मथूरा से अनेकों प्राचीनतम हिंदू प्रतिमाऐं प्राप्त हो चुकी हैं। चाहें वो शैव हो, शाक्त हो, वैष्णव हो सबकी प्राचीनतम प्रतिमाओं को मथूरा नगर समेटे हुआ है। अनेकों मिथकों को इसने तोडा है। जहां अवतारों की प्रतिमा गुप्त काल से देखी जाती थी, वहीं मथूरा ने हयग्रीव, वराह, कृष्ण अवतार की प्रतिमाओं को कुषाणकाल में रख दिया ।
शिवलिंगों के विविध प्रकार, शिव जी की विविध प्रतिमाऐं भी गुप्तकाल से पूर्व ही मथूरा में मिल चुकी है। अभिलिखित कुषाणकाल का शिवलिंग भी मथूरा से ही मिला था। जो कि इन आकृतियों का शिव जी से सम्बन्ध स्थापित करती हैं।
इसी परम्परा में कुछ और प्रमाण देखेंगे।
वैसे तो शिव प्रतिमाओं और शिवलिंगों पर अनेकों तथ्य रखे जा चुके हैं तथापि कुछ अन्य प्रतिमाऐं और शिवलिंग हमें पुनः दृष्टिगोचर हुए हैं –




पिछले पृष्ठ पर रेखाचित्र और मूल चित्रों से आप इन आकृतियों को समझ सकते हैं।



मथूरा में शिव प्रतिमा की परम्परा केवल कुषाणकाल या शुंगकाल तक सीमित नहीं है, अभी हाल ही की खोज में ढींग, ब्रज क्षेत्र से पी जी डब्ल्यू 1000 – 600 ईसापूर्व के स्तर से दो टेराकोटा प्रतिमा प्राप्त हुई हैं।

इनमें एक पुरुषाकार प्रतिमा के साथ उर्ध्व लिंग का भी अंकन है, जिससे प्रतिमा की पहचान भगवान शिव के रुप में की गई है तथा दूसरी प्रतिमा को माता पार्वती।
इस प्रमाण की अंतरिम रिपोर्ट की भी प्रतिक्षा है किन्तु यह प्रमाण सिद्ध करता है कि मथूरा ब्रज क्षेत्र में शिव जी की प्रतिमा बनाने की परम्परा अत्यंत प्राचीन है।
इसी स्थल से मौर्य काल से लेकर 600 ईसापूर्व प्राचीन यज्ञ कुंड का भी प्रमाण मिला है, जिसमें धूली से हवन किया जाता था।

ये प्रमाण ब्रज क्षेत्र में हिन्दू धर्म की प्राचीनता बुद्ध पूर्व स्थापित करते हैं।
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