भगवान राम भारतीय संस्कृति में ऐसे रचे बसे हैं कि भारतीय संस्कृति से भगवान राम को निकाल पाना असंभव है। फिर भी भारत में बैठा एक वर्ग भगवान राम को काल्पनिक बताने में लगा रहता है। भगवान राम पर साहित्यिक ग्रंथ मौजूद हैं साथ ही इतिहासिक और आर्कियोलॉजीकल प्रमाण भी मिलते हैं।इस लेख में हम भारतीय जनजाति वर्ग में भगवान राम कितने व्यापक रूप से मौजूद हैं वो जानेंगे।धर्मांतरण कराने के उद्देश्य से एक वर्ग ऐसा भी है जो यह बोलता हैं कि आदिवासी हिंदू नहीं है। आज हम आदिवासी समाज में भगवान राम की उपस्थिति दिखाएंगे। वैसे तो अनेक आदिवासी गीत, संस्कृति, परंपरा विभिन्न आदिवासीयो में है जौ भगवान राम से जुड़ी है चूंकि ये सब एक ही लेख में बता पाना संभव नहीं है, इसलिए हम आज कुछ प्रमुख संदर्भ देखेंगे।
कर्बी रामायण
भारत के उत्तर पूर्वी क्षेत्र में बसने वाली कर्बी जनजाति अपनी मूल उत्पत्ति त्रेता युग में हुए रामायण युद्ध के समय से बताती है।कर्बी आज भी श्री राम और सीता की पूजा करते हैं। राम कथा का गायन होता है ।राम परशुराम संवाद में भी समानता दिखती है सूर्पनखा (दुर्पनखा ) के कहने पर सीता का अपहरण तथा सीता शोध में जटायु, हनुमान आदि वीरों का वर्णन लगभग एक जैसा ही है। सीता का वन गमन तथा वाल्मीकि आश्रम का उल्लेख भी कर्बी रामायण में है।कर्बी रामायण स्पष्ट बताती है कि उसकी परंपरा मौखिक है, जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को कंठ के द्वारा दी जाती थी।
बिरहोर रामायण
बिरहोर (या बिरहुल ) ट्राइब मुख्य रूप से भारत के झारखंड में रहते हैं इसके अतिरिक्त छत्तीसगढ़ , पश्चिम बंगाल,उड़ीसा राज्य में भी इनकी आबादी हैं । वे बिरहोर भाषा बोलते हैं।बिरहोर का अर्थ है ‘जंगल के लोग’ – बीर का अर्थ है ‘जंगल’, होर का अर्थ है ‘पुरूष’।बिरहोर लोग खुद को सूर्यवंशी मानते हैं और भगवान राम पर आस्था रखते हैं।बिरहोर जनजातियों का रामायण कहता है कि भगवान सिंगबोगा ने पृथ्वी का निर्माण किया और उसे राजा रावण को सौंप दिया। किंतु रावण आतताई बन गया और मानव समूह को मारने लगा। तब मानव की दुर्दशा से द्रवित होकर भगवान ने वचन दिया धीरज रखो मैं किसी मानव कोख से जन्म लुगा और रावण का वध करूंगा। और फिर भगवान राम का जन्म हुआ।बिरहोर रामायण में भी वाल्मीकि रामायण की तरह की माता सीता का अपहरण होता है। फिर राम रावण युद्ध होता है और अंत में रावण का वध प्रभु श्री राम जी द्वारा होता है।
मुंडारी रामायण
मुंडा ट्राइब मुख्य रूप से झारखंड के दक्षिण और पूर्वी छोटानागपुर पठार क्षेत्र , ओडिशा और पश्चिम बंगाल में केंद्रित पाए जाते हैं ।मुंडा ट्राइब मुंडारी बोलते है।
रामायण का यह प्रमाण मुंडाओं के उस दावे को पुख्ता करता है कि वे मंदार पर्वत और उसके आसपास निवास करते थे।मुंडा ट्राइब के रामायण में अयोध्या का एक गांव है, सीता जी एक आदिवासी लड़की है जिनका जन्म अकाल के समय समय हुआ।सीता जी का रावण अपहरण कर लिया है। मुंडा ट्राइब की रामायण वाल्मीकि रामायण से समानता रखती है। रामायण का मुंडा ट्राइब के बीच लोकप्रिय होना,उनके भगवान राम के प्रति आस्था को दिखाता हैं ।मुंडाओ की मान्यता है कि लंबी पूंछ वाले “वानर” वास्तव में जंगलों में निवास करने वाले जनजाति है, जो अपनी धोती इस प्रकार बांधते थे कि उसका एक भाग पुंछ की तरह पीछे लटकता था।
गोंडी रामायनी
गोंड मान्यता के अनुसार,विश्व निर्माण की कथा कहती है कि महादेव और पार्वती से उत्पन्न प्रथम मानव गोंड था। रावण राम के युद्ध के समय रावण के राज्य के समीप एक गोंड दंपति रहती थी जिसे पूर्व जन्म में महादेव का श्राप था, कि लंका में जाने समय जब तक भगवान राम का चरण नहीं धोयेगे तब तक वह पुत्रों को नहीं पाएंगे। गोंड पति पत्नी भगवान राम की प्रतीक्षा करते रहे और भगवान राम के आगमन के बाद दंपत्ति भगवान राम के पैर धोए और भगवान राम ने उन्हें तीन पुत्रों का आशीर्वाद दिया।गोंडी रामायनी में लक्ष्मण जी को नायक माना जाता है।और प्रभु राम को भगवान। गोंड जनजाति का मानना है कि लक्ष्मण जी का स्वभाव गोड़ों से बहुत मिलता है। गोंडी रामायनी अलग अलग प्रसंगों में वर्णित है वाचिक परंपरा में पिरोई गई है। इसमें कुछ प्रसंग जैसे इंद्रकामिनि,तिरियाफूल,मचलादई,रानी पुफैया,बीजुलदई प्रमुख प्रसंग है।

