यह कहा जाता है कि ललई बौद्ध उर्फ ललई यादव द्वारा लिखित पुस्तक सच्ची रामायण को ही सुप्रीम कोर्ट ने सच माना और इस पुस्तक के आधार पर रामायण को कोर्ट ने काल्पनिक कहा।यह भी कहा जाता है कि सच्ची रामायण ही सच्ची है क्योंकि कोर्ट ने सरकार द्वारा लगाए गए प्रतिबंध को को हटा दिया।आज हम इन सभी प्रोपोगेंडा को तथ्यों के आधार खंडन करेंगे।
सच्ची रामायण कैसे आई
सबसे पहले ईवी रामास्वामी जिन्हें पेरियार भी कहते हैं,उनके द्वारा तमिल भाषा में एक पुस्तक लिखी गई जिसका शीर्षक रामायण पथिरंगल था जिसका हिन्दी अर्थ रामायण के पात्र होता है।इस पुस्तक में रामायण के के पात्र जैसे दशरथ, भगवान राम, माता सीता, लक्ष्मण, रावण को लेकर अपने व्यक्तिगत विचार लिखें।चूंकि पेरियार हिंदू धर्म को नहीं मानते थे और वे हिंदू धर्म के आलोचक थे तो उनकी पुस्तक में वो आलोचना ही लिखेंगे।बाद में पेरियार की पुस्तक का अंग्रेजी संस्करण प्रकाशित हुआ जिसका नाम ramayan a true reading किया गया।फिर इसका प्रकाशन ललई बौद्ध द्वारा किया गया और इसका नाम तब जाके सच्ची रामायण हुआ।
नाम का खेल क्यो किया गया
नाम का खेल समझना आवश्यक है, पेरियार ने सच्ची रामायण नाम से कोई किताब नहीं लिखी। उन्होंने रामायण पधिरंगल लिखी। जिसका अर्थ रामायण के पात्र होता है।फिर भी पेरियार की पुस्तक का हिंदी अनुवाद सच्ची रामायण नाम के शीर्षक से प्रकाशित हुआ। जबकि इसका नाम रामायण के पात्र होना चाहिए।सच्ची रामायण शीर्षक करने के पीछे यह कारण था, ताकि हिंदू समाज को भ्रमित किया जा सके और ये बताया जा सके कि रामायण के बहुत से वर्जन है उन सभी वर्जन में सच्ची रामायण ही सच है।
इसके साथ ही ललई बौद्ध जो हिन्दू धर्म के आलोचक थे और हिंदू धर्म त्याग कर के बौद्ध बन गए थे एवं अपने नाम से यादव हटा दिया था और ललई बौद्ध लिखने लगे थे।आज वापस उनके नाम में वामपंथी लोग ललई यादव ही लिख रहे हैं।
इसके पीछे भी हिंदू समाज को बांटने की कोशिश है ताकि जाति के आधार पर हिंदू धर्म को तोडा जा सके।
वर्तमान में सच्ची रामायण
वर्तमान में सच्ची रामायण पेरियार हुंवी रामास्वामी नाम से एक संपादकीय पुस्तक राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया। इस पुस्तक के संपादक प्रमोद रंजन है।
ध्यान देने की बात है कि यह एक संपादकीय पुस्तक है।संपादकीय पुस्तक में संपादक अपने हिसाब से पुस्तक का शीर्षक व कंटेंट को तय कर सकता है। संपादित पुस्तक मूल पुस्तक से भिन्न हो सकती है।यहा ध्यान देने की बात है एक संपादकीय पुस्तक को सच्ची रामायण के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। इसके पीछे का मकसद यह है कि हिंदू में मनोवैज्ञानिक दबाव बनाकर उन्हें हिन्दू धर्म से अलग किया जा सके।
