वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोग प्रायः यह दावा करते हैं कि शहीद भगत सिंह जी नास्तिक थे और उन्हें कम्युनिस्ट विचारधारा से भी जोड़ते हैं। किंतु जब इस दावे के समर्थन में प्रमाण मांगे जाते हैं,तो वे प्रायः “मैं नास्तिक क्यों हूँ” शीर्षक के नाम की एक पुस्तक दिखाते हैं।
इस लेख में तथ्यों के आधार पर जानने का प्रयास करेंगे की क्या शहीद भगत सिंह जी नास्तिक थे?
क्या उन्होंने मैं नास्तिक क्यों हूं?,नाम की पुस्तक लिखा था?
मैं नास्तिक क्यों हूं
मैं नास्तिक क्यों हूं शीर्षक से पुस्तक दिखाते हुए यह बताया जाता है कि यह पुस्तक भगत सिंह जी ने लिखी। जबकि यह पुस्तक नहीं है।यह सात पन्नों का लेख है जो लाहौर के अखबार पीपुल्स में 27 सितंबर 1931 में प्रकाशित हुआ था।
यहां यह ध्यान देने वाली बात है कि 23 मार्च 1931 में भगत सिंह जी देश के लिए शहीद हो गए थे।यह लेख उनके शहीद होने के बाद प्रकाशित हुआ।
मैं नास्तिक क्यों हूं पुस्तक पर वामपंथी खेल
वामपंथ मैं नास्तिक क्यों हूं लेख को पुस्तक का रूप दिया और इस लेख को पुस्तक की तरह प्रचार किया। ऐसा इसलिए किया गया ताकि यह भ्रम फैलाया जा सके कि मैं नास्तिक क्यों हूं पुस्तक भगत सिंह जी ने लिखा।
सात पन्नों के लेख को पुस्तक स्वरूप देने के लिए वामपंथ से जुड़े लेखकों ने पुस्तक में भूमिका, संपादकीय,परिचय आदि विषय जोड़ दिया।इन विषयों पर वामपंथी लेखकों ने अपनी बातें लिखी। परंतु पुस्तक लेखक के नाम पर भगत सिंह जी का नाम दिया गया, ताकि ऐसा प्रतीत हो की यह पूरी पुस्तक भगत सिंह जी ने लिखा है।
मैं नास्तिक क्यों हूं लेख का एक अंश
मैं नास्तिक क्यों हूं लेख का वह अंश ज्यादा प्रचारित किया जाता है जहां पर यह लिखा है कि 1926 में भगत सिंह जी, नास्तिक हो गए थें।
तथ्यों के आधार पर हम पड़ताल करेंगे कि क्या भगत सिंह जी नास्तिक थे?और मैं नास्तिक क्यों हूं लेख उन्होंने ही लिखा था?

भगत सिंह जी के पत्र
भगत सिंह जी ने अपने दादा जी और पिता जी को पत्र लिखे थे।यह पत्र ,भगतसिंह पत्र और दस्तावेज नामक पुस्तक में प्रकाशित है।यह पुस्तक भगतसिंह जी के भाई की पुत्री ने लिखा है।इन पत्रों में भगत सिंह जी ओम, नमस्ते, परमात्मा और अपने यज्ञोपवीत की बात लिख रहे हैं।
1918 के पत्र में भगत सिंह जी पत्र की शुरुआत ओम से कर रहे हैं।पत्र में अपने दादा जी को नमस्ते कर रहे हैं और अपने परीक्षा परिणाम के बारे में बता रहे हैं।पत्र में ओम नास्तिक व्यक्ति नहीं लिखेगा।

भगत सिंह जी का यह 1921 का पत्र,जो उन्होंने अपने दादा जी को लिखा था।इस पत्र की शुरुआत ओम से हो रही है एवं पत्र में भगत सिंह जी अपने दादा जी के खैरियत की कामना परमात्मा से कर रहे हैं। ऐसा पत्र आस्थावान ही लिखेगा।

1923 में भगत सिंह जी अपने पिता जी को पत्र लिखा,इस पत्र में वे अपने यज्ञोपवीत की बात कर रहे। अपने पिता जी का याद दिला रहे हैं की उन्हें उनके यज्ञोपवीत के दिन देश सेवा के लिए वक्फ किया गया था। ऐसा पत्र नास्तिक नहीं लिख सकता।

विश्व प्रेम 1924 का लेख
भगत सिंह जी का लेख विश्व प्रेम,बलवन्त सिह के छद्म नाम से कलकत्ता के प्रकाशित साप्ताहिक ‘मतवाला’ (वर्ष: 2, अंक सं. 13-14) के दो अंकों में छपा था। इन अंकों की तारीखें क्रमशः 15 नवम्बर, 1924 एवं 22 नवम्बर, 1924 थीं।
इस लेख में भगत सिंह जी वसुधैव कुटुंबकम की बात कर रहे एवं नास्तिक को विश्वास और परमपिता की बात लिख रहे हैं।इसी लेख में रामचंद्र और कृष्ण जी का उदाहरण देते, उन्हें विश्व प्रेम का परिचय देने वाला बताया।ऐसा लेख कभी कोई नास्तिक नहीं दिखेगा।यहां हम लेख का अंश दे रहे हैं आप स्वयं पढ़ें।