भगवान राम ,रावण से युद्ध के लिए आगे बढ़े और विजय हुये। माता सीता सहित लंका से वापस आते समय भगवान राम ने कुछ गोंडो को अपने साथ लाये यह “सूर्यवंशी गोंड” कहे जाने लगे।
कोल जनजाति में रामकथा
कोल जनजाति में रामकथा वाचिक परंपरा में जीवंत है। रामकथा गायन की शैली में प्रस्तुत की जाती है।राम शबरी प्रसंग को बहुत महत्व दिया गया है।भगवान राम के सापेक्ष शबरी का प्रसंग सबसे अधिक लोकरंजक है, जो प्रकाशित-अप्रकाशित सभी रामकथाओं में वर्णित है। शबरी कोल जनजाति की युवती बाला हैं। उन्हें भगवान राम ने अपनी भक्ति प्रदान की थी, इसीलिए भगवान राम से भी बढ़कर कोलों ने शबरी की पूजा करते हुए यह सिद्ध कर दिया कि भगवान राम से बड़ा भगवान राम का भक्त होता है।कोलहाई दादर, जिसे कोलदहंका भी कहा जाता है।यह मध्यप्रदेश में कोल जनजाति के द्वारा गाया जाता है इसमें भगवान राम के प्रसंग मिलते हैं।
भीली रामायण (राम-सीतमानी)
भील आदिवासियों के ऋतुचक्र के अनुसार वर्ष भर मनाये जाने वाले धार्मिक और सामाजिक पर्व-प्रसंगों में लोक महाकाव्य ‘रोंम-सीतमानी वारता’ (भीली रामायण) के पाठ मिलते हैं।रॉम-सीतमानी वारता 30 पंखुड़ियों (अध्याय, पर्व) में विभाजित है। ऋतुचक्र के मास के आह्वान में रॉम-सीतमानी वारता (भीली रामायण) भील साधु और भोपों (ओझा) द्वारा तम्बूर, मंजीरे, साँग (चर्म वाद्य) और बंसी जैसे लोकवाद्यों पर नृत्य के साथ इसका गान-कथन किया जाता है। इसके पाठ को साधु या भोपा परम्परा और गुरु से प्राप्त करता है।
राभा जनजाति में रामकथा
राभा असम की जनजाति है।इस जनजातीय समाज में रामायण की कथाओं और भगवान राम के चरित्र का स्थान महत्त्वपूर्ण तथा पूजनीय है। रामायण की कथाओं पर आधारित जनजातीय नाटक-‘ भारीगान’ (Bhaarigan), राभा समाज में प्रचलन में है।भारीगान के नाट्य मंचन में ‘रावण वध’ और ‘लक्ष्मणार शक्तिसेल’ सम्मिलित हैं। इन दोनों कथाओं में राम की सामाजिक जिम्मेदारी अपने अनुगामियों के प्रति स्नेह और देशभक्ति को प्रस्तुत किया जाता है।उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि असम के प्रमुख जनजातीय समाज पर भगवान रामचन्द्र तथा उनके जीवन से जुड़ी अनेक प्रमुख घटनाओं का प्रभाव है। भारीगान में उनकी प्रस्तुति उसका सबसे बड़ा प्रमाण है।

रामनामी
रामनामी समुदाय छत्तीसगढ़ में निवास करती हैं। ये भगवान राम के परम भक्त होते हैं। संपूर्ण शरीर में राम नाम लिखवाते हैं और भगवान राम का भजन करते हैं।


मिजो रामायण
मिजो रामायण बहुत छोटा है, जो मुख्य रामायण का सारांश सा है परंतु इस कथा के अपने अलग तत्व हैं। मिजो रामायण में राम और सीता के साथ खेना (लक्ष्मण), हावलामान (हनुमान), वानुमान (जांबवान), लुफिरॉबन (महिरावण), लुशरिहा (रावण) मुख्य पात्र हैं।मिजो जनजातियों में रामकथा का अपना महत्व है। यहां पर रामायण लिखित रूप में उपलब्ध नहीं रहा है बल्कि लोकगीतों एवं लोककथाओं में रामायण कथाएँ कही जाती रही हैं।मिजो रामकथा में अपनी अलग कथावस्तु है। जो वाल्मीकी रामायण का सारांश ग्रहण करती है, परंतु उसमें वन्य तत्व अधिक विद्यमान हैं।मिजो जनजाति के विभिन्न पारिवारिक एवं सामाजिक अवसरों में खेना और राम देवताओं का आह्वान किया जाता है। वहाँ मंत्रों में इस प्रकार इन्हें याद किया जाता है।
कुछ अन्य जनजातियों में राम कथा
इसके अतिरिक्त भारत के कई जनजाति जैसे, कोरकू,कमर,सओर,संथाल,भुईयां,देऊरी,तिवा के जनजातीय संस्कृति में भगवान राम उपस्थित हैं।
उपसंहार
प्राप्त साक्ष्यों के अनुसार कहा जा सकता है कि सबसे पहले भगवान राम ने ही आदिवासियों की महत्ता स्वीकार की, उन्हें यथोचित सम्मान दिया और आदिवासियों ने भी उन्हें सिर-माथे चढ़ाया और भगवान की मान्यता दी, जिसके चलते दोनों एक-दूसरे के पूरक हो गये। रामकथा और आदिवासी संस्कृति रचि बसी है। अनेक आदिवासी बोली में अनेक आदिवासी गीतों,नाटक, नृत्य,और संस्कारों में रामकथा की अमिट छाप देखी जा सकती है।



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