इन बातों को याद रखें
पेरियार द्वारा सच्ची रामायण नाम से कोई पुस्तक नहीं लिखी गई। पेरिवार ने रामायण पशिरंगल नाम से किताब लिखी जिसका हिन्दी अनुवाद रामायण के पात्र होता है।
सच्ची रामायण नाम के शीर्षक से ललई बौद्ध ने पुस्तक प्रकाशित कि और दावा किया कि वह पेरियार की मूल पुस्तक का हिंदी अनुवाद है। जबकि मूल पुस्तक तमिल भाषा में थी और ललई बौद्ध को शायद ही तमिल भाषा आती होगी, ऐसे सवाल उठता है कि उन्होंने अनुवाद कैसे किया? असल में सच्ची रामायण का हिंदी अनुवाद श्री राम आधार ने किया था ललई बौद्ध ने इसे प्रकाशित किया था।
वर्तमान में सच्ची रामायण नाम से प्रकाशित पुस्तक संपादकीय पुस्तक है।ललई बौद्ध हो या पेरियार वे दोनों हिंदू नहीं थे और हिंदू धर्म के आलोचक थे। ऐसे में इनके द्वारा हिंदू धर्म की आलोचना करना स्वाभाविक है।
हिंदू के लिए केवल वाल्मीकि रामायण ही मान्य है। अन्य कोई भी रामायण नाम से कुछ भी लिखे उसका कोई औचित्य नहीं।
ललई बौद्ध उर्फ ललई यादव का केस
वामपंथीयो ने यह झूठ फैलाया की ललई यादव(ललई बौद्ध) की सच्ची रामायण को सुप्रीम कोर्ट ने भी सही माना। और सच्ची रामायण ही सच है वाल्मिकी रामायण काल्पनिक है।
यह भी कहा गया की सरकार सुप्रीम कोर्ट में केस इसलिए हार गई क्योंकि रामायण काल्पनिक है। सुप्रीम कोर्ट ने रामायण को काल्पनिक माना।आज हम इस केस की सच्चाई बताएंगे।
सच्ची रामायण केस
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ललई यादव उर्फ ललई बौद्ध द्वारा सच्ची रामायण को प्रतिबंधित कर सच्ची रामायण को जब्त किया गया।
यह केस उत्तर प्रदेश हाई कोर्ट में गया जहां कोर्ट ने जब्त की गई पुस्तक को वापस करने को कहा और बाद में सुप्रीम कोर्ट में यह केस गया जहां उत्तर प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले को सही माना गया।
आज हम हाई कोर्ट और सुप्रीम का जजमेंट बताएंगे
हाई कोर्ट में क्या जजमेंट था आइए देखते है
ललई बौद्ध द्वारा सच्ची रामायण प्रकाशित किया गया जिसे उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जब्त किया गया और पुस्तक को प्रतिबंधित किया गया।
सरकार के खिलाफ ललई बौद्ध उत्तर प्रदेश हाई कोर्ट गए जहां वो इसलिए जीत गए क्योंकि सरकार ने जरूरी कानूनी कार्यवाही करने में लापरवाही की।
19 जनवरी 1971 को उत्तर प्रदेश हाई कोर्ट का फैसला आया। जिसमें कहा गया की पुस्तक को जब्त और प्रतिबंध करने का आधार सरकार द्वारा नहीं बताया गया।
सच्ची का हिंदी अनुवाद श्री राम आधार ने किया था। ललई बौद्ध उर्फ यादव ने प्रकाशन किया था पर ये प्रचारित किया गया कि ललई बौद्ध उर्फ यादव ने अनुवाद किया, आप इलाहाबाद हाईकोर्ट का जजमेंट देखें।

