राजेंद्र प्रसाद ने फिर एक बार भ्रम फैलाने की कोशिश की है किंतु इस बार थोड़ा प्रमाण दिए हैं मगर तथ्यों की बारीकी से जांच इस बार भी नहीं की। इन्होंने धन्वंतरि को बौद्ध बताने के लिए कुम्हारा की खुदाई से मिली दो चीजें दिखाई जिनका काल लगभग 5 शताब्दी ईस्वी है।
पहला मुहर
इस मुहर पर श्री आरोग्य विहार
भिक्षु संघस्य लिखा है,जो कि बिलकुल ठीक बताया गया।यह 5 शताब्दी ईस्वी की मुहर है।

दूसरा मिट्टी का पात्र है
मिट्टी के पात्र पर राजेंद्र प्रसाद जी (ध)न्वन्तरि: पढ़ा है। ये माना जा सकता है कि इस पर धन्वंतरि लिखा है मगर इसमें आगे का (ध) अक्षर तो है ही नहीं। तो राजेन्द्र जी ने “ध”क्या अपनी मर्जी से मान लिया। क्योंकि हेलोडोरस पिलर पर जब वासुदेव शब्द में “सु” और “दे”नहीं दिख रहा था तो यही राजेंद्र जी थे जिन्होंने कहा था कि पुराविदों ने जबरन सुदे लगाकर वासुदेव , वा(सुदे)व पढ़ा है।

तो आज “ध”न दिखने पर जबरन (ध) न्वन्तरि कैसे पढ़ दिया। वहां पन्वन्तरि, मन्वन्तरि भी तो हो सकता है? कौनसे बौद्ध ग्रंथ से धन्वंतरि ले आए? त्रिपिटक में धन्वंतरि नहीं है।
अब हम धन्वंतरि के सम्बंध में धनतेरस का प्रमाण और उसका पुरातात्विक प्रमाण देते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार समुद्र मंथन से लक्ष्मी जी और धन्वंतरि निकले उसी उपलक्ष्य में धनतेरस मतलब धन श्री- लक्ष्मी जी का प्रकट दिवस या धन – धन्वंतरि जी का प्रकटोत्सव मनाते हैं।
पवाया जो कि एक गुप्त कालीन विष्णु मंदिर है। यहां से समुद्र मंथन का ४ – ५ शताब्दी का एक फलक प्राप्त हुआ है।

यहां समुद्र मंथन के दृश्य में देव दानव नाग के द्वारा मंदराचल पर्वत से समुद्र मंथन कर रहे हैं। ऊपर ब्रह्मा जी, विष्णु जी सहित गरुड विराजमान हैं। नीचे समुद्र से नवनिधियां, रत्नों , लक्ष्मी जी और कामधेनु की उत्पत्ति दर्शायी गई है तथा अंत में अमृत कलश धारण किए धन्वंतरि जी को दर्शाया गया है।
इस स्थान से भगवान विष्णु की वामन अवतार की प्रतिमा भी मिली है। जिसमें राजा बलि यज्ञ कर रहे हैं। वामन रुपी विष्णु जी भिक्षा के लिए आए हैं।



इसके अलावा सुश्रुत संहिता जो कि वैदिक आयुर्वेद है। उसमें भी धन्वंतरि जी का उल्लेख है, जो कि सुश्रुत के गुरु थे। इस ग्रंथ की प्राचीन पांडुलिपि ८ शताब्दी की है जो कि नेपाल है। इसमें धन्वंतरि जी का नाम।


दिवोदास धन्वंतरि जी का वास्तविक नाम था जो कि इस ग्रंथ में है। न कि किसी बौद्ध ग्रंथ या अभिलेख पर। दूसरा ६ शताब्दी की बावर जो कि आयुर्वेद की पांडुलिपि है उसमें भी वैदिक ऋषियों के साथ – साथ धन्वंतरि शिष्य सुश्रुत का उल्लेख है जो कि धन्वंतरि उपदेशित और सुश्रुत रचित सुश्रुत संहिता की प्राचीनता दर्शाता है।

इस ग्रंथ में भी समुद्र मंथन की कथा का एक अंश है जिसमें भगवान विष्णु द्वारा राहु की गर्दन काटने का उल्लेख है।


अतः धन्वंतरि और धनतेरस एक हिंदू पर्व है। जिसका सम्बन्ध पौराणिक कथा समुद्र मंथन से है। और इसी समुद्र मंथन से उत्पन्न धन्वंतरि और श्री के कारण धनतेरस मनायी जाती है। जिसके पुरातात्विक प्रमाण कुम्हारा मुहर और पात्र से भी प्राचीन है।
कुम्हारा पात्र पर ध स्पष्ट नहीं है अतः धन्वंतरि की जगह मन्वन्तरि: , पन्वन्तरि आदि भी हो सकता है। साथ में प्राचीन पांडुलिपि भी धन्वंतरि और उनके शिष्य सुश्रुत और सुश्रुत संहिता नामक वैदिक आयुर्वेद ग्रंथ की प्राचीनता ही सिद्ध करते हैं।

