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क्या सती प्रथा वेदों से आई?

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वामपंथी विचार धारा के इतिहासहार अक्सर सती प्रथा को वेदों से जोड़ते हैं।उनका तर्क होता है कि सती प्रथा की उत्पत्ति वेदों से होती है। सती प्रथा को वेदों से जोड़ने का मकसद केवल यह होता है कि सती प्रथा हिन्दुओ की प्राचीन धार्मिक मान्यता है।इस लेख में हम केवल यह देखेंगे कि जो लोग यह तर्क देते हैं कि सती प्रथा वेदों से आई, उनके प्रमाण आखिर क्या है?और उनमें कितनी सत्यता है?

अंग्रेजी शब्दकोश में सती का अर्थ

अंग्रेजी शब्दकोश में सती का अर्थ देखने पर हमें वही अर्थ मिलते हैं जो पश्चिम देशों के लोग चाहते हैं, बिना किसी मूल रिफरेंस के इन सभी विदेशी शब्दकोशो में  सती का अर्थ, मृत पति के साथ पत्नी को जला देना बताया।इन सभी विदेशी शब्दकोशो ने सती को लेकर व्यापक रूप से झूठ फैलाया। यहां हम कुछ बड़े विदेशी शब्दकोशो में सती का अर्थ क्या बताया गया है उसकी स्क्रीनशॉट दे रहे हैं।(शब्दकोश क्रमशः मेरिएम,कोलिन, कैम्ब्रिज)

सती का अर्थ भारतीय स्त्रोत से

सती शब्द एक संस्कृत शब्द है।संस्कृत शब्दकोश में सती का अर्थ, गुणवान, अच्छी स्त्री, तपस्वी महिला,देवी दुर्गा आदि मिलता है। नीचे संस्कृत शब्दकोश की स्क्रीनशॉट देख सकते हैं।

Apte Practical Sanskrit-English Dictionary

सती शब्द कुमारसम्भव,शिवपुराण,मार्कंडेय पुराण,शाक्त सम्प्रदाय के ग्रंथों मे भी मिलता है।संस्कृत ग्रंथों के आधार पर सती का अर्थ देवी, भगवान शिव की पत्नी, गुणवान स्त्री, पवित्र, तपस्वी स्त्री आदि है। परंतु ऐसा अर्थ कहीं  नहीं मिलता जहां यह कहा गया हो कि पत्नी को मृत मृत पति के साथ जला दिया जाए।फिर भी विदेशी शब्दकोशो में यह अर्थ जानबूझकर डाला गया।

सती और विकिपीडिया
विकिपीडिया पर सती पर लेख प्रकाशित है। विकिपीडिया रोमिला थापर एवं आनंद ए यंग का हवाला देकर यह समाग्री प्रकाशित कि गई है  कि सती प्रथा  ऋग्वेद से आई।

विकिपीडिया पेज अंश

वेदों में सती प्रथा ढूंढने वाले के तर्क

ऋग्वेद के 10.18.7 एवं 10.18.8 एवं अथर्ववेद 18.3.1 का रिफरेंस देकर वामपंथी इतिहासकार यह साबित करतें हैं कि सती प्रथा वेदों से आई।
आइए सबसे पहले इस पर प्रसिद्ध इतिहासकार श्रीमती मिनाक्षी जैन क्या लिखती हैं वो देखते हैं।

मिनाक्षी जैन जी के अनुसार-
“ऋग्वेद के 10.18.7 एवं 10.18.8 के अर्थों को विकृत किया गया। 10.18.7 के अंतिम शब्द को अग्रे (पहले’, ‘पहला’) से बदलकर अग्नि, वाराणसी के सोलहवीं सदी के स्मृति लेखक रघुनंदन ने किया। 1795 में, एच.टी. कोलब्क, जो उस समय एक युवा विद्वान थे, ने एशियाटिक सोसाइटी के लिए अपना पहला पेपर, ऑन दे ड्यूटीन ऑफ ए फेथफल हिंदू विडों लिखा (एशियाटिक रिसर्च IV 1795: 205-15)। उन्होंने विधवाओं को जलाने की अनुमति देने के लिए ऋग्वेद  का हवाला दिया।”

Sati Evangelicals, Baptist Missionaries, And The Changing Colonial Discourse by Meenakshi Jain
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अथर्ववेद 18.3.1 एवं 18.3.2

ग्रिफिथ ने अर्थववेद के 18.3.1 के अनुवाद में “पति की दुनिया” वाक्यांश जोड़ दिया।ग्रिफिथ द्वारा  अनुवाद देखें 18.3.1

” स्त्री अपने पति की दुनिया चुनकर तुम्हारे निर्जीव शरीर के पास लेट जाती है। प्राचीन रीति-रिवाज को निष्ठापूर्वक निभाते हुए। इसे धन और संतान दोनों प्रदान करो।”

इस मंत्र में ‘पति की दुनिया चुनना’ शब्द का अर्थ यह लगाया गया कि पत्नी को कहा गया है कि वह अपने पति की दुनिया में अपने मृत पति के साथ मिल जाए। इसलिए पत्नी को अपने पति की चिता में जल जाना चाहिए।



इस मंत्र में पति की दुनिया का यह अर्थ नहीं है कि वह पति के चिता में जल जाए, आगे के मंत्र में स्पष्ट सलाह दी जा रही है कि आगे का जीवन में वह जाए। आइए मंत्र की सही व्याख्या समझते हैं

“स्त्री ने पहले ही अपने पति का संसार चुन लिया है। आज यह शव के पास बैठी है। अब इसे शेष जीवन के लिए धन और संतान प्रदान करें ताकि वह इस लोक में अपना जीवन जारी रख सके।”

इस तरह, यह मंत्र पति की मृत्य के बाद स्त्री को सांसारिक दुनिया में रहने की बात करता है। अथर्ववेद के अगले ही मंत्र 18.3.2 में यही सलाह वेदों के प्रमाण से प्रमाणित है। इसमें कहा गया है..

” उठो, जीवन के संसार में आओ, हे स्त्री, आओ, वह बेजान है जिसके पास तुम लेटी हो। इस के साथ तुम्हारा पति तुम्हारा भाग था जिसने तुम्हारा हाथ थामा और एक प्रेमी की तरह तुम्हें लुभाया”

यह ग्रिफिथ का ही अनुवाद है।

उपसंहार

तथ्यों के आधार पर यह  निष्कर्ष निकलता हैं कि सती प्रथा वैदिक युग में सामाजिक प्रथा नहीं थी और न ही इसकी उत्पत्ति वेदों से हुई थी। हिंदू धर्मशास्त्र सती प्रथा को दूर-दूर तक बढ़ावा नहीं देते हैं।


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