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भारत में कास्ट सिस्टम की उत्पत्ति

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आइबेरिया

आइबेरिया पेनसुला  समय कई देशों का एक समूह था।दो देश प्रमुख थे,स्पेन और पुर्तगाल।दो भाषा ही यहां प्रमुख थे,स्पेनिश और पुर्तगाली।आइबेरिया में कैथोलिक ईसाईयो का शासन था।शासन में भी स्पेनिश प्रमुख थे।

कास्ट शब्द की उत्पत्ति

कास्ट शब्द भारतीय शब्द नहीं है।यह एक पुर्तगाली भाषा का शब्द है जो आइबेरिया पेनसुला की सभ्यता से निकला। कास्ट शब्द कास्टा से आया जिसका अर्थ लीनेज,रेस होता है। लीनेज और रेस सदैव जन्म आधारित ही होता है।

कोलंबस और वास्को डी गामा

कोलंबस और वास्को डी गामा दोनों को आइबेरिया के कैथोलिक शासन द्वारा समुद्री  यात्रा में भेजा गया।इन यात्राओं का उद्देश्य कैथोलिक ईसाई धर्म का प्रचार, संसाधन खोजना, ग़ुलाम बनाना था। कोलंबस 1492 में अमेरिका पहुंचे और उसे न्यू वर्ल्ड कहा।जबकि 1498 में वास्को डी गामा भारत पहुंचा। ये दोनों अपने साथ अपनी आइबेरियन समाजिक व्यवस्था
भी लिए, इस सामाजिक व्यवस्था को ये कास्ट सिस्टम या कास्टा सिस्टम बोलते थे।

द कास्टा सिस्टम

कास्टा सिस्टम एक पिरामिड समाजिक व्यवस्था थी, जो पूर्ण रूप से जन्म आधारित थी।यह कास्टा सिस्टम आइबेरिया के कैथोलिक सम्राज्य ने बताया था और इसे समाजिक व्यवस्था के रूप में लागू किया कोलंबस जब अमरीका पहुंचा तो नेटिव अमेरिकन समाज पर कास्टा सिस्टम लागू किया गया और नेटिव अमेरिकन को गुलाम बनाए गए।भारत में भी वास्को डी गामा कैथोलिक ईसाई धर्म का प्रचार किया और अपने साथ आइबेरियन समाजिक व्यवस्था का प्रभाव भी लाया।वास्को डी गामा 1498 में भारत आए और इसके 12 वर्षों के भीतर पुर्तगालियों ने गोवा पर कब्ज़ा जमा लिया।फिर गोवा में एक लंबा कैथोलिक शासन रहा।1510 से शुरू हुआ पुर्तगाली शासन गोवा के लोगों को 451 सालों तक झेलना पड़ा। 1961 में 19 दिसंबर को उन्हें आज़ादी मिली यानी भारत के आज़ाद होने के करीब साढ़े 14 साल बाद
इस प्रकार यूरोप और भारतीय प्रायद्वीप में कास्ट या कास्टा सिस्टम आइबेरिया सम्राज्य में अर्थात स्पेनिश और पुर्तगाली की देन है।

पिरामिड कास्टा सिस्टम

आप यहां जन्म आधारित आइबेरियन (स्पेनिश) कास्टा सिस्टम को देख सकतेहैं।यह एक पिरामिड समाजिक व्यवस्था हैजिसमे जन्म के आधार पर ही एक वर्ग को श्रेष्ठ मानकर पिरामिड में उपर स्थान दिया
गया और फिर जन्म के आधार पर अन्य वर्गो को नीचे स्थान दिया गया समाज में पिरामिड के आधार के अनुसार ही समुदायो का स्थान था।

पिरामिड कास्टा सिस्टम में नीचे पायदान में रहने वाले समुदाय,गुलामी और मजदूरी के लिए थे,उन्हें कोई भी अधिकार प्राप्त नहीं था। हम आपको स्पेनिश कास्टा सिस्टम में निचले समुदाय की स्थिति कुछ फोटो द्वारा दिखा रहे हैं,जो गुलाम या बंधुआ मजदूर थे।

कास्टा सिस्टम के निचले समुदाय के लोग

रोमन सम्राट की पिरामिड समाजिक व्यवस्था

रोमन साम्राज्य की समाजिक व्यवस्था पिरामिड और जन्म आधारित थी। निचले पायदान के लोग गुलाम, बंधुआ मजदूर थे और स्त्री को कोई अधिकार नहीं था स्त्री को नागरिक तक नहीं माना गया।

ब्रिटिश पिरामिड समाजिक व्यवस्था

ब्रिटिश पिरामिड समाजिक व्यवस्था जन्म आधारित थी इसमें निचले पायदान के लोग अधिकार विहिन थे और गुलाम , कृषिदास, दास, बंधुआ मजदूर थे।

