मनुष्य उत्पत्ति का सिद्धांत हर धर्म में अलग-अलग है।
ईसाई एडम-ईव सिध्दांत और इस्लाम में आदम-हौवा की परिकल्पना है।वैज्ञानिक सिध्दांत अलग है।
लेकिन हम यहां बौद्ध सिध्दांत की समीक्षा कर रहे है।
अब जैसा कि सबको पता ही है कि तमाम धर्मों मे मनुष्यों की धरती पर उत्पत्ति को लेकर अपने-अपने दावे और सिध्दांत हैं, इसी में बौद्धधर्म का भी अपना एक अलग मत अर्थात सिध्दांत है।
बौद्ध ग्रंथों में मनुष्य उत्पत्ति के क्या सिध्दांत हैं?
पाली भाषा के बौद्ध ग्रंथ त्रिपिटक (सुत्तपिटक) के दीघनिकाय के तीसरे अध्याय “पाथिकवग्ग” के चौथे सुत्त “अग्गञ्ञ” मे गौतम बुद्ध वशिष्ट को यह बताते हुए कहते हैं.
जब धरती पर प्रलयकाल समाप्त हो गया,तब मनुष्य देवलोक से पृथ्वी पर आये।
अब यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि बुद्ध कह रहे हैं कि मानव धरती के निवासी नही हैं,वे दूसरे स्थान (अर्थात ग्रह) से धरती पर आये।
गौतम बुद्ध के अनुसार शुरू मे जब प्राणी पृथ्वी पर आये तो वे केवल सत्व (प्राणी या अस्तित्व) मात्र थे. उनमे न कोई स्त्री थी और न ही कोई पुरुष था।बुद्ध के अनुसार प्राणी बिना लिंग-निर्धारण के ही धरती पर उत्पन्न हुए थे।

चावल खाने से लिंग की उत्पत्ति
बुद्ध के अनुसार कालान्तर मे धरती पर एक ऐसा धान/चावल उत्पन्न हुआ, जिसे शाम को लाओ तो सुबह, और सुबह लाओ तो शाम को बढ़कर और पककर खाने योग्य हो जाता था।
फिर प्राणियों/मनुष्यों ने उस धान (चावल) को खाना प्रारम्भ कर दिया, और उस चावल को खाने से प्राणियों मे लिंग उत्पन्न होने लगा। जिस सत्व ‘प्राणी’ को “योनि” उत्पन्न हुई, उसे स्त्री और जिसे “शिश्न” प्रकट हुआ उसे पुरुष की मान्यता मिली।
योनि और लिंग के प्रकट होने के बाद स्त्री और पुरुष के बीच संबंध होने लगा, और वे दोनो बिना असहज हुए भोग अर्थात रतिक्रीड़ा करने लगे। फिर जब दूसरे तमाम लोगों ने उन्हे निंदा करना शुरू किया तो उन्होने छुपकर-छुपकर रतिक्रीड़ा करने के लिये घर का निर्माण शुरू कर दिया।
गौतम बुद्ध ने यह भी कहा है कि जब सत्व (प्राणी) धरती पर आये तो यहाँ चारों दिशाओं में अंधेरा ही अंधेरा था, और सूर्य, चन्द्र या तारों का अस्तित्व नहीं था बहुत कालखण्ड व्यतीत हो जाने के बाद सत्वों ‘प्राणियों’ ने सूर्य और चाँद को देखा।




क्या ब्रह्माण्ड मे सूर्य का निर्माण पृथ्वी के बाद हुआ?
बुद्ध के अनुसार सत्वों ने सूर्य और चांद को बाद में देखा जबकि विज्ञान तो यह कहता है कि सूर्य से ही पृथ्वी समेत तमाम ग्रहों का निर्माण हुआ।
मनुष्य उत्पत्ति में बुद्ध का उपर्युक्त सिध्दांत बिज्ञान के अनुरूप है?
गौतम बुद्ध का यह सिध्दांत तर्क की कसौटी पर खरा नहीं उतर रहा है आखिर चावल खाने से शरीर मे योनि और लिंग का प्रादुर्भाव कैसे हो सकता है? यदि इसे सच मान लें तो बुद्ध के इस सिध्दांत के अनुरूप तो आज भी उस चावल को खाये तो शरीर मे अतिरिक्त लिंग/योनि आदि का प्रादुर्भाव होना चाहिए.अन्यथा भगवान बुद्ध के इस सिध्दांत को कोरी कल्पना या अवैज्ञानिकता की श्रेणी में रखना चाहिए.



Leave a Reply