भगवान कृष्ण के मानवीय चक्र सहित अंकन हमें ४०० ईसापूर्व से ही प्राप्त हो जाते हैं। प्रतिमाएं भी २०० ईसापूर्व से प्राप्त हो जाती है। भगवान की बाल्यकथाओं और जीवन कथाओं से संबंधित लेख और फलक भी हमें बहुत प्राचीन समय से प्राप्त होने लगते हैं। इसी एक बाल्य लीला में अतिप्रसिद्ध केशीवध की प्राचीनता के प्रमाण हम इस लेख में देंगें।
1.मेट संग्रहालय में संरक्षित ५ शताब्दी गुप्त कालीन केशीवध

2.रंगमहल से प्राप्त ३ – ४ शताब्दी प्राचीन केशीवध
इसमें भगवान श्री कृष्ण वाला भाग खंडित है।

3.मंदौर से प्राप्त ३ शताब्दी (कुछ के अनुसार ४ – ५ शताब्दी) के फलक पर केशीवध
इसमें केशीवध के साथ – साथ अरिष्टासुर वध का अंकन है।

4.गांधार से प्राप्त कुषाणकालीन केशीवध

5. मथुरा से प्राप्त केशीवध
अब आप लोग कहेंगे कि यह तो सब कुषाणकालीन है, लेकिन सांची भर्हुत पर बुद्ध संबंधित कथाओं के अंकन तो शुंग काल में मिल जाते हैं। तो भगवान कृष्ण के इसी केशीवध का अंकन हमें मूसानगर के एक फलक से शुंग कालीन मिलता है। मूसानगर को जैसे बौद्धों का सांचि भरहुत था वैसे ही हिंदुओं के लिए शुंग काल में मूसानगर और जैन के लिए कंकाली टीला था।

6.मूसानगर से शुंग कालीन केशी वध

उपसंहार
इस प्रमाण से सिद्ध होता है कि भरहुत में बुद्ध कथाओं के अंकन के समय से ही मूसानगर आदि जगहों पर कृष्ण जी और भगवान शिव के कथाओं के फलकाकंन होने लगे थे। यहां शुंग काल में भी हमें कृष्ण जी मानवीय रुप में दिखते हैं, जबकि शुंग कालीन भर्हुत में बुद्ध का कोई भी मानवीय अंकन नहीं किया गया है। बुद्ध को प्रतीकात्मक रुप से पुष्प, वृक्ष, अग्नि स्कन्ध, चरण चिन्ह के रुप में दर्शाया गया है जबकि यहां श्रीकृष्ण जी को मानवीय रुप में दर्शाया गया है।