ब्रिटिश पिरामिड समाजिक व्यवस्था
ब्रिटिश पिरामिड समाजिक व्यवस्था

ग्रीक पिरामिड समाजिक व्यवस्था

ग्रीक पिरामिड समाजिक व्यवस्था

अभी तक का निष्कर्ष

इस सब से यह स्पष्ट होता है कि कास्ट शब्द पुर्तगाली है यह कोई भारतीय शब्द नहीं कास्टा सिस्टम आइबेरिया पेनसुला (अब का स्पेन और पुर्तगाल) की एक पिरामिड समाजिक व्यवस्था है जिसका प्रसार यूरोप, अफ्रीका, भारतीय प्रायद्वीप में किया गया
रोमन साम्राज्य और ब्रिटेन ग्रीक में भी समाजिक व्यवस्था पिरामिड है।


इससे स्पष्ट है कि जन्म आधारित पिरामिड समाजिक व्यवस्था यूरोप की ही सबसे प्रभावी समाजिक व्यवस्था है,इस व्यवस्था में स्त्री और निचले पायदान के लोगों को कोई अधिकार नहीं थे।जब यूरोप के लोग दूनिया के अन्य जगह गए तो अपने साथ ये पिरामिड समाजिक व्यवस्था भी ले गए।भारत में भी जब ये आए तो भारतीय समाज को भी पिरामिड समाजिक व्यवस्था में ही ढालना चाहा। कास्ट सिस्टम इसका एक अच्छा उदाहरण है।

पहली बार भारत में कास्ट सिस्टम

सबसे पहले पुर्तगालियों के गोवा पर कब्जा करने के बाद 15 वी शताब्दी में गोवा में कास्ट सिस्टम शुरू किया।पुर्तगाली और भारतीय संकर संतानों को लूसो इंडियन कहा।तथा मूल इंडियन को चार कास्ट में बाटा
बमोन, इसे बाम्हण वर्ण, सोने के व्यापारी और  बड़े व्यापारी को रखा गया चारडोस, क्षत्रिय वर्ण और छोटे व्यापारी को रखा गया गाऊडोस, छोटे कामगारों को रखा गया जो छोटे व्यावसाय करते थे।सुदिर, इसमें शुद्र वर्ण को सुदिर कास्ट कहा गया, मजदूरी,नौकर, आदिवासी आदि को इसमें रखा गया।

पुर्तगाली द्वारा गोवा में बनाई गई पिरामिड समाजिक व्यवस्था

गोवा में धर्मांतरण और सरनेम

गोवा में ईसाई धर्मांतरण का विषय बड़ा है इस विषय पर अलग से स्ट्रीम करेंगे
पर यहां हम यह बताना चाहते हैं पुर्तगालियों ने भारतीय समाजिक व्यवस्था को पिरामिड का रूप दिया और समाज में तनाव और अलगाव , भेदभाव उत्पन्न किया।इसका फायदा धर्मांतरण के लिए किया गया

जबरन धर्मांतरण के लिए मुहिम चलाया गया
कास्ट सिस्टम में लोगों को बांटकर उन्हें ईसाई बनाकर अपने पुर्तगाली सरनेम दिए गए।प्रमुख सरनेम जो धर्मांतरण करने वाले भारतीय ईसाई को दिए गए वो इस प्रकार है,पिंटो,लोबो,फर्नाडीज,डी सूजा ।इन सरनेम देखें का मकसद यह था कि इनकी आगे की पीढ़ी खुद के पूर्वजों को पुर्तगालीयो को माने और पुर्तगाली शासन को मानने के लिए मानसिक रूप से गुलाम रहें।

वर्ण से कास्ट

आप देख सकते हैं कैसे पुर्तगालियों ने 15 वी शताब्दी मे सबसे पहले भारत में कास्ट शब्द का उपयोग किया और मूल भारतीयों को एक पिरामिड समाजिक व्यवस्था देने के लिए, चार कास्ट बना दिया गया, इन कास्ट में, व्यवसाय से जुड़े लोगों को एक कास्ट की पहचान दे दिया और साथ ही हिंदू ग्रंथों के वर्ण को भी कास्ट सिस्टम में डाल दिया।इस तरह पुर्तगालियों ने गोवा में वर्ण को कास्ट नाम से बनाकर कास्ट सिस्टम में डाल दिया अभी तक हमने समझा  कि कास्ट सिस्टम क्या है कैसे ये आया और भारत में सबसे पहले कास्ट शब्द  और व्यवस्था कैसे और वर्ण को कास्ट में कैसे बदल दिया गया। अब आगे कुछ अन्य महत्वपूर्ण तथ्य देखते हैं।

