वामपंथी द्वारा सबसे बड़ा झूठ ये फैलाया जा रहा है कि नालंदा बख्तियार खिलजी ने नष्ट नहीं किया।नालंदा को ब्राम्हणो ने जलाया।बख्तियार खिलजी ने तो नालंदा को हाथ तक नहीं लगाया।
आइए अब आपको यहां ये बताते हैं कि वामपंथी जिन रिफरेंस को लेकर यह झूठ फैलाते हैं कि नालंदा ब्राम्हणो ने जलाया वो रिफरेंस कौन से हैं
• पहला रिफरेंस डी.एन झा का है।
• दूसरा बौद्ध भिक्षु तारानाथ की पुस्तक का है।
• और तीसरा सुंपा-खान-पो-येसे-पाल जोर द्वारा लिखी किताब “पग सैम जॉन जांग”।
अब हम सबसे पहले इन रिफरेंसो की पड़ताल करेंगे, और तथ्य के आधार पर इनका खंडन करेंगे।
डी.एन झा
डी एन झा ही थे जिन्होंने सबसे पहले ये दावा किया की नालंदा हिंदू कट्टरपंथीयो ने जलाई।डीएन झा ने सबसे पहले 2006 में भारतीय इतिहास कांग्रेस में अपने अध्यक्षीय भाषण में ब्राह्मण-बौद्ध संघर्ष की बात करते हुए नालंदा को हिंदू कट्टरपंथियों द्वारा जलाए जाने की बात प्रचारित किया था।बाद में वामपंथी पोर्टल करवां ने इसे एक लेख के रूप में” प्राचीन बौद्ध स्थलों का विनाश शीर्षक से प्रकाशित किया।इसके बाद अनेक वामपंथी इसी बात को बार बार दोहराने लगे की नालंदा को ब्राम्हणो ने जलाया, और इस तरह वामपंथी बश्तियार खिलजी का बचाव करने लगे।
कौन है, डी एन झा
आइए सबसे पहले जानते है कौन है ये डीएन झा कौन है।1940 में इनका जन्म हुआ और 2021 में इनकी मृत्यु हो गई।डी.एन. झा उन चार इतिहासकारों में से एक थे जिन्होंने ‘रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिदः ए हिस्टॉरियन्स रिपोर्ट टू द नेशन’ रिपोर्ट तैयार की और अपनी इस रिपोर्ट में उन्होंने यह लिखा कि बाबरी की जगह कोई मंदिर नहीं थी।राम मंदिर पर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उन्होंने बीबीसी को दिए एक साक्षात्कार में कोर्ट के फैसले को निराशाजनक बताया था।सुप्रीम कोर्ट का फैसला राम मंदिर के पक्ष में आने के बाद डीएन झा ने बीबीसी से कहा था, “इसमें हिंदुओं की आस्था को अहमियत दी गई है।अपनी किताब ‘द मिथ ऑफ़ होली काउ’ में उन्होंने साबित किया कि प्राचीन भारत में गोमास खाया जाता था। भारत में कभी कोई स्वर्ण युग नहीं था। प्राचीन भारत में मजबूत जाति व्यवस्था थी।
रीथिन्किंग हंदु आइडेन्टिडी’ नाम से लिखी गई उनकी यह किताब काफी पढ़ी गई थी।इसमें उन्होंने लिखा था कि हिंदु धर्म दूसरे धमों की अपेक्षा नया है और इसे असहिष्णु कहना मिथक होगा।गैर-ब्राह्मणों पर सामाजिक, कानूनी और आर्थिक रूप से पंगु बनाने वाली कई पाबंदियां लगाई जाती थीं। खास तौर से शूद्र या अछूत इसके शिकार थे। इसकी वजह से प्राचीन भारतीय समाज में काफी तनातनी रहती थी।
मुगलों के दौर में संस्कृत वाली संस्कृति खूब फली फूली।
अतः आप देख सकते हैं कि डीएन झा ने सदैव हिंदू और हिंदू संस्कृति के खिलाफ ही लिखा और मुस्लिम आक्रमणकारी को क्लीन चिट देते रहे। भारत में ऐसा काम वामपंथी के लिए कोई नया नहीं है। हमने आपको डीएन झा के बारे में बताया, अब आप समझ सकते हैं कि नालंदा पर डीएन झा ने बख्तियार खिलजी को क्यों क्लीन चिट दी ? और इसका दोषी हिंदूओ को क्यों बना दिया।
नालंदा पर डीएन झा के दावों का खंडन
डीएन झा ने नालंदा के बौद्ध विहार के विनाश के बारे में लिखा है कि, “एक तिब्बती परंपरा में कहा गया है कि कलचूरी राजा कर्ण (11 वीं शताब्दी) ने मगध में कई बौद्ध मंदिरों और मठों को नष्ट किया था, और तिब्बती ग्रन्थ ‘पैग सैम जॉन जाग’ में कुछ ‘हिंदू कट्टरपंथियों द्वारा नालंदा के पुस्तकालय को जलाने का उल्लेख किया गया है।”
डीएन झा ने अपनी इस बात का रिफरेंस लेखक बी. एन. एस. यादव की पुस्तक “सोसाइटी एंड कल्चर इन नॉर्दर्न इंडिया इन व ट्वेल्थ सेंचुरी” से दिया।डीएन झा ने यादव की किताब को आधार बनाते हुए पहले भाग में लिखा था, “एक तिब्बती परंपरा में कहा गया है कि कलपूरी राजा कर्ण (11 वी शताब्दी) ने मगच में कई बौद्ध मंदिरों और मठों को नष्ट किया था।
अब आइए देखें कि यादव ने क्या लिखा था।
यादव लिखते हैं-
“इसके अलावा, तिब्बती परंपरा हमें सूचित करती है कि कलचूरी कर्ण (11वीं शताब्दी) ने मगध में कई बौद्ध मंदिरों और मठों को नष्ट कर दिया,यह कहना बहुत मुश्किल है कि यह विवरण कितना सही हो सकता है।”
लगभग शब्द दर शब्द समान, लेकिन, झा ने यादव की अगली पक्ति को छोड़ दिया जिसमें लिखा है कि “यह कहना बहुत मुश्किल है कि यह विवरण कितना सही हो सकता है।” झा ने इसका जिक्र क्यों नहीं किया?
