Latest Blog

,

भारतीय मुद्रा का इतिहास

Listen to this article

भारतीय मुद्रा रुपए का इतिहास —-

यहां हम रुपए के इतिहास को जानने के लिए पाणिनि के अष्टाध्यायी नामक व्याकरण ग्रन्थं के एक सूत्र का उल्लेख करना जरूरी समझते हैं। हालांकि पाणिनि के काल के सम्बन्ध में काफी मतभेद है! कुछलोग उन्हें सातबीं शती ईo पू० में रखते हैं तो अन्य उनका काल ई० पू० पांचवीं शती के मध्य निर्धारित करते हैं। मतभेद जो भी है फिर भी महर्षि पाणिनी का काल ईसा पूर्व पांचवीं शताब्दी ही मान कर चले तो भारत में सिक्कों का प्रचालन ई० पू० पांचवीं शती प्राप्त हो ही जाता हैं।

पाणिनि का उक्त सून्न है- [ रूपाद् आहत ]
इस सूत्र अनुसार , रूप शब्द से आहत के भाव में (रूप्य ) बनता है ! इस प्रकार इसका तात्पर्य हुआ आकृतियों (चिन्हों ) से आहत, इस आधार पर वासुदेव शरण अग्रवाल ने यह मत प्रतिपादित किया है कि इसका भाव है [‘ चिहों से आहत धातु-खण्ड ] अर्थात सिक्के। इस प्रकार वे कहते कि पाणिनि के काल में सिक्को प्रचलन हो गया था !

आज का रुपया मूलतः संस्कृत का रुप्य ही हैं। विशेषकर चांदी के वह सिक्के जो आहत अर्थात जिन पर चिन्ह अंकित किए गए हो रूप्य कहे गये। आहत सिक्कों को ही पंचमार्क सिक्का भी कहा जाता हैं। आहत सिक्कों को बनाने के लिए धातु के टुकड़ों पर औज़ारों से प्रहार किया जाता था, इसलिए इन्हें आहत सिक्के कहा जाता है। ये सिक्के प्रारंभ में चांदी के बनाते थे बाद में यह मौर्य काल आते आते तांबे, और कांसे के बनने लगे। इन सिक्कों पर मछली, पेड़, मोर, यज्ञ वेदी, हाथी, शंख, बैल, ज्यामितीय चित्र, और खरगोश जैसे जंतुओं की आकृतियां बनाई जाती थी। कुछ लोग रुपया का इतिहास शेरशाह सूरी के चांदी के सिक्कों से जोड़ कर देखते हैं। जबकि ऐसा नहीं है भारतीय मुद्रा अर्थात रुपया का इतिहास कम से 500 ईसा पूर्व तो स्वीकार करना ही पड़ेगा। पाणिनी और उनके अष्टाध्यायी नामक व्याकरण ग्रन्थं को प्रमाण माने तो।


Discover more from Sanatan Samiksha

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Discover more from Sanatan Samiksha

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading

Discover more from Sanatan Samiksha

Subscribe now to stay up to date with our latest, blog by joining our newsletter.

Continue reading