जब अंग्रेज भारत आए तो यहाँ की गर्मी और उमस भरी जलवायु उनके लिए बड़ी चुनौती बनी। नींद और आराम में बाधा न आए, इसके लिए उन्होंने एक विशेष व्यवस्था शुरू की, जिसे “पंखावाला व्यवस्था” कहा जाता था। इस व्यवस्था के तहत दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्गों के लोगों को पंखा झलने का काम सौंपा जाता था। ये लोग बंधुआ मजदूर थे जिन्हें बहुत कम पारिश्रमिक पर अंग्रेज अफसरों की सेवा में लगाया जाता था।
पंखावाला पंखे की डोर से पंखे की हिलाता रहता था।ये पंखा कपड़े का बना होता था जो छत पर एक लकड़ी से बधा होता था जब पंखावाला डोर से पंखे को हिलाता तो हवा उत्पन्न होती थी जिससे अंग्रेज अफसरों को गर्मी से राहत मिलती थी।पंखे वाले को कष्टप्रद अवस्था में रखा जाता था ऐसा इसलिए किया जाता था ताकि पंखावाला न सोए,उसे जगाए रखने के लिए यातनाएं दी जाती थी।

कौन थे पंखावाला
पंखावाले दलित आदिवासी और पिछड़ी जातियों के लोग होते थे।अंग्रेज इन समुदाय के लोगों से पंखा चलवाते थे और पालकी उठवाते थे।अंग्रेज इन्हें बंधुआ मजदूर रखते थे।पंखावालो को बहुत कम वेतन और भोजन दिया जाता था।
पंखावालो को दी जाने वाली यातनाएं
पानी का घड़ा
पंखावाले के पास हमेशा पानी से भरा एक घड़ा रखा जाता था। यदि वह ज़रा भी ऊँघ जाता या सो जाता, तो मालिक उस घड़े का पानी उसके ऊपर उड़ेल देता था।
गुड़ और चीनी
पंखावाले को जगाए रखने के लिए उसके आसपास गुड़ और चीनी फेंक दी जाती थी, जिससे वहाँ चींटियाँ इकट्ठा हो जातीं। जैसे ही पंखावाला नींद में ढुलकता, चींटियाँ उसे काटने लगतीं और वह मजबूरी में फिर से जाग जाता।
मिसाइल बूट
मालिक अपने पास जूता रखता था। पंखा ज़रा भी धीमा या बंद होते ही वह जूता दूर से फेंककर पंखावाले को मारता। इस बूट को “मिसाइल बूट” कहा जाता था।

बदख या मुर्गा
कभी-कभी पंखावाले को जगाए रखने के लिए उसके हाथ में बदख या मुर्गा पकड़ा दिया जाता। एक हाथ से वह पंखा चलाता और दूसरे से उस पक्षी को कसकर पकड़े रहता। यदि पक्षी भाग जाता तो उसकी कीमत मज़दूर की नगण्य परिश्रमिक से काट ली जाती और उस पर कर्ज़ चढ़ जाता।
ऊँचा टेबल
पंखावाले को ऊँचे टेबल पर बैठाकर पंखा चलवाया जाता। यदि वह नींद से चूर होकर झपकी ले लेता तो टेबल से गिर पड़ता और चोटिल हो जाता।
पीठ के बल लेटना
कई बार पंखावाले को ज़मीन पर पीठ के बल लिटाकर पंखा चलवाया जाता। जैसे ही पंखा रुकता, मालिक उसे जूते से पीटता।

बंधुआ मज़दूरी
पंखावालों को बहुत ही मामूली परिश्रमिक दिया जाता था। उन्हें दिन-रात लगातार 12 घंटे तक पंखा चलाने पर मजबूर किया जाता।
बाल बाँधना
कभी-कभी पंखावाले को नींद से रोकने के लिए उसके सिर के बाल रस्सी से बाँध दिए जाते। जैसे ही वह नींद में झुकता, रस्सी खिंचती और दर्द से उसकी नींद टूट जाती।
अमानवीय कार्य परिस्थितियाँ पंखा वालो को भीषण।
गर्मी में भी घंटों तक पंखा खींचने का काम करना पड़ता था, अक्सर बिना किसी आराम के।
वेतन का अभाव कई बार उन्हें उनका निर्धारित वेतन
भी नहीं मिलता था, जिससे उनका जीवन और भी कठिन हो जाता था।
शारीरिक यातना यदि वे काम ठीक से नहीं करते थे, तो उन्हें शारीरिक दंड दिया जाता था।

