भारत की प्राचीन सिंधु संस्कृति आज भी एक रहस्य बनी हुई है, हालांकि लिपि न पढ़ पाने के कारण इस संस्कृति का निश्चित पहलू हमारे सामने आना बाकी है। फिर भी वहां से प्राप्त अनेकों चीजें इस संस्कृति के बहुत से तथ्यों को उजागर करती है। प्राप्त वस्तुओं का तुलनात्मक अध्ययन बहुत सारी जानकारियां साझा करता है। आइये हम कुछ और चीजें देखते हैं जो इसकी समानता को हिंदुओं से जोड़ती है।
सिंधु सभ्यता में कमंडल और मृगचर्म – मृगचर्म वैदिक परिव्राजकों का एक पहनावा रहा है। जिसपर धम्मपद में गौत्तम बुद्ध ने कटाक्ष करते हुए भी कहा था कि मृगचर्म या अजिन धारण से कोई ब्राह्मण नहीं होता है।
इससे पता चलता है कि वैदिक ब्राह्मण बुद्ध के समय मृगचर्म भी धारण करते थे। ऋषि विश्वामित्र की १०० ईसापूर्व की एक छवि में भी उन्हें मृगचर्म सहित दिखाया है।


कमंडल – हिंदु साधुओं, तपस्वियों और भगवान ब्रह्मा तथा शिव जी द्वारा कमंडल धारण किया जाता था। सिंधु सभ्यता से भी कमंडल मिले हैं किंतु उससे पहले हम कमंडल के कुछ प्रमाण देखते हैं –






हालांकि सिंधु सभ्यता की किसी मुद्रा पर मृगचर्म और कमंडल का प्रयोग नहीं उकेरा है। किंतु कमंडल की पुरातात्विक प्राप्ति इसके उपयोग को सिद्ध करती है। मृगचर्म पुरातात्विक रुप से मिलना मुश्किल है किंतु अकेडियन की एक मुद्रांक पर दो सिंधु सभ्यता के निवासियों को दर्शाया है। जिनको अकेडियन राजा या अध्यक्ष से वार्ता करते हुए दर्शाया है। वहां सिंधु वासियों को मेलुहा कहा जाता था। शील पर दोनों भारतीयों (सिंधु वासियों ) में से एक को दांडी केश सहित और कंधे पर मृगचर्म धारण किए और हाथ में कमंडल लिए दर्शाया गया है।




इस प्रमाण से स्पष्ट है कि सिंधु सभ्यता में मृगचर्म और कमंडल का प्रयोग होता था। बुद्ध ने बाद में मृगचर्म का विरोध किया था। और यही दोनों चीजें हमें हिंदु प्रतिमाओं या हिंदु दार्शनिकों के साथ बाद के अंकनों में भी देखने को मिलता है। अतः इससे स्पष्ट है कि सिंधु सभ्यता बौद्ध सभ्यता तो बिल्कुल नहीं थी, हां हिंदु संस्कृति के अवश्य निकट दिखती है।

