टीपू सुल्तान को स्वतंत्रता सेनानी की तरह पेश करने की कोशिश लगातार वामपंथी इतिहासकारों के द्वारा किया जाता रहा है और ये आज भी चल रहा है। तर्क यह देते हैं कि टीपू अंग्रेजो के खिलाफ लड़ रहा है, इसलिए यह मान लिया जाए कि टीपू भारत के स्वतंत्रता के लिए लड़ रहा था,वह स्वतंत्रता सेनानी था।आइए तो देखते हैं कि एतिहासिक साक्ष्य क्या कहते हैं।
क्या टीपू ने भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ा?
टीपू सुल्तान ने इस्लाम की तलवार के बल पर दक्षिणी क्षेत्र पर कब्जा किया था। त्रावनकोर और अन्य क्षेत्रों में कब्जे की कोशिश में लगा था।अंग्रेजो से केवल इसलिए लड़ रहा था ताकि वो अपने कब्जे वाले क्षेत्रों में शासन कर सके और नए क्षेत्रों में कब्जा कर सके। टीपू इसी संघर्ष में मृत्यु को प्राप्त हुआ पर इसे शहीद होना नहीं कह सकते।
आइए अब कुछ महत्वपूर्ण तथ्य देखते हैं
1. फ्रांसीसी अधिकारियों के साथ उसके पत्राचार का सिलसिला शुरू हुआ। 2 अप्रैल 1797 को उसने एक पत्र के माध्यम से फ्रांसीसी अधिकारियों को अपना प्रस्ताव सौंप दिया। इसमें अन्य बातों के अलावा अंग्रेजों की जगह फ्रांसीसियों को स्थापित करने और संपत्ति और क्षेत्र का फ्रांसीसियों और उसके बीच समान विभाजन का प्रस्ताव शामिल था। बंबई को फ्रांसीसी को सौंपने के लिए कहा। इस प्रकार टीपू अंग्रेजों की जगह फ्रांसीसियों को स्थापित करना चाहता था। अब वामपंथी इतिहासकारों को यह बताना चाहिए कि क्या एक विदेशी की जगह दूसरे विदेशी को स्थापित करने वाले टीपू को स्वतंत्रता सेनानी बोल सकते हैं?
2. 1797 में टीपू ने कच्छ, कराची और बलुचिस्तान होते हए दो दूतों को अफगानिस्तान के शासक (अमीर) ज़मान शाह के पास भेजा, जो अहमद शाह अब्दाली के पोते थे। उन्हें ज़मान शाह के समक्ष एक प्रस्ताव रखने के लिए लिखित निर्देश दिए गए थे, जो संक्षेप में इस प्रकार थाः
“चंकि दिल्ली में, जो मुस्लिम धर्म की प्रमुख राजधानियों में से एक है, काफिरों (मराठों का वर्चस्व है) इसलिए मुसलमानों के नेताओं का यह कर्तव्य है कि वे एकजुट होकर काफिरों का नाश करें। अतः जमान शाह को स्वयं दिल्ली की ओर कूच करना चाहिए, या अपने किसी सेनापति को भेजकर दुर्बल मुगल सम्राट को पदच्युत करके उसके स्थान पर अपने ही वंश के किसी व्यक्ति को गद्दी पर बिठाना चाहिए। फिर ज़मान शाह या उनके द्वारा भेजा गया सेनापति दक्कन की ओर कूच करे, जबकि टीपू स्वयं जिहाद का झंडों बुलंद करेगा और काफिरों को इस्लाम की तलवार के नीचे झुका देगा।”
यहां टीपू एक विदेशी को भारत में बुला कर, उसे गद्दी में बैठाने को बोल रहा है, क्या स्वतंत्रता सेनानी ऐसा हो सकता हैं?
3. 5 फरवरी, 1797 को ज़मान शाह को लिखे अपने पत्र में टीपू ने लिखाः
“ईश्वर के आदेश के अनुसार… हमें काफिरों के खिलाफ एक पवित्र युद्ध [जिहाद] करने के लिए एकजुट होना चाहिए और हिंदुस्तान क्षेत्र को हमारे धर्म के शत्रुओं के प्रदूषण से मुक्त करना चाहिए। इन क्षेत्रों में [इस्लाम] के अनुयायी, हर शुक्रवार को एक निश्चित समय पर एकत्रित होकर, इन शब्दों में प्रार्थना करते हैं: ‘हे ईश्वर, उन काफिरों का नाश कर दे जिन्होंने मार्ग अवरुद्ध कर दिया है! उनके पाप उन्हीं के सिर पर लौट आएं, उन्हें उनके कर्मों का फल मिले!”
यहा टीपू एक विदेशी को भारत पर युद्ध छेड़ने के लिए बोल रहा है।
निष्कर्ष
यहां स्पष्ट होता है कि टीपू फ्रांस को बंबई देने का प्रस्ताव दिया और अफ़गान शासक को भारत में जेहाद के नाम पर युद्ध के लिए आमंत्रित कर रहा था और अफगान शासक के ही वंश के किसी व्यक्ति को भारत में गद्दी देना चाहता था। मतलब टीपू खुद भारत को उपनिवेशित कर रहा था। टीपू कि योजना में अफगानो से मिलकर भारत को इस्लामी शासन के अधीन लाया जाना चाहता था और ‘वामपंथी इतिहासकारों’ का वर्ग चाहता है कि हम यह विश्वास करें कि टीपू एक स्वतंत्रता सेनानी था, वह भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ रहा था!
संदर्भ –
1.The Asiatic Annual Register, for the year 1799, page 195 in the section entitled ‘Supplement to the Chronicle’
2.Official Documents Relative to the Negotiations Carried on by Tippoo Sultaun with the French Nation and Other Foreign States, Document No. 22, pages 62-63
3.Official Documents Relative to the Negotiations Carried on by Tippoo Sultaun with the French Nation and Other Foreign States,
Document No. 26, pages 66