जाति, वर्ण, कास्ट

भारतीय समाज में पिरामिड समाजिक व्यवस्था नहीं थी।
वैदिक समाज में वर्ण व्यवस्था थी और इस वर्ण व्यवस्था में कोई भेदभाव नहीं था।सभी वर्ण को समान सम्मान एवं महत्व प्राप्त था।वैदिक वर्ण व्यवस्था कर्म आधारित था ।किसी भी हिंदू धर्म ग्रंथों में जातियों की सूची नहीं और न ऐसी सूची है कि जिसमें बताया गया हो कि कौन सी जाति किस वर्ण में है अतः स्पष्ट है कि जाति व्यवस्था हिंदू समाज का अंग नहीं था।कास्ट शब्द भारतीय नहीं और न किसी हिंदू ग्रंथ में है अतः कास्ट का भारत के समाज से कुछ लेना देना नहीं भारतीय समाज में वर्ण कुल वंश  गौत्र की परंपरा  मिलती है पर इसमें कोई जाति की अवधारणा नहीं थी और न कोई भेदभाव।

हिंदू समाज में वर्ण व्यवस्था

पुरूष सूक्त जो ऋग्वेद के 10वें मंडल का 90वां सूक्त है, इसमें संपूर्ण ब्रह्मांड को पुरुष का शरीर की उपमा देकर तथा समस्त सृष्टि को उससे उत्पन्न बताया गया है।इसी पुरूष से चार वर्णों को उत्पन्न बताया गया अर्थात् चारों वर्ण एक ही शरीर से उत्पन्न है। और जैसे शरीर का हर अंग महत्वपूर्ण है और बराबर वैसे वर्ण हैं। अतः यहां स्पष्ट है कि चारों वर्ण महत्वपूर्ण और सम्मानीय है।वेदों में प्रमाण मिलते हैं कि वर्ण जन्म आधारित नहीं थी बल्कि गुण और कर्म के आधार पर थी। ऐसे प्रमाण है वेदों में जहां एक ही परिवार के अलग-अलग व्यक्तियों के अलग-अलग वर्ण हो सकते हैं और उन व्यक्तियों के पास वर्ण चुनने का विकल्प होता है, ऋग्वेदसे हम यहां कुछ प्रमाण दे रहे हैं।

“मैं भजनों का पाठ करने वाला हूँ, मेरे पिता वैद्य हैं, मेरी माँ अनाज पीसती है। हम विभिन्न कार्यों के माध्यम से धन प्राप्त करना चाहते हैं” – ऋग्वेद 9.112.3

“ हे इन्द्र, सोमप्रिय, क्या आप मुझे लोगों का रक्षक बनाएंगे, या आप मुझे एक शासक बनाएंगे, या आप मुझे सोम का सेवन करने वाला एक ऋषि बनाएंगे, या आप मुझे अनंत धन प्रदान करेंगे? “ – ऋग्वेद ३.४४.५

वर्ण का अर्थ ( रिफेरेंस-निरुक्तशास्त्रम् ,2-3)

वर्ण शब्द “वृञ” धातु से बनता है जिसका मतलब है चयन या वरण करना है, वर्ण का तात्पर्य  में बताया गया है।

रिफेरेंस-निरुक्तशास्त्रम् ,2-3

मनुस्मृति में वर्ण विधान

उत्तममनुत्तमनेव गच्छन हिनान्स्तु वर्जयन् |
ब्राह्मणः श्रेष्ठतामेति प्रत्ययेन शूद्रताम् || 245 ||

श्रेष्ठ प्रकार के लोगों का आश्रय लेकर तथा निकृष्ट प्रकार के लोगों से दूर रहकर ब्राह्मण श्रेष्ठता प्राप्त करता है; इसके विपरीत विधि से वह शूद्र बन जाता है। – मनु 4.245

शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम् । क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च ॥
मनुस्मृति १०।६५
ब्राह्मण शूद्र बन सकता और शूद्र ब्राह्मण हो सकता है। इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य भी अपने वर्ण बदल सकते हैं।
अत मनुस्मृति में भी जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था नहीं है। और न कोई जाति व्यवस्था है।

हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था

गीता   में भी वर्ण को जाति आधारित नहीं बताया गया। बल्कि गुण और कर्म के आधार पर बताया गया, यहां हम गीता का रिफेरेंस बता रहे हैं –

गुण और कर्म के भेद से चारों वर्णों की रचना मेरे द्वारा की गई है, यद्यपि मैं इनका रचयिता हूँ, तथापि तू अकर्ता होने के कारण मुझे ही अपरिवर्तनशील जान।” – भगवद्गीता 4.13


अत स्पष्ट है कि हिंदू धर्म गंथो में वर्ण व्यवस्था थी जिसमें कोई भी भेदभाव नहीं है।
हिंदू ग्रंथों में कोई जाति व्यवस्था भी नहीं मिलती , ऐसा कहीं भी सूची या उल्लेख नहीं मिलता जहां बताया गया हो कि कौन सी जाति किस वर्ण में होगी।
हिंदू धर्म ग्रंथों में जाति का तात्पर्य अलग है जिसे हम आगे समझेंगे।

