मनुष्य प्रकृति पूजा में अग्नि, सूर्य, जल, पर्वत आदि बहुत पहले से पूजता आया है, क्योंकि वो इसका महत्व और प्राणी जगत के लिए महत्व जानता है। इसी के साथ एक और महत्वपूर्ण वस्तु है, वो है वृक्ष। वृक्ष भी प्राणी जगत चाहें शाकाहारी हो या मांसाहारी सबके ऊर्जा और भोजन का स्रोत है। वृक्ष वर्षा करने, भूमि का कटाव रोकने, जल और वातावरण को शुद्ध रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, शायद यही कारण है कि मनुष्य किसी न किसी रुप या कारण से वृक्षों की पूजा करता आ रहा है। ब्राह्मण ग्रंथों में वनस्पतै वा प्राणः कहकर वनस्पति के महत्व को स्वीकार किया है। भगवान श्री कृष्ण ने भी स्वयं को वृक्षों में पीपल कह कर उसकी श्रेष्ठता का प्रतिपादन किया है।

वेदों में अनेकों सुक्त वृक्षों की प्रशंसा में है।

उपनिषदों में भी वृक्षों के उदाहरणों द्वारा अध्यात्म और दर्शन की शिक्षा दी गई है –

पुराणों में कल्प वृक्ष और पारिजात जैसे सर्व सिद्धि और निधि दायक वृक्षों का उल्लेख है। बेसनगर में लक्ष्मी जी के प्रतीक स्वरुप कल्पतरु वृक्ष की प्रतिमा मिली है, जो कि २०० ईसापूर्व प्राचीन है। इस कल्पवृक्ष से शंख निधि, कार्षापण सिक्कों से भरी पोटली निकलती हुई दर्शायी गई है।

पंचमार्क विभिन्न कार्षापण सिक्के जो कि ६०० – २०० ईसापूर्व तक प्रचलन में रहे, उनमें वृक्षों (पारिजात, कल्पतरु) का अंकन है-

यहां वृक्ष से कुछ बिंदु नुमा आकृति दिखलाई है, जो कि सिक्के या फल का अंकन है।



ग्रंथों या मौर्य, शुंग, बुद्ध पूर्व ही नहीं बल्कि हड़प्पा सभ्यता में भी वृक्षों का अंकन मिलता है, जो कि यह दर्शाता है कि सिंधु सभ्यता में भी वृक्ष पूजा व वृक्षों का महत्व था। वृक्ष देवता के अंकन जगह जगह मुहरों पर है।



हिंदू धर्म के अलावा जैन और बौद्ध मत में भी वृक्ष पूजा या वृक्षों का महत्व दर्शाया है। बौद्ध मत में बोधिवृक्ष के रुप में वृक्ष पूजा द्वारा वृक्षों के महत्व को स्वीकार किया गया है। पूर्व से चली आ रही वृक्ष पूजा का ग्रहण बोधिवृक्ष मानकर बौद्धों ने किया है।


इस प्रकार हम देखते हैं कि भारत में वृक्ष पूजा हजारों हज़ारों वर्षों से निरन्तर चली आ रही है, इसके पीछे मुख्य ध्येय पर्यावरण संरक्षण और उसके ऋण को स्वीकार करना है। वास्तव में हमारे पूर्वजों ने वृक्षों की उपयोगिता, संरक्षण को जानकर ही उनके प्रति अपना सम्मान एक पूजा के माध्यम से व्यक्त किया है। ये सिंधु सभ्यता से लेकर आज तक निरन्तर चली रही है।
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