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कौन है भारत का प्राचीन श्रमण धम्म बौद्ध अथवा जैन?

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भारत में प्राचीन काल से विभिन्न मत रहे हैं। मौर्यकाल में लगभग चार मत मिलते हैं। जिनको दो भागों में बाटां जा सकता है। वैदिक और श्रमण। ये दोनों परम्पराएं भारत में प्राचीनकाल से ही विद्यमान है। वैदिक में याज्ञिक, वैष्णव, शैव, शाक्त, सौर्य आदि आते हैं। जिनके प्रमाण हमें सिंधु सभ्यता और पूर्व इतिहासकाल से मिलना शुरू हो जाते हैं। श्रमण में जैन, बौद्ध, आजीवक आदि आते हैं। किन्तु इन श्रमण परम्परा में मूल श्रमण और प्राचीन कौन हैं? इस पर विचार करना आवश्यक है। प्रायः लोग श्रमण से बौद्धों को लेते हैं। श्रमण परम्परा का मूल बौद्ध ही समझे जाते हैं। बहुत से नवबौद्ध कहते भी हैं कि बौद्ध धम्म तो सिंधु सभ्यता में भी था किंतु यह सच नहीं है। हां श्रमण परम्परा सिंधु सभ्यता में थी। सिंधु सभ्यता में भी विभिन्न मत के लोग थे। वैदिक और श्रमण दोनों परम्परा थी। लेकिन श्रमण परम्परा के बौद्ध मत का कोई अस्तित्व उस समय नहीं था।तो श्रमण परम्परा का कौनसा मत सिंधु सभ्यता में था?

श्रमण परम्परा का जैन मत सिंधु सभ्यता के दौरान था। इसका प्रमाण यह है कि हड़प्पा से २००० ईसापूर्व प्राचीन, लाल जैसपर पत्थर से बनी तीर्थंकर की खंडित प्रतिमा प्राप्त हुई है।

आपको स्पष्ट होगा कि पहली प्रतिमा किसकी है। पहली प्रतिमा जैन तीर्थंकर की ही है। सम्भवतः ऋषभदेव की। क्योंकि प्रतिमा विज्ञान या आइकोनोग्राफी के प्रथम प्रतिमा, दूसरी प्रतिमा के अनुसार कायोत्सर्ग मुद्रा में है। जो कि जेन आइकोनोग्राफी की एक प्रमुख विशेषता है, विशेषकर ऋषभदेव की प्रतिमा की। अतः हड़प्पा से प्राप्त प्राचीन प्रतिमा कायोत्सर्ग मुद्रा में ऋषभदेव जी की है।

इससे सिद्ध होता है कि भारत का प्राचीन श्रमण पंथ असल में बौद्ध न होकर जैन था।

सिंधु सभ्यता के समय बौद्धों का कोई अस्तित्व नहीं था किन्तु ऋषभदेव जी की परम्परा के जैन मत का अस्तित्व था।

इस प्रमाण से स्पष्ट है कि जैन मत के २४ तीर्थंकरों की विचारधारा बौद्ध मत के २८ बौद्धों की विचारधारा से प्राचीन है। साथ ही हमें प्रथम बुद्ध तण्ड्रंकर या दीपांकर का कोई प्राचीनतम पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिलता किंतु सिंधु सभ्यता की इस प्रतिमा से हमें ऋषभदेव का प्राचीनतम प्रमाण मिल जाता है।

अतः ऋषभदेव एक वास्मृत्विक तीर्थंकर थे। जैन मत के २४ तीर्थंकर से ही बाद में बौद्धों ने २८ बुद्ध की विचारधारा का विकास किया था। जिसका प्राचीन पुरातात्विक प्रमाण नहीं है किंतु ऋषभदेव के प्रमाण हमें सिंधु सभ्यता से ही मिलते हैं।

इसलिए निष्कर्ष निकलता है कि भारत का प्राचीन श्रमण पंथ जैन मत है।


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