वैदिक वर्ण पर डॉ अम्बेडकर के विचार

डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने लिखा है-

इस तथ्य पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए कि यह (वर्ण व्यवस्था) मूलतः एक वर्ग व्यवस्था थी, जिसमें व्यक्ति, योग्यता होने पर, अपना वर्ग बदल सकता था, और इसलिए वर्ग अपने कर्मियों को बदलते थे। (राइटिंग्स एंड स्पीचेस, खंड 1, पृ.18)

मैं आपको एक बात बताना चाहता हूँ कि जातिविधान मनु ने नही बनाया है, और वह इसे बना भी नही सकता था!”
रिफरेंस – भारत में जातियां लेखक डॉ अम्बेडकर सम्यक प्रकाशन पेज नंबर 24

ब्राह्मण अनेक गलतियाँ करने के दोषी रहे होंगे, और उन्होने ऐसा किया भी होगा, लेकिन जातिव्यवस्था बनाकर उसे गैर-ब्राह्मणों पर लाद देने की उनमे क्षमता नही थी”
रिफरेंस – भारत में जातियां लेखक डॉ अम्बेडकर सम्यक प्रकाशन पेज नंबर 25

अतः बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर मानते थे कि वर्ण व्यवस्था जन्म आधारित नहीं थी। वर्ण योग्यता के अनुसार बदले जा सकते थे।जाति विधान मनु या बाम्हणो ने नहीं बनाई।

बाबा साहेब मानते थे कि वेदो में शूद्र और स्त्री को उपनयन, शिक्षा,यज्ञ आदि सभी अधिकार प्राप्त थे। मनुस्मृति महिलाओ को संपत्ति का अधिकार देता है
इस पर हमने डिटेल स्ट्रीम की है,आप वो देख सकते है।साथ ही बाबा साहेब ने किस मनुस्मृति को जलाया इस पर भी हमारी डिटेल स्ट्रीम है उसे भी आप देख सकते है।

हिंदू धर्म ग्रंथों में जाति शब्द का उल्लेख और अर्थ

न्यायसूत्र में जाति की परिभाषा बताई गई है,
समानप्रसवात्मिका जातिः ।।(2,2,71)

अर्थात:- जिनके जन्म का मूल स्त्रोत एक होता है, अर्थात जिनका जन्म लेने का तरीका एक समान है,
एक प्रकार की जाति कहा जाता है।इससे स्पष्ट है कि सभी मनुष्य की एक जाति है,और वो है मनुष्य जाति। अर्थात हिंदू धर्म ग्रंथों में जाति कि जो परिभाषा दी है उसमें  कोई भेदभाव नहीं है।

अब समझते हैं कि वर्ण, व्यवसाय जाति कैसे बन गए, और जाति कैसे कास्ट बन गया

आपने अभी तक देखा कि हिंदू समाज और हिंदू ग्रंथो में वर्ण व्यवस्था रही जिसमें कोई भेदभाव नहीं था। साथ ही कुल गोत्र वंश की भी परंपरा रही इनमें भी भेदभाव नहीं था और ये न जाति थी और न कास्ट।
इसी प्रकार हिंदू दर्शन में भी जाति को परिभाषित किया गया और इससे स्पष्ट हो गया की सभी मनुष्यों की एक ही जाति है।यहां भी कोई भेदभाव नहीं।

अब सवाल उठता है कि फिर कैसे हिंदू समाज में कास्ट सिस्टम जिसका हिन्दी अनुवाद के तौर पर जातिवाद कहते हैं, आ गया। और कैसे इस आधार पर भेदभाव शुरू हुआ और कैसे वर्ण कुल गोत्र वंश व्यवसाय आदि सभी जाति या कास्ट बन गए
इस सब सवालो के जबाब आगे देखेंगे।

वैदिक समाज के बाद

वैदिक समाज जब तक था तक कोई समस्या नहीं थी। क्योंकि समाज को चलाने के लिए समानांतर व्यवस्था थी। सभी का सम्मान था।परंतु कुछ समय बाद वेद और वैदिक समाज का विरोध कुछ ऐक लोगों ने शुरू कि जिनकी मंशा खुद के पंथ बनाने की थी। ऐसे लोग वेद का विरोध तो किए पर अपना कोई समाजिक व्यवस्था नहीं दे सके। ऐसी स्थिति में समाज में भ्रम उत्पन्न हुआ और समाज में विकार आना प्रारंभ हुआ।

बौद्ध मत और समाज

जब बौद्ध मत आया तो वेद का विरोध किया गया
साथ ही बौद्ध ग्रंथों में वर्ण उत्पत्ति को पुनः बताया गया
बौदध ग्रंथों में वर्ण को जन्म आधारित कर दिया गया और क्षत्रिय वर्ण को सबसे श्रेष्ठ घोषित किया गया।
शूद्र एवं स्त्री के अधिकार सीमित किए गए एवं निंदा कि गई अंतरविवाह के खिलाफ भी बौद्ध ग्रंथों में लिखा गया बौद्ध ग्रंथों  में जन्म आधारित श्रेष्ठ था को बढ़ावा दिया गया बौद्ध ग्रंथों में क ई समुदाय को नीच कहा गया पहली बार व्यवसाय से जुड़े लोगों को एक समुदाय के रूप में पहचान कि गई और उन्हें नकारात्मक रूप में बताया गया।इन सब से वैदिक समाज में असर पड़ा, और वर्ण व्यवसाय और स्त्री तो के साथ भेदभाव प्रारंभ हो गया। आगे चलकर भेद भाव और भी जटिल हो गया।

