एक यूट्यूब के पुराविद् ने दावा किया था कि बुद्ध की मानवीय प्रतिमाऐं जैन से प्राचीन है। जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाऐं बुद्ध की मानवीय प्रतिमाओं से प्राचीन नहीं है। बुद्ध का मानवीय अंकन हम लगभग कुषाण काल में देखते हैं। कुछ विशेषज्ञ मथूरा कला में कुछ बुद्ध प्रतिमाओं को क्षत्रप कालीन भी मानते हैं, हालांकि उनको कुछ श्वेताम्बर प्रतिमाओं और कुषाण काल के आस पास ही देखते हैं। आर सी शर्मा, एन पी जोशी आदि विशेषज्ञ इनको 15 ईस्वी की क्षत्रप कालीन बुद्ध प्रतिमाओं के रुप में देखते हैं। कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि बुद्ध की कोई भी मानवीय प्रतिमा 1 ईस्वी से प्राचीन नहीं है। यदि हम 15 ईस्वी वाली को कुषाण काल का माने तो कनिष्क से प्राचीन नहीं है। फिर भी हम 1 ईस्वी से पहले बुद्ध का मानवीय अंकन नहीं देखते हैं। जबकि जैन तीर्थंकरों का अंकन हमें इससे पूर्व ही मिल जाता है। कुषाण पूर्व अनेकों जैन तीर्थंकरों के अंकन हमें मथूरा के कंकाली टीले से मिलता है।
मथूरा के कंकाली टीले से हमें प्राचीनतम जैन तीर्थंकर ऋषभदेव का अंकन लगभग 2 शताब्दी ईसा पूर्व से मिल जाता है।



इसमें ध्यानस्त ऋषभदेव जी हैं और निलंजना नामक जैन अपसरा को नृत्य करते हुए भी दर्शाया गया है। इतना प्राचीन बुद्ध का कोई भी मानवीय अंकन प्राप्त नहीं है, इससे पता चलता है कि ध्यान करती बुद्ध प्रतिमाऐं इसी की नकल है।

इसके अलावा हमें जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ जी की भी 1 शताब्दी ईसापूर्व की प्रतिमा प्राप्त होती है।

ये दोनों प्रतिमाऐं शुंगकालीन है। अब हम कुछ कुषाण पूर्व क्षत्रप कालीन प्रतिमाओं को देखते हैं। हालांकि ये सीधी प्रतिमाऐं न होकर अयागपट है, जिनमें तीर्थंकरों का मानवीय अंकन है। इनके साथ प्राप्त अभिलेखों को पूर्व कुषाणकालीन लिपि में माना गया है।








यहां हमने तीर्थंकरों के कुषाण काल से प्राचीन मानवीय अंकन दिखाऐ हैं। ये बुद्ध के मानवीय या ध्यानस्थ अंकनों से भी प्राचीन हैं। इससे ये तो पता चलता है कि बुद्ध की ध्यानस्थ प्रतिमाऐं वास्तव में जैन तीर्थंकरों की नकल है।
जैन तीर्थंकरों की प्राचीनतम प्रतिमा मौर्यकाल की है, जो कि पटना संग्रहालय में है। इतनी प्राचीन बुद्ध की कोई भी मानवीय प्रतिमा नहीं है। इसको मौर्यकालीन घोषित करने का मुख्य कारण यह है कि इस पर मौर्य पोलिश मिली है।



इन सब प्रमाणों से स्पष्ट है कि जैन तीर्थंकरों का अंकन बुद्ध से प्राचीन है। जैन तीर्थंकरों की नकल से ही बुद्ध की ध्यानस्थ मुर्तियां बनी हैं। ये स्ट्रीम हमने इसलिए की है कि ये धूर्त हिन्दू प्रतिमाओं के साथ साथ जैन प्रतिमाओं पर भी अपना दावा ठोकने लगे हैं। ये धूर्त लोग जैन मुर्तियों को बुद्ध प्रतिमाओं के बाद का और बुद्ध से प्रेरित बताने का झुठा षड्यंत्र करने लगे हैं
। एक झंडु जर्नी तोर तीर्थंकरों को या जैनों को बुद्ध का अनुयायी तक बताता है। जबकि श्रमण संस्कृति को छोडकर दोनों में कोई समानता नहीं है। बुद्ध ने भी श्रमण परम्परा जैन और आजीवकों से ही सीखी थी। न कि जैन आजीवकों ने बुद्ध से।
बौद्ध हमेशा से जैन परम्परा का खंडन करते रहें हैं, उनके खिलाफ लिखते रहे हैं। इसके प्रमाण चीनी यात्री, अभिलेखों, त्रिपिटक में है।
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