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बौद्ध धर्म समानतावादी नहीं जातिवादी हैं ?

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आपने अक्सर नव-बौद्धों को यह कहते सुना होगा कि बौद्ध धर्म में जातियाँ नहीं हैं, लेकिन वास्तविकता इससे अलग है। आज जो पन्ना मैं आपके साथ साझा कर रहा हूँ (यह दीघ निकाय के महापदान सुत्त का अंश है), इसमें भगवान बुद्ध स्वयं अपने भिक्षुओं को अपने से पूर्व हुए 6 बुद्धों और उनकी जातियों के बारे में बता रहे हैं।  इस पाठ में बताया गया है कि अलग-अलग ‘कल्पों’ (युगों) में कौन-कौन से बुद्ध हुए:

विपस्सी बुद्ध: आज से 91 कल्प पहले।
सीखी बुद्ध: आज से 31 कल्प पहले।
वेस्सभू बुद्ध: उसी 31वें कल्प में।
ककुसन्ध बुद्ध: हमारे वर्तमान ‘भद्रकल्प’ में।
कोणागमन बुद्ध: हमारे वर्तमान कल्प में।
कस्सप (काश्यप) बुद्ध: हमारे वर्तमान कल्प में।
गौतम बुद्ध (स्वयं): जो वर्तमान समय में हैं।

इसके बाद इसी पृष्ठ पर गौतम बुद्ध से पूर्व के बुद्धों की जातियों का विवरण हैं।

क्षत्रिय कुल: विपस्सी, सीखी और वेस्सभू बुद्ध क्षत्रिय जाति के थे और उनका गोत्र ‘कौण्डिन्य’ था।

ब्राह्मण कुल: ककुसन्ध, कोणागमन और कस्सप बुद्ध ब्राह्मण जाति के थे और उनका गोत्र ‘काश्यप’ था।

वापस क्षत्रिय कुल: अंत में, गौतम बुद्ध  खुद को क्षत्रिय कुल में जन्म और और खुद का गोत्र ‘गौतम’ बताते हैं।

नव-बौद्ध प्रायः यह दावा करते हैं कि बौद्ध धर्म में जाति का अस्तित्व नहीं है और सभी जातियों का स्थान समान है। लेकिन उपलब्ध प्रमाण को देखने पर स्थिति अलग दिखाई देती है। यहां गौतम से पहले भी छह पूर्व बुद्ध हुए थे, फिर भी उनमें एक भी वैश्य या शूद्र नहीं जाति का व्यक्ति बुद्ध नहीं हुआ । इतना ही नहीं,  यहां सभी बुद्धों की जाति को जन्म के आधार पर निर्धारित किया गया है। इससे यह धारणा कि बौद्ध धर्म जाति को नहीं मानता था, तथ्यहीन प्रतीत होती है क्योंकि प्रमाण इसके विपरीत संकेत देते हैं।



ऐसे में यह कहना कि बौद्ध धर्म समानता का संदेश देकर जातिवाद का विरोध करता था, एक कपोल कल्पना है ___ जिसका उद्देश्य बौद्ध परंपरा को नैतिक रूप से श्रेष्ठ साबित करना है। जबकि वास्तविकता यह है कि बुद्धों की जाति निर्धारण की अवधारणा स्वयं जन्माधारित विभाजन को मान्यता देती है, जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि इनका  समानता और जाति-निरपेक्षता का दावा ऐतिहासिक साक्ष्यों पर आधारित नहीं है। बल्कि मिथकों और काल्पनिक मनगढ़ंत धारणाओं पर केंद्रित हैं।
प्रमाण स्पष्ट करते है कि बौद्ध धर्म जातिवादी है जहां एक भी बुद्ध वैश्य शुद्र कुल में जन्म नहीं ले सकता। और ना ही आज तक कोई हुआ !

नोट:
यदि यह जानकारी उपयोगी लगे तो इसे अवश्य साझा करें। सत्य को जानना और सत्य का प्रसार करना भारतीय नैतिक मूल्यों की मूल भावना है। आपका एक सत्य हजारों वर्षों से चली आ रही मनगढ़ंत काल्पनिक मान्यताओं  को पुनर्विचार के लिए बाध्य कर सकता है।


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