बौद्ध ग्रंथों में जाति का रिफेरेंस
बौद्ध ग्रंथों में जाति का रिफेरेंस
बौद्ध ग्रंथों में जाति का रिफेरेंस
बौद्ध ग्रंथों में जाति का रिफेरेंस
बौद्ध ग्रंथों में जाति का रिफेरेंस
बौद्ध ग्रंथों में जाति का रिफेरेंस

बाबा साहेब ने अपनी पाली शब्दकोष में जाति का अर्थ caste यहां कास्ट का तात्पर्य नश्ल से है इसलिए बाबा साहेब ने जाति के लिए अंग्रेजी में कास्ट बताया है

डॉ अम्बेडकर की पाली डिक्शनरी
डॉ अम्बेडकर की पाली डिक्शनरी

भक्ति काल

बौद्ध मत के  प्रचार और बौद्ध राजाओं के कारण बौद्ध ग्रंथों कि शिक्षा का प्रभाव समाज में बहुत ज्यादा दिखाई पड़ रहा है। बौद्ध ग्रंथों की शिक्षा के कारण समाज में  जन्म के आधार पर भेदभाव , छुआछूत,उच नीच, एवं स्त्री के सीमित अधिकार थे।
जब बौद्ध राजाओं का शासन खत्म हुआ और बौद्ध ग्रंथों का प्रभाव बहुत कम रह गया।तब बहुत से हिन्दू संत भारत  के अलग-अलग जगहों में हुए जिन्होंने भेद भाव ऊंच नीच का विरोध किया और रचनाएं लिखीजैसेकबीर,रविदास,नंदनार,नामदेव,चोखामेला,संत सेन,तुकाराम, चैतन्य महाप्रभु आदि वापस से समता मूलक समाज बनाने के लिए हिंदू संतों ने जोर दिया क्योंकि वैदिक समाज समता मूलक था ।

डॉ. अंबेडकर ने स्वयं अपनी पुस्तक ‘अछूतों’ पर निम्नलिखित समर्पण किया है-नंदनार, रविदास, चोकामेला की स्मृति में अंकित : तीन प्रसिद्ध संत जो अछूतों के बीच पैदा हुए और जिन्होंने अपनी धर्मपरायणता और सदाचार से सभी का सम्मान जीता। इससे स्पष्ट है हिंदू समाज में संतो
का पूरा सम्मान था, बिना संतों की वर्ण कुल देखें‌।

रिफेरेंस – अनटचेबल्स,लेखक डॉ अम्बेडकर,सन 1948

मुस्लिम शासन का हिंदू समाज पर प्रभाव

मुस्लिम अक्रान्ता जब भारत आए तो उन्होंने भारतीय समाज को बहुत नुकसान पहुंचाया, मंदिर तोड़े , धर्मांतरण जबरन करवाया, संपत्ति लूटी, जजिया कर लिया आदि बहुत से प्रकार से हिंदू समाज को प्रताड़ित किया , पर यह अलग विषय है, हम यहां अपने विषय कर केवल बात करेंगे इस्लामिक समाजिक व्यवस्था भी पिरामिड व्यवस्था थी। इसमें समाज के वर्ग पदानुक्रम में थे। अतः जब मुस्लिम शासन भारत में आया तो उन्होंने भी भारतीय समाज को पिरामिड व्यवस्था देने में कोई कसर नहीं छोड़ी मुस्लिम शासन में सुधार वादी भक्ति आंदोलन को कमजोर कर दिया गया और वापस हिन्दू समाज में मुस्लिम शासन के कारण कई तरह के विकार आ गए।

इस्लामिक समाजिक व्यवस्था
इस्लामिक समाजिक व्यवस्था
इस्लामिक समाजिक व्यवस्था

मुस्लिम शासन काल और हिंदू समाज

इस्लामिक शासन आने से दास, गुलाम, बंधुआ मजदूरी आदि आ गई। हिंदूओ को गुलाम व दास व जजिया लगाया गया जिससे उनकी समाजिक रूप से नीचे पायदान में चलें है। हरम में महिलाओं को जबरन रखा गया समाज को उच्च मध्यम नीच में बटा गया। जिससे मछुआछूत, और अछूत जैसे धारणा समाज में प्रसारित हुई।

शिल्पकार और कारीगरों को गुलाम बनाकर बेचा और रखा गया जिससे, गंदगी ढोने व साफ सफाई के कार्य कराए गए।

