यों ने आपस मे मंत्रणा कर यह तय किया कि राजा प्रसेनजीत का कुल शाक्य कुल के बराबर नहीं हैं।

फिर शाक्यों ने मंत्रणा कर यह तय किया कि हमारा कुल कौसलराज के कुल से श्रेष्ठ है, अतः हम प्रसेनजित से किसी शाक्य कन्या का विवाह नही करेंगे।

तो आप देख सकते हैं आज हिन्दुओं पर जातिवाद का ठीकरा फोड़ने वाले ब्राह्मणों को जातिवाद का दोषी बताने वाले वर्ण वर्ग व्यवस्था के लिए आज हर एक हिंदू जाति को दूसरी हिंदू जाति के खिलाफ भड़काने वाले। इतिहास में खुद किस तरह की व्यवस्था के अनुगामी रहे हैं।
आज बहुत से बुद्धिस्ट यह भी कहते हुवे मिल जायेगे कि बुद्ध के समय वैदिक व्यवस्था वर्ण व्यवस्था और उनके पोषक ब्राह्मण नहीं थे। अगर इनकी बात को सत्य मान लिया जाए तो यह बात इन सभी बुद्धिष्टो को स्वीकार करनी पड़ेगी कि भारत में जातिवाद वंश वाद और ऊच नीच और बड़ा छोटा की घटिया मानसिकता का प्रचलन इन्हीं से शुरू होता हैं।

क्योंकि बुद्ध के समय तो इसके अनुसार ना वैदिक ग्रंथ थे वैदिक ऋषि ना वैदिक मत को मानने वाले। तो यह सब जो शाक्य कुल में हो रहा था भगवान बुद्ध के जीते जी वह सब इन्हीं से शुरू हुआ था। 

और भगवान बुद्ध जातिवाद वर्ण व्यवस्था के खिलाफ थे यह सभी बाते फर्जी और बोगस हैं। जब खुद भगवान बुद्ध का खानदान ही उस समय के सबसे बड़े क्षत्रिय राजा प्रसेनजीत को अपने से नीच मानता थ।  तो यह लोग अन्य समाज जाति के लोगों को किस दृष्टि से देखते होगे इसकी तो कल्पना कर के ही मन सिहर जाता हैं।


इसी प्रसंग में आगे पढ़ेंगे तो पता चलेगा शाक्यों ने अपनी रक्त शुद्धता के चलते प्रसेनजीत का विवाह छल से वाषभ क्षत्रिय कन्या के साथ कर दिया। और किसी को कानों कान इस बात की खबर नहीं होने दी। बाद में उस कन्या और राजा प्रसेनजीत से एक पुत्र पैदा हुआ जिसका नाम विडूडभ रखा गया। जब वह बड़ा हुआ तो उसे ननिहाल जाने का  16 वर्ष की अवस्था में अवसर मिला। जब वह ननिहाल गया तो शाक्यों ने उसका खूब आव भगत किया । मगर वह सब ठीक वैसा ही था जैसे हाथी के खाने के दांत और दिखाने के दांत और होते हैं।  जब विडूडभ वापस आने लगा तो उसके एक सैनिक अपनी तलवार शाक्यमहल में ही भूल आया था। तो वह उसे वापस लेने जब भवन में गया तो देखा कि जिस आसान पर विडूडभ बैठा उसको एक दासी धो रही थी और बडबडा रही थी दासी पुत्री वाषभ क्षत्रिया का पुत्र यहां बैठ कर गया जिसकी वजह से मुझे यह धोना पड़ रहा हैं। उसकी बड़बड़ाहट वाली यह बात वह सैनिक सुन लेता हैं और जाते वक्त रास्ते में वह सारी बात विडूडभ को बता देता हैं। जिससे विडूडभ को बहुत दुख होता है और वह यह सारी बात अपने पिता प्रसेनजीत को बताता हैं तब प्रसेनजीत को अपने साथ हुवे धोखे का पता चलता हैं। 

प्रसेनजीत तो भगवान बुद्ध के कारण अनुराग के चलते यह धोखा छल बर्दाश्त कर लेना हैं। मगर विडूडभ प्रण लेता है कि वह शाक्यों का समूल नाश कर देगा। बाद में जब विडूडभ राजा बनता है तो वह शाक्यों पर आक्रमण कर देता हैं और महानाम शाक्य और कुछ अन्य जो छोड़ कर शाक्य वंश का समूल नाश कर देता हैं।  कुछ विवरण बताते है कि विडूडभ ने कई बार शाक्यों पर हमला किया हर बार बुद्ध विडूडभ के रास्ते में आ कर शाक्यों को बचा लेते थे मगर चौथे प्रयास में विडूडभ ने बुद्ध के वचन को अनसुना कर शाक्यों का समूल नाश कर दिया।

अब यहां पर थोड़ा ध्यान दे भगवान बुद्ध को तथागत कहा जाता हैं। अर्थात सब कुछ जानने वाला। तो बुद्ध शाक्यों के द्वारा प्रसेनजीत के साथ किया गया छल भी जानते थे। जब पहली मंत्रणा में शाक्यों ने मीटिंग कर के प्रसेनजीत के वंश को खुद से नीच बताया यह बात भी बुद्ध जानते होंगे। लेकिन बुद्ध ने एक बार भी इतने बड़े छल और धोखे के लिए शाक्यों को नहीं रोका जबकि प्रसेनजीत भगवान बुद्ध का अनन्य भक्त था। लेकिन विडूडभ को रोकने के लिए बुद्ध 3 बार उसके रास्ते में आ गए …

है ना कमल की बात …

जबकि भगवान बुद्ध ने पहले ही अपने खानदान वालों को प्रसेनजीत के साथ यह छल करने से रोक लिया होता तो समूल शाक्य वंश का नाश नहीं हुआ होता। बुद्ध जो तथागत थे सब कुछ जानने वाले थे उन्होंने सब कुछ जानने के बाद भी इतना बड़ा अधर्म होने दिया इतना बड़ा छल होने दिया।

Follow


Discover more from Sanatan Samiksha

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

2 responses to “बौद्ध धम्म में जातिवाद”

  1. कुशवाह जी हिस्ट्रियन शब्द उतना अच्छा नहीं होता है हिस्टोरियन शब्द अधिक सम्मत शब्द है

  2. आपने एक बार बोला था हिस्ट्रियन शब्द

Leave a Reply

Discover more from Sanatan Samiksha

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading

Discover more from Sanatan Samiksha

Subscribe now to stay up to date with our latest, blog by joining our newsletter.

Continue reading