मानसिक पीड़ा लगातार शारीरिक परिश्रम और
खराब परिस्थितियों के कारण उन्हें मानसिक तनाव और कष्ट भी झेलना पड़ता था।

पंखावालो की हत्याएं
अंग्रेज़ी हुकूमत के दौर में पंखावाले केवल बंधुआ मज़दूर ही नहीं थे,बल्कि उनके जीवन पर भी निरंतर खतरा मंडराता रहता था। उनसे दिन-रात लगातार पंखा चलवाया जाता। थकान और कमजोरी के कारण जब कभी उनकी आँख लग जाती या हाथ रुक जाता, तो अंग्रेज अफ़सर क्रूरता से उन्हें पीटते। कई बार यह मार इतनी निर्दय और हिंसक होती कि पंखावाले वहीं दम तोड़ देते।
इन हत्याओं का कारण केवल इतना था कि पंखावाला अपनी थकान के कारण लगातार पंखा नहीं चला सका। अंग्रेजों का यह अमानवीय व्यवहार दर्शाता है कि उस दौर में मजदूरों की ज़िंदगी की कोई क़ीमत नहीं थी।पंखावाला की हत्याओं पर कोर्ट ने कोई कार्रवाई नहीं की और हत्यारों को छोड़ दिया।

रितम सेनगुप्ता पंखावाला पर अनुसंधान किया और इस पर रिसर्च लेख लिखा।
रितम सेनगुप्ता के अनुसार
“उन्नीसवीं सदी के अंतिम तीन दशकों में, देशी प्रेस में इन नौकरों को लगी घातक चोटों और कई मामलों में मौत के ज़्यादा मामले सामने आने लगे। इसका एक स्पष्ट उदाहरण टूंडला के सहायक स्टेशन मास्टर श्री फॉक्स का मामला हो सकता है, जिन पर अगस्त 1879 में अपने ‘पंखा कुली’ तुलसिया को जानलेवा प्रहार करने का आरोप था, जिससे उनकी मौत हो गई। इस तरह की घातक हिंसा ने औपनिवेशिक राज्य के सर्वोच्च पदों के लिए वैधता के प्रश्न तेज़ी से उठाए। लेकिन औपनिवेशिक न्यायिक व्यवस्था ने इस नस्लवादी हिंसा को मृतक पीड़ित के आलसी श्रम का एक आकस्मिक परिणाम मानकर प्रभावी रूप से अपराधमुक्त कर दिया। इस प्रकार, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने टूंडला मामले में हत्या या ‘सदोष मानव वध’ की किसी भी संभावना को खारिज कर दिया, और यह निर्णय दिया कि फॉक्स को न तो पूर्व-योजनाबद्ध तरीके से और न ही “लापरवाह प्रतिशोध” से प्रेरित किया गया था, क्योंकि उसके लिए पंका के ढीले होने पर उस तरह प्रतिक्रिया करना स्वाभाविक था जैसा उसने किया।
इस घटना के बाद के लगभग तीन दशकों में, सेना के बैरकों से इक्कीस मामले सामने आए, जहाँ पंक कुलियों की यूरोपीय सैनिकों के हिंसक कृत्यों में मृत्यु हो गई। लगभग सभी मामलों में, जिनकी वास्तव में सुनवाई हुई, समान न्यायिक तर्क अपनाए गए। कुछ ऐसे मामले तो सुनवाई तक ही नहीं हुए क्योंकि सैन्य अधिकारियों ने इन मौतों को ‘दुर्घटना’ घोषित करके या अपराधी का पता लगाने में असमर्थता का हवाला देकर, उन्हें दबा दिया। उपनिवेशवादियों की नींद उपनिवेशित जीवन से ज़्यादा महत्वपूर्ण थी।”(मूल लेख अंग्रेजी में है।इसे हमने गूगल लेंस से अनुवाद किया है)


उपसंहार
पंखावाला अंग्रेजो द्वारा स्थापित की गई एक शोषणकारी व्यवस्था थी।इस व्यवस्था में दलित आदिवासी पिछड़ों समुदाय के लोगों का शोषण किया गया,अनके कष्ट दिए,हत्याएं किए गए।



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