आइन-ए अकबरी में हिंदू धर्म के अपने विवरण में, अबुल फ़ज़ल ने जाति पदानुक्रम की शास्त्रीय अवधारणाओं को पुनः प्रस्तुत किया है। यहाँ हम चार वर्षों, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, । चित्रकार, सुनार, लोहार और बढ़ई को स्पष्ट रूप से शूद्रों में वर्गीकृत किया गया है।

अबुल-फ़ज़ल ने विभिन्न बहिष्कृत समुदायों की उत्पत्ति को भी बताया।
अबु फजल यूनानियों का हवाला देते हुए, व्यवसायों को तीन प्रकारों में वर्गीकृत किया था, कुलीन, नीच और मध्यम ।

नीच पेशे वे हैं जो
(1) लोगों के हित के खिलाफ हैं
(2) तमाशा
(3) घृणित हैं पेशा जैसे कि नाई, चर्मकार और सफाईकर्मी के पेशे।

हिंदुओं को बड़ी संख्या में विभिन्न तरीकों से मध्य एशियाई दास बाजार में ले जाया जाता था। जैसा कि विभिन्न वाणिज्यिक अभिलेखों में पाया गया है, कई दासों को कारवां व्यापारियों द्वारा ले जाया जाता था, जो उन्हें सीधे दास के रूप में खरीदते थे या उन्हें अन्य वस्तुओं (जैसे घोड़ों) के बदले में प्राप्त करते थे। जैसा कि एक पुर्तगाली जेसुइट मिशनरी फादर एंटोनियो मोनसेरेट (1581) द्वारा प्रलेखित किया गया है, पंजाबी जनजाति घक्कर अक्सर मध्य एशियाई घोड़ों के बदले हिंदू दासों का आदान-प्रदान करते थे, जिससे यह कहावत बन गई, “भारत से दास और पार्थिया से घोड़े”।

मेगस्थनीज जैसे विदेशी, पश्चिमी देशों में दासों के भाग्य से अवगत थे, वे भारत में किसी भी दास को देखने में विफल रहे और घोषणा की कि सभी भारतीय स्वतंत्र थे ( मेगस्थनीज की इंडिका, ओम प्रकाश द्वारा उद्धृत, “प्राचीन भारत में धर्म और समाज,” 1985, पृष्ठ 140)।

मध्यकालीन और आधुनिक मध्य एशिया में हिंदू दासों की मौजूदगी को नजरअंदाज किया गया है और भारतीय इतिहास के क्षेत्र में इस पर बहुत कम ध्यान दिया गया है। उदाहरण के लिए- बुखारन वक्फनामा (1326) में हिंदू दासों की मौजूदगी को कई बार सूचीबद्ध किया गया था, जबकि शेख ख्वाजा अहरार के अभिलेखागार से एक और समान दस्तावेज (1489) में हिंदू दासों के कारीगरों के रूप में काम करने और खेतों में मजदूरी करने की बात कही गई है। तुर्किक चरवाहे समूहों में हिंदू दासों का भी उल्लेख है, जो उज्बेक शासक शिबानी खान की तनिश सुल्तान पर युद्ध की जीत के ऐतिहासिक अभिलेखों में दर्ज है।

दुर्लभ मामलों में कुशल हिंदू, कारीगरों को अक्सर भारत में मुस्लिम शासकों द्वारा उपहार (दास) के रूप में मध्य एशिया भेजा जाता था। उदाहरण के लिए, बदर अल-दीन कश्मीरी ने दस्तावेज में लिखा है कि अकबर ने बुखारन शासक अब्द अल्लाह खान द्वितीय को चार हिंदू राजमिस्त्री दास के रूप में उपहार में दिए थे। शाहजहाँ ने कथित तौर पर अष्टरखानिद शासकों इमाम कुली खान और नादिर मुहम्मद को 100 हिंदू दास भी भेजे थे। अक्सर मध्य एशिया के रास्ते में हिंदू यात्रियों और व्यापारियों का अपहरण कर लिया जाता था और उन्हें जबरन दास के रूप में बेच दिया जाता था, और ऐसे सैकड़ों हिंदू परिवारों के बंधुआ मजदूरी करने के ऐतिहासिक विवरण हैं (एस. गोपाल, सेंट्रल एशिया में भारतीय 16 वीं और 17 वीं शताब्दी, भारतीय इतिहास कांग्रेस की कार्यवाही, पृष्ठ 17-18)। बाबर ने भी ऐसे हिंदू दासों के बारे में बताया है। उसने अपने अभिलेखों में उल्लेख किया है कि उसने अफगानिस्तान में 200-300 हिंदू परिवारों को दास के रूप में रहने के लिए मजबूर किया था, जो पक्षियों को पकड़ने के काम को अपनी आजीविका के रूप में करते थे (बाबरनामाः बाबर के संस्मरण, एनेट बेवरिज द्वारा अनुवादित, पृष्ठ 225)।

मुस्लिम बहुल समाज में आज भी हिंदू के लिए छुआछूत भेदभाव देख सकते है ,वो हिंदू को अछूत मानते हैं,ऐसे बहुत से उदाहरण है।