युवक 1925 का लेख
युवक,शीर्षक से लेख भगतसिंह का यह लेख ‘साप्ताहिक मतवाला’ (वर्ष : 2,अंक सं. 36,16 मई, 1925) में बलवन्तसिंह के नाम से छपा था।
इस लेख में विधाता, देवता, प्रहलाद,रावण, भीष्म, महाभारत,जगदंबा,ईश्वरीय रचना आदि के बारे में लिखते हैं। ऐसा लेख कभी कोई नास्तिक नहीं लिख सकता। लेख का अंश हम यहां दे रहे हैं आप स्वयं पढ़ें।



अब कोई, “मैं नास्तिक क्यों हूं”लेख का संदर्भ देकर यह कह सकता है कि,भगत सिंह 1926 में नास्तिक हुए,तो प्रमाण 1926 के बाद का दिखाओ। क्योंकि हमने अभी तक सारे रिफेरेंस 1926 के पहले के दिखाये है।इसलिए अब कुछ रिफरेंस हम 1926 के बाद का दिखा रहे हैं।
काकोरी के वीरों से परिचय 1927
‘काकोरी के वीरों से परिचय’,भगत सिंह जी का यह लेख मई 1927 में प्रकाशित हुआ।
इस लेख में भगत सिंह जी काकोरी के वीरों के लिए उन्हें बल और शक्ति देने के लिए ईश्वर से कामना कर रहे हैं। ऐसा केवल आस्थावान ही कर सकते हैं।

अमरचंद जी को पत्र
1927 में भगत सिंह जी अपने मित्र को पत्र लिखते हैं।इस पत्र में ईश्वर के चाहने और ईश्वर की मंजूरी की बात लिखते हैं। नास्तिक व्यक्ति कभी भी ऐसा नहीं लिखेगा।पत्र आप स्वयं पढ़ें।

कूका विद्रोह 1928
भगत सिंह जी ने कूका विद्रोह पर दो लेख लिखे।
कूका विद्रोह भाग एक,फरवरी 1928 में दिल्ली से प्रकाशित ‘महारथी’ में प्रकाशित हुआ।
कूका विद्रोह भाग दो,अक्टूबर, 1928 में ‘किरती’ मासिक पत्रिका प्रकाशित हुआ।कूका विद्रोह भाग एक में भगत सिंह जी “सर्वज्ञ भगवान जाने” लिखा और कूका विद्रोह भाग दो में , “कुछ ईश्वर ने स्थिति भी ऐसी ही पैदा कर दी” लिखा। ऐसे उद्धरण केवल आस्थावान ही दे सकता है।


23 मार्च 1931
भगत सिंह जी की भतीजी वीरेंद्र संधु जी ने,अमर शहीद भगत सिंह नाम की पुस्तक लिखा।इस पुस्तक में उस दिन के बारे में लिखा गया जिस दिन भगत सिंह जी शहीद हुए थे।23 मार्च 1931 के दिन के बारे में इस पुस्तक में लिखा गया।इस पुस्तक के अनुसार भगत सिंह जी ने अपना अंतिम संदेश प्राणनाथ मेहता जी को दिया।उनका अंतिम संदेश यह था कि वह पुनर्जन्म लेकर फिर से मातृभूमि की सेवा करना चाहते हैं। कोई भी नास्तिक व्यक्ति पुनर्जन्म की बात नहीं कर सकता।

उपसंहार
शहीद भगत सिंह जी की भतीजी ने अमर शहीद भगत सिंह और भगत सिंह पत्र और दस्तावेज नामक पुस्तक लिखी, इन दोनों पुस्तक में मैं नास्तिक क्यों हूं,लेख नहीं मिलता।
भगत सिंह जी के पत्र और लेख में ईश्वर,परमात्मा, परमपिता,रामचंद्र ,कृष्ण,पुनर्जन्म,भगवान,ओम,
विधाता,यज्ञोपवीत, देवता,जगदंबा आदि का संदर्भ मिलता है।ये सब एक आस्तिक के गुण हैं।
मैं नास्तिक क्यों हूं लेख के अनुसार भगत सिंह 1926 में नास्तिक हुए, परंतु हमने 1926 के बाद भी प्रमाण दिखाए जहां वे ईश्वर और भगवान का जिक्र करते हैं।
शहीद भगत सिंह जी ने अपने अंतिम संदेश में कहा की ,” फिर जन्म लूं और अपने मातृभूमि की और सेवा करु”।
एक नास्तिक पुनर्जन्म की बात नहीं करेगा।
प्रमाणों से यह पुष्टि नहीं होती की भगत सिंह जी ने मैं नास्तिक क्यों हूं लेख या पुस्तक लिखा।
हमने यह भी बताया कि किस तरह एक सात पन्ने के लेख को पुस्तक का रूप वामपंथियों ने दिया।
सभी प्रमाणो से यह प्रतीत होता की मैं नास्तिक क्यों हूं पुस्तक वामपंथियों का प्रचार है।



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