कानूनी लापरवाही जिसका लाभ ललई बौद्ध को मिला
99 ए के तहत सरकार को तीन शर्तो को पूरा करना था।सरकार ने 99ए के तहत दो शर्तों का विवरण तो दिया पर तीसरी शर्त का कोर्ट में कोई विवरण नहीं दिया और कोर्ट में यह कह दिया कि प्रतिबंधित पुस्तक कोर्ट में दिया गया है।सरकार ने कोर्ट को लिखित में यह नहीं बताई की पुस्तक में ऐसा क्या है जिसके कारण ऐसे जब्त करना चाहिए ललई बौद्ध को सरकार द्वारा की गई गलती का लाभ मिला और सरकार केस हार गई ।कोर्ट द्वारा ललई बौद्ध की किताब के समर्थन पर कोई टिप्पणी नहीं कि गई।

सुप्रीम कोर्ट जजमेंट
हाई कोर्ट में हारने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार सुप्रीम कोर्ट गई।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई इस पर होनी थी की क्या धारा 99ए की शर्तों को पूरा करना अनिवार्य है। क्योंकि उत्तर प्रदेश हाई कोर्ट ने फैसला इसी आधार पर दिया था जिससे सरकार हार गई थी।16/9/1976 को सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया और ये माना की 99ए की शर्तों को पूरा करना अनिवार्य है।और सरकार यहां भी हार गई।
अब तक का निष्कर्ष
ललई बौद्ध के सच्ची रामायण केस में हाई कोर्ट या सुप्रीम द्वारा सच्ची रामायण पर कोई टिप्पणी नहीं कि गई।हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट द्वारा सच्ची का किसी भी तरह समर्थन नहीं किया गया।हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट द्वारा सरकार द्वारा पुस्तक पर लगाए प्रतिबंध को गलत नहीं कहा गया केवल कानूनी प्रक्रिया को लेकर कोर्ट द्वारा बातें कही गई।99ए की अनिवार्यता आवश्यक है ये सरकार को बताया गया और इसी आधार पर फैसला दिया गया।ये केस पूरी तरह धारा 99 ए को लेकर था। और कोर्ट ने माना कि 99ए अनिवार्य है।
सुप्रीम कोर्ट जजमेंट के कुछ अंश (ललई बौद्ध सच्ची रामायण केस)
जिस सुप्रीम कोर्ट जजमेंट का हवाला देकर यह प्रचारित किया जाता है कि सुप्रीम कोर्ट ने सच्ची रामायण को सच माना और उससे प्रतिबंध हटाया। उसी जजमेंट में मनु और उनके लेखन को महान कहा गया है और उनका विरोध करने वालों को कट्टरपंथी कहा गया। उसी जजमेंट में ये भी कहा गया की सुप्रीम को सच्ची रामायण पुस्तक पर कोई राय नहीं रखता, वो केवल 99ए की अनिवार्यता देख रहे हैं उसी जजमेंट में ये भी कहा गया कि सरकार को लगता है इस पुस्तक पर प्रतिबंध रहे तो वो धारा 99 को पूरा करे।

राममंदिर जजमेंट में सुप्रीम कोर्ट द्वारा रामायण को प्रमाण के रूप में माना गया
जो यह कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने रामायण को काल्पनिक कहा वो सफ़ेद झूठ बोलते हैं।भारत के किसी कोर्ट ने रामायण को काल्पनिक नहीं कहा बल्कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा राम मंदिर जजमेंट में रामायण का उल्लेख किया गया सुप्रीम ने रामायण को एतिहासिक प्रमाण माना और अपने जजमेंट में रामायण को प्रमाण के रूप में उल्लेखित किया।
सुप्रीम कोर्ट ने रामजन्म भूमि केस के फाइनल जजमेंट में हिंदू धर्म ग्रंथों को प्रमाण मानते हुए उनका संदर्भ लिखा। जजमेंट के 40 पाइंट में वाल्मीकि रामायण उल्लेखित है।

सच्ची रामायण चाभी व आर्यों का नैतिक पोल प्रकाश पुस्तक पर ललई बौद्ध हाई कोर्ट में केस हार गए
ललाई बौद्ध ने दो अन्य पुस्तक लिखी सच्ची रामायण की चाभी और आर्यों का नैतिक पोल प्रकाश, इन दोनों पुस्तक को उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रतिबंधित किया, इस बार सरकार ने 99ए की शर्तों को पूरा किया।
ललई बौद्ध इस बार उत्तर प्रदेश सरकार के खिलाफ हाई कोर्ट गए जहां वो केस हार गए और 200 रूपए का जुर्माना भी लगा।आपको इस केस जजमेंट का कुछ अंश दिखाते हैं।


उपसंहार
आज हमने तथ्यों के साथ बताया कि भारत के किसी भी कोर्ट ने वाल्मीकि रामायण को काल्पनिक नहीं माना।सच्ची रामायण को भारत के किसी कोर्ट ने सच नहीं कहा और न कभी कोई समर्थन किया।
ललई बौद्ध दो अन्य पुस्तकों पर केस हार गए थें।
अतः आप सभी सच्ची रामायण के नाम पर चलने वाले प्रोपोगेंडा को एक्पोज करते रहे और यह लेख ज्यादा से ज्यादा शेयर करे।



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