अंग्रेज़ो की सोच

अंग्रेज जब भारत आए तो अपने यहां की संस्कृति लिए जैसे ब्रिटेन में गुलाम दास बंधुआ मजदूर विच हंटिंग आदि प्रथा थी और समाज को उन्होंने उच्च और निम्न नश्ल में बाट रखा था, तो अंग्रेजो ने भारतीय समाज को भी यूरोप की तरह भारत में भी वैसी व्यवस्था चाही। आप यहां दो फोटो से अंग्रेजो की मानसिकता समझ सकते हैं ।

ब्रिटिशर और कास्ट सिस्टम

अंग्रेज़ो ने भारत के हिंदू समाज को खंडित करने और भारतीय हिंदू समाज को पिरामिड समाजिक व्यवस्था देने का सबसे सक्रिय प्रयास किया और सफलता भी हासिल की। भारतीय समाज को तोडने के पीछे फूट करो राज की नीति थी।
चूकि अंग्रेजों जहां से आए थे वहां जन्म आधारित पिरामिड समाजिक व्यवस्था थी , भेदभाव, गुलाम, दास आदि प्रथा थी वहीं सब वे भारत में करना चाहते थे।वर्ण गौत्र कुल व्यावसाय को कास्ट में सूचीबद्ध किया और कास्ट का हिंदी अनुवाद जाति किया
कास्ट सिस्टम लागू करने के लिए जनगणना करवाया और ये सब का डाक्यूमेंटेशन किया।
कास्ट सिस्टम अर्थात जाति व्यवस्था को प्रशासनिक शब्दावली में शामिल किया।
इस प्रकार भारत में वर्ण, गौत्र,वंश, व्यवसाय सब कास्ट अधिकारिक रूप में बन गई और इसी कास्ट सिस्टम का हिंदी अनुवाद जाति व्यवस्था अधिकारिक रूप में किया।

अंग्रेज़ो द्वारा हिंदू समाज कानूनी तौर से  कास्ट सिस्टम बनाने और उनका डाक्यूमेंटेशन करने के प्रयास

यहां हम टेबल पर अंग्रेजो द्वारा हिंदू समाज में कास्ट सिस्टम बनाने के लिए अंग्रेजों द्वारा कराए संस्सेस देख सकते हैं ।

कास्ट सिस्टम बनाने में रिस्ले का योगदान

Sir Herbert Hope Risley जो एक ब्रिटिश प्रशासनिक अधिकारी थे उन्होंने यूरोपीय समाज की तरह भारत में पिरामिड समाजिक व्यवस्था के लिए कास्ट सिस्टम बनाने के लिए कार्य प्रारंभ किया
1885 में रिस्ले ने भारत में एथनोग्राफी सर्वे प्रारंभ किया, इस सर्वे में नाक के आधार पर भारतीयो को कास्ट में बाटा गया।1891 रिस्ले ने अपनी सर्वे की रिपोर्ट the  Study of Ethnology in India पेपर में पब्लिश किया।रिस्ले नाक कि लंबाई और चौड़ाई के अनुपात के आधार भारतीय की कास्ट बताया। इस विधि को नेजल इंडेक्स थ्योरी कहा।
छोटी,चपटी नाक वाले छोटी कास्ट और बड़ी ऊंची नाक वाले बड़े कास्ट का बताया।

रिस्ले का नेजल इंडेक्स और वेद

रिस्ले ने अपने अध्ययन को रिगवेद से जोड़ा और बताया कि रिगवेद में छोटी व चपटी नाक वालो को निम्न कहा गया और उन्हें मारने को कहा गया।
रिस्ले ने रिगवेद के  , 5,29,10 का रिफेरेंस लिया
इस रिफेरेंस में अनासो शब्द को रिस्ले ने नाक के आकार से जोड़ दिया, और अर्थ किया कि छोटी चपटी नाक वालो को दुष्ट चोर नीच और दंडित करने को कहा गया है।

रिस्ले ने बताया कि रिगवेद से कास्ट आई है।नाक  के आधार पर बहुत सी कास्ट बने।छोटी चपटी नाक वाले को रिगवेद मे निम्न और ऊंची बड़े नाकवाले को उच्च कास्ट माना गया हिंदू समाज को तोडते का सबसे सफल प्रयास था गोवा में 15 वी शताब्दी मे कास्ट सिस्टम लाने के बाद , पूरे भारत में प्रशासनिक सर्वे के अनुसार अंग्रेजो ने भारत में कास्ट सिस्टम प्रारंभ किया।

