हाल ही में भारत सरकार ने नीदरलैंड से चोल राजाओं के ताम्रपत्र पुनः प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की है।
हालांकि यह ताम्रपत्र पूर्व में ही एपिग्राफी इंडिका के भाग २२ में प्रकाशित है। और इनमें चोल राजा द्वारा बौद्धों को दान देने का उल्लेख है। चुकी ताम्रपत्र का संबंध बौद्धों से भी जुड़ा है तो हमारी सरकार भला कैसे पीछे रहेगी उनको भारत लाने में, चाहें अन्य लाखों ताम्रपत्र अभिलेख क्यों न विदेशों में हो। चाहें वेदों की कितनी ही पांडुलिपियां हो। खैर।
इन ताम्रपत्रों से एक विवाद उत्पन्न हो गया कि चोल राजा बौद्ध थे?
अगर चोला राजा बौद्धों को दान देने से बौद्ध बन जाते हैं तो फिर मोदी जी भी बौद्ध मानने चाहिए।
चोला राजा कौन थे? किस धर्म को मानते थे? वहीं बात इन ताम्र लेखों में लिखी है, मगर छिपाई जा रही है।
ताम्रपत्र का पाठ भाग २२ में प्रकाशित है, ताम्रपत्र द्विभाषी है संस्कृत और तमिल।
इन भागों में वंशावली और व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताओं का उल्लेख है।
शैव और वैष्णव दोनों में श्रद्धा –
अभिलेख का आरम्भ भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की स्तुति से होता है। अर्थात् जो यह कहते हैं कि चोला राजा शैव थे और वैष्णव मत या भगवान विष्णु को नहीं मानते थे, उनका प्रोपोगेंडा यहीं खत्म हो जाता है क्योंकि इस लेख की शुरुआत भगवान विष्णु की स्तुति से शुरू होती है।
दूसरे श्लोक में भगवान शिव व पार्वती जी की स्तुति के साथ – , भगवान विष्णु की भी स्तुति है। इसमें भगवान विष्णु को योगनिद्रा में बताया है।
इसके बाद अभिलेख में वंशावली शुरू होती है –
वंशावली की शुरुआत भगवान मनु से होती है। अर्थात् चौला राजा खुद को मनु का वंशज मानते थे? क्या अब मनु भी बौद्ध हो जायेगें। फिर इतने वर्षों से वामपंथ मनु को गालियां क्यों दे रहा थे ?

मनु के बाद इक्ष्वाकु, मांधाता, मुलचंद, शिबि आदि सूर्यवंशी राजाओं का उल्लेख है, जिन्हें चोलवंश के पूर्वज बताया है। असल में चोला खुद को सूर्यवंशी मानते थे।
आगे की वंशावली में चोल राजा राज केसरी परकेसरी – व्याघ्रकेतु -करिकाल का उल्लेख है।
करिकाल संगम काल का मुख्य राजा था। लगभग कुषाण काल के दौरान संगम तमिल के राजा थे। इन्होंने कलानी बांध का निर्माण करवाया था, जो आज भी मौजूद है। ताम्रपत्र में भी इनके द्वारा बांध बनवाने का उल्लेख है। भारत सरकार के गैजेटियर में भी इस बांध का उल्लेख है।


अगले वंशज का नाम कोच्चेगन्नान का उल्लेख है, जिनको भगवान शिव के चरणों का भ्रमर बताया है। अर्थात् यहां चोला राजा स्वयं को शैव और भगवानशिव का अनन्य भक्त बता रहे हैं।
आगे राजा परान्सक का उल्लेख है। इनके बारे में लिखा है कि इन्होंने स्वर्ण जड़ित भगवान शिव का मंदिर बनवाया था।
अर्थात् बौद्ध विहार से बहुत पहले इस ताम्रपत्र के अनुसार चोला राजा विशाल शिव मंदिर बनवा चुके थे। हालांकि मीडिया में इस बात को छिपा दिया गया।
अगले वंशज राजेंद्र चोला को सूर्य वंश का शिरोमणि कहा है।
राजराजा चोला का उल्लेख है जिन्होंने पांड्या, तुलु, केरल, लंका के राजा को हराया।
ताम्रपत्र के ३७ वें श्लोक में पृथ्वी को शेषनाग ने धारण किया है, ऐसा लिखा है।
(क्या बौद्ध मानते हैं कि पृथ्वी शेषनाग के फन पर है।)
पंक्ति ७३ – ८६ में चोल राजा द्वारा बौद्धों को कनकगिरी पर चूडामणिवर्मन विहार और अनाइमंगलम् ग्राम दान देने का उल्लेख है।
यहां से ज्ञात होता है कि हिंदू राजा कितने सहिष्णु थे। वे शिव के परमभक्त थे। मनु के वंशज थे, लेख में स्तुति भगवान विष्णु से शुरू करते हैं किंतु उन्होंने अपनी बौद्ध प्रजा का भी ध्यान रखा और उन्हें भी दान दिया। जैसे अशोक ने आजीवकों को दान दिया। जिनका विरोध स्वयं बुद्ध ने भी किया था।
यही भारतीय राजाओं की सभी मतों के प्रति सहानुभूति थी।
अगले तमिल भाग में भी यही सब बातें हैं।
लेख को उकेरने वाले राजा के वैष्णव लेखक थे।
कुल मिलाकर ये ताम्रपत्रों का पाठ बहुत बड़ा है। लेकिन इनसे स्पष्ट है –
(१) राजा हिंदू आस्था वाले थे। विष्णु और शिव की स्मृति करते थे।
(२) शिव मंदिर बनवाते थे तथा स्वयं को शिव के चरणों का भ्रमर कहते थे।
(३)चौला राजा ने कहीं भी स्वयं को बुद्ध का भक्त, अनुयायी या चरणों का भ्रमर नहीं कहा।
(४) राजा प्रजा वत्सल थे इसलिए दूसरे मत के बौद्धों के लिए भी दान करते थे।
अतः इन लेखों से चौला राजा हिंदू और मनु के वंशज सूर्यवंशी प्रमाणित होते हैं। बौद्ध नहीं।
इसलिए बौद्धों के मंदिर, विहार भी हिंदू राजाओं की देन हैं जैसे कि कुमार गुप्त का नालंदा।

