दीपावली जिसे दीपदानोत्सव, यक्ष रात्रि, लक्ष्मी पूजन आदि नामों से पुकारा जाता है।
हमारे विभिन्न पुराणों और नाटकों में इसका उल्लेख है।
इस पर्व की पुरातात्विक प्राचीनता तो निश्चित नहीं है किन्तु कुछ प्रमाण दर्शाते हैं कि यह पर्व सिंधु सभ्यता में भी मनाया जाता था।

यहां विशेष पंचमुख आकृति के दीपक मिले हैं जो कि आज भी दीपावली पर विशेष रुप से प्रज्वलित किए जाते हैं।
साथ ही कुछ टेराकोटा की प्रतिमाऐं मिली हैं, जिनमें महिलाकृतियों के साथ दीपक भी बनाए गए हैं, इनकी तुलना आज की दीप लक्ष्मी से की जा सकती है, इन सब प्रमाणों से संकेत मिलता है कि सिंधु सभ्यता में भी दीपावली का पर्व था।

सिंधु घाटी की सभ्यता लगभग 8000 वर्ष पुरानी है। अर्थात ईसा से 6 हजार वर्ष पूर्व सिंधु घाटी के लोग रहते थे। मतलब रामायण काल के भी पूर्व। सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में पकी हुई मिट्टी के दीपक प्राप्त हुए हैं और 3500 ईसा वर्ष पूर्व की मोहनजोदड़ो सभ्यता की खुदाई में प्राप्त भवनों में दीपकों को रखने हेतु ताख बनाए गए थे। मुख्य द्वार को प्रकाशित करने हेतु आलों की शृंखला थी मोहनजोदड़ो सभ्यता के प्राप्त अवशेषों में मिट्टी की एक मूर्ति के अनुसार उस समय भी दीपावली मनाई जाती थी। उस मूर्ति में मातृ-देवी के दोनों ओर दीप जलते दिखाई देते हैं। इससे यह सिद्ध स्वत: ही हो जाता है कि यह सभ्यता हिन्दू सभ्यता थी जो दीपावली का पर्व मनाती थी।
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