सही अर्थ

डॉ अम्बेडकर द्वारा रिस्ले की नेजल इंडेक्स थ्योरी रिजेक्ट किया गया



“निम्न जातियां भी वास्तव में आर्य हैं। द्रविड़ लोगों में भी ब्राह्मण और अन्य सभी वर्ण होते हैं। नाक के आधार पर लोगों का नस्लीय विभाजन झूठ के आधार पर गढ़ा गया।ब्राह्मण और अछूत एक ही नश्ल के हैं। इससे  यह निष्कर्ष निकलता है कि यदि ब्राह्मण आर्य हैं तो अछूत भी आर्य हैं। यदि ब्राह्मण द्रविड़ हैं तो अछूत भी द्रविड़ हैं। यदि ब्राह्मण नागा हैं तो अछूत भी नागा हैं। ऐसे तथ्य होने पर, श्री रिशले द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत को झूठ के आधार पर आधारित कहा जाना चाहिए।”

रिफेरेंस- डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण वाड्मय अंग्रेजी खंड 7 पेज नंबर 302,303

अंग्रेजी शासन में कास्ट और फिर जाति और उनका प्रशासनिक दस्तावेजीकरण

रिस्ले ने 1901 जनगणना किया, इस जनगणना
मे कास्ट शब्द का प्रयोग किया गया। और भारतीय
समुदायो को 2378 मुख्य कास्ट में बाटा गया
और इनकी हैरारकी बनाई गई।इस प्रकार पहली बार भारतीय हिंदू समाज मे कास्ट सिस्टम थोपा गया और पदानुक्रम भी थोपा गया, ये अधिकारिक रूप में हुआ
और डाक्यूमेंटेशन किया गया।ये वहीं पिरामिड समाजिक व्यवस्था थी जो यूरोप में कास्ट सिस्टम से प्रचलित थी जिसे अब भारत में कानून लागू कर दिया गया।

British caste census 1931

इस जनगणना  में ट्राइबल को कास्ट नहीं  माना गया और एक अलग कैगटैगरी ट्राइबल बना दी गई।
जे एच हटन ने इस जनगणना में पहली बार ट्राइबल को हिन्दू मानने से इंकार कर दिया, और कहा ट्राइबल कास्ट नहीं हो सके इस जनगणना में जाति की कुल संख्या  4147 हो गई।जबकि रिस्ले की 1901 वाली जनगणना में जाति की संख्या 1646 थी।यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि कास्ट का हिंदी अनुवाद जाति अंग्रेजों ने ही किया।
रिफेरेस-Census and caste
enumeration: British legacy
and contemporary practice in India
RAM B. BHAGAT

कास्ट कैटेगराइजेशन

ब्रिटिशर ने सर्वे एवं सेंसस कराकर कास्ट बनाने के बाद उनको कैटेगरी में बाटा कैटेगरी को पिरामिड व्यवस्था में रखा , कुछ कैटेगरी ऊंचे पायदान में थी कुछ मध्य तो कुछ नीचे इसका मकसद हिंदू समाज को ऊंची और निम्न जाति या कास्ट में बांटना था।

1881 में census के बाद W.C. Plowden ने हिंदू समाज को पांच कैटेगरी या वर्ग में बाटा

1. बाम्हण कास्ट
2. राजपूत कास्ट
3. सोशल गुड कास्ट
4. इनफिरियर कास्ट
5. एबोरिजिनल कास्ट

1921 में डिप्रेस्ड कास्ट बनाया गया और दो कैटेगरी बनाई

1. अपर कास्ट
2. डिप्रेस्ड कास्ट

1931 में डिप्रेस्ड कास्ट को exterior cast कर
दिया गया।

1936 में डिप्रेस्ड कास्ट को शेड्यूल कास्ट कर
दिया गया और 1941 में वापस कास्ट कैटेगरी बनाई गई।

1. अपर कास्ट
2 शेड्यूल कास्ट
3 शेड्यूल ट्राइब

1931 की जाति आधारित जनगणना के संपन्न हुई। देश आजाद होने के बाद जाति आधारित आरक्षण लागू किया।SC,ST,OBC वर्ग बनाए गए।

उपसंहार

अतः स्पष्ट है कि हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था थी जो कि  जन्म आधारित नहीं थी और कास्ट या जाति प्रथा नहीं थी।जाति का अर्थ हिंदू धर्म के न्यायसूत्र में बताया गया है और उसके अनुसार सभी मनुष्य की एक ही जाति है बौद्ध मत के उदय के कारण वेद का प्रतिकार हुआ और भेदभाव, छुआछूत आदि समाज में आ गए
भक्तिकाल  में हिंदू  संतों ने समाज में समता के लिए कार्य किया परंतु मुस्लिम आक्रमणकारी और शासन के कारण हिंदू समाज और प्रताड़ित हुआ और हिंदू समाज को खंडित किया गया कास्ट सिस्टम एक आइबेरियन सिस्टम है ,जो यूरोपीय है कास्ट शब्द पुर्तगाली है 15 वी शताब्दी मे गोवा में कास्ट सिस्टम लागू किया गया और फिर अंगेजो ने इसे पूरे भारत में सर्वे एवं जनगणना के माध्यम से कानूनी रूप से लागू कर दिया , जो आज भी  लागू है इन सब में रिस्ले,हटन का योगदान सर्वाधिक है।


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