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क्या रामायण बौद्ध ग्रंथ दसरथ जातक की नकल हैं ?

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वाल्मीकि रामायण के ऐतिहासिक प्रमाण और नवबौद्धों के दावे

वर्तमान समय में कुछ नवबौद्ध यूट्यूब चैनल यह दुष्प्रचार कर रहे हैं कि रामायण और इसके प्रमुख पात्र, भगवान श्रीराम, एक काल्पनिक चरित्र हैं। साथ ही, वे दावा करते हैं कि रामायण के राम, बौद्ध जातक ग्रंथ “दशरथ जातक” में वर्णित बोधिसत्व राम पंडित से प्रेरित हैं।

हालांकि, यह तर्क ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर पूरी तरह गलत साबित होता है। बौद्ध, जैन और हिंदू साहित्य में श्रीराम का उल्लेख मिलता है, और यह स्पष्ट है कि महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण के राम ही ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित हैं। बौद्धों ने उन्हें कहीं बोधिसत्व राम के रूप में स्वीकार किया, तो जैन धर्मावलंबियों ने उन्हें तीर्थंकर बताया।

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इस लेख में हम पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर यह सिद्ध करेंगे कि भगवान श्रीराम मुख्य रूप वाल्मीकि रामायण के ऐतिहासिक नायक हैं और उनके अस्तित्व के प्रमाण बौद्ध ग्रंथों के लिखे जाने से पहले ही उपलब्ध थे।

वाल्मीकि के राम

पुरातात्विक साक्ष्य

1. प्राचीन सिक्के (100 ईसा पूर्व, महेश्वर, उज्जैन)

100 ईसा पूर्व के ये सिक्के महेश्वर, उज्जैन से प्राप्त हुए हैं।

इनमें भगवान श्रीराम, माता सीता और अनुज लक्ष्मण का स्पष्ट अंकन किया गया है।

Rama on a 100 BCE coin

संदर्भ: Numismatic Digest Volume 38 (2014), Plate No. VI, Fig. 10-11, Page No. 19

2. शुंग कालीन प्रतिमा (200 ईसा पूर्व, हरियाणा)

हरियाणा के शुग क्षेत्र से प्राप्त यह मूर्ति शुंग काल (लगभग 200 ईसा पूर्व) की है।

प्रसिद्ध विद्वान देवेंद्र हाड़ा ने इस प्रतिमा को भगवान श्रीराम की प्रतिमा के रूप में पहचाना है।

200 BCE statue of Shri Ram

संदर्भ: The Journal of Academy of Indian Numismatics and Sigillography, Vol. XXX – XXXI (2015-16), Pl. I. II, Fig. 8, Page No. 22

3. विदर्भ से प्राप्त प्राचीन सिक्का (100 ईसा पूर्व)

विदर्भ से प्राप्त इस सिक्के में भगवान श्रीराम का धनुष सहित चित्रण किया गया है।

Shri Ram on a 100 BCE coin

संदर्भ: प्राचीन सिक्कों में श्रीराम – प्रशांत कुलकर्णी

4. शुंग कालीन प्रतिमा (मथुरा)

यह प्रतिमा मथुरा से प्राप्त हुई थी और शुंग काल (लगभग 200 ईसा पूर्व) की मानी जाती है।

कुछ विद्वानों ने इसे कामदेव की प्रतिमा माना, लेकिन अन्य शुंगकालीन मूर्तियों से तुलना करने पर यह भगवान श्रीराम की प्रतिमा प्रतीत होती है।

यह प्रतिमा वर्तमान में इलाहाबाद संग्रहालय में संरक्षित है।

200 BCE statue of Lord Rama with bow and arrow

संदर्भ: Terracotta Art Allahabad Museum, Fig. 298

बौद्ध ग्रंथों की ऐतिहासिकता

अब यह देखना महत्वपूर्ण है कि बौद्ध साहित्य कब लिखा गया। त्रिपिटक, जो प्रमुख बौद्ध ग्रंथ है, पहली शताब्दी ईस्वी के बाद ही लिखा गया था।

जबकि, ऊपर दिए गए सभी पुरातात्विक प्रमाण 100-200 ईसा पूर्व के हैं। यानी, भगवान श्रीराम का उल्लेख बौद्ध ग्रंथों के लिखे जाने से पहले ही हो चुका था। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि वाल्मीकि रामायण के राम पहले से ही प्रमाणित ऐतिहासिक पात्र थे, और बाद में बौद्धों ने उन्हें अपने बोधिसत्व चरित्र में सम्मिलित किया।

वाल्मीकि के राम बनाम बौद्ध जातकों के राम पंडित

अब यह प्रश्न उठ सकता है कि पुरातात्विक साक्ष्यों में अंकित राम, दशरथ जातक के राम पंडित भी हो सकते हैं। लेकिन यहां एक स्पष्ट अंतर सामने आता है—

वाल्मीकि के राम: एक पराक्रमी योद्धा, जो अस्त्र-शस्त्र धारण करते हैं और युद्ध कौशल में निपुण हैं।

बोधिसत्व राम पंडित (दशरथ जातक): पूर्ण रूप से अहिंसक, जो किसी भी प्रकार का अस्त्र-शस्त्र नहीं धारण करते।

पुरातात्विक साक्ष्यों में अंकित राम सभी जगह अस्त्र-शस्त्र (विशेष रूप से धनुष) के साथ दिखाए गए हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि ये मूर्तियां और सिक्के वाल्मीकि रामायण के श्रीराम के ही प्रमाण हैं, न कि बोधिसत्व राम पंडित के।

Bodhisattva Ram Pandit

निष्कर्ष :- रामायण के प्रमुख पात्र श्रीराम की ऐतिहासिकता को प्राचीन सिक्कों और मूर्तियों के आधार पर प्रमाणित किया जा सकता है।बौद्ध साहित्य त्रिपिटक पहली शताब्दी ईस्वी में लिखा गया, जबकि श्रीराम के उल्लेख इससे बहुत पहले के हैं।पुरातात्विक साक्ष्यों में अंकित राम अस्त्र-शस्त्र सहित हैं, जो वाल्मीकि रामायण के श्रीराम को ही इंगित करता है, न कि अहिंसक बोधिसत्व राम पंडित को।इसलिए, यह दावा कि वाल्मीकि के राम, दशरथ जातक के राम पंडित से प्रेरित हैं, केवल एक काल्पनिक तर्क है और ऐतिहासिक तथ्यों से कोई संबंध नहीं रखता।


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