झा के कथन का दूसरा भाग था, “तिब्बती ग्रन्थ ‘पैग सैम जॉन जांग’ में कुछ ‘हिंदू कट्टरपंथियों द्वारा नालंदा के पुस्तकालय को जलाने का उल्लेख किया गया है।”
इसपर यादव ने जो लिखा है उसे बहुत ध्यान से पढ़ें। वे लिखते हैं, “तिब्बती ग्रंथ पैग सैम जॉन जांग में कुछ हिंदू कट्टरपंथियों द्वारा नालंदा के पुस्तकालय को जलाने की एक संदिग्ध परंपरा है।”
झा यादव को शब्द-दर-शब्द वोहराते हैं, लेकिन “संदिग्ध” शब्द हटा देते हैं।
झा ने “हिंदू कट्टरपंथियों” शब्द को कोटेशन में इसलिए लिखा ताकि जताया जा सके कि यह मूल लेखक द्वारा इस्तेमाल किया गया शब्द है,जबकि वह उनके मार्क्सवादी मित्र यादव की खोज है। यादव ने जिस तिब्बती ग्रंथ को अपना आधार रिफरेंस बनाया उस तिब्बती ग्रंथ में केवल दो गैर-बौद्ध भिक्षुओं का जिक्र है, जिन्हें यादव ने पता नहीं कैसे न केवल हिंदू बल्कि हिंदू कट्टरपंथियों के रूप में पढ़ा और फिर झा ने यादव को उद्धृत कर दिया।
साथ ही ध्यान देने वाली बात है कि ये ही वामपंथी कहते हैं कि हिंदू शब्द नया है फिर अब इसे तिब्बती ग्रंथ में दिखा रहे हैं।
साथ ही ध्यान देने वाली बात है कि कट्टरपंथी जैसे शब्द किसी तिब्बती ग्रंथ में हो ही नहीं सकते, फिर भी यादव ने कट्टरपंथी शब्द लिखा वो भी तिब्बती ग्रंथ का रिफेरेंस देकर, और फिर यादव को कोट करके झा ने भी ये झूठ परोसा।डीएन झा ने कोई भी समकालीन रिफेरेंस नहीं दिया।डीएन झा ने किसी भी प्राथमिक सोर्स का उल्लेख नहीं किया।डीएन झा ने अपने ही वामपंथी मित्र यादव को कोट करके नालंदा जलाने का दोष कट्टरपंथी हिंदू को बना दिया।जिस यादव को कोट झा ने किया, वो यादव ने भी एक तिब्बती ग्रंथ को आधार बनाया, यह तिब्बती ग्रंथ का नाम सुमपा खानपो की पैग सैम जॉन जांग है, और यह ग्रंथ भी कोई समकालीन नहीं, बल्कि नालंदा के 500 वर्ष बाद की है।साथ ही इस तिब्बती ग्रंथ में घटना का उल्लेख चमत्कार के रूप में किया गया है।
तिब्बती ग्रंथ सुमपा खानपो की पैग सैम जॉन जांग में क्या लिखा है, आइए अब ये जानते है
बी एन एस यादव ने जिस तिब्बती ग्रंथ को आधार मानकर नालंदा पर जो लिखा आइए देखते हैं कि इस तिब्बती ग्रंथ में लिखा क्या है, क्यों कि डीएन झा ने यादव का ही रिफरेंस दिया है।
तिब्बती ग्रंथ में लिखा है काकुलसिता द्वारा एक मंदिर निर्माण के उत्सव के दौरान, कुछ शरारती भिक्षुओं ने दो गैर-बौद्ध भिक्षुओं पर (बर्तन) धोने के पानी के छींटे डाले और दोनों को दरवाजे की चौखट के बीच में दबा दिया। इससे क्रोधित होकर, एक (भिक्षु) जो उस दूसरे भिक्षु का सेवक था।जिसने सूर्य की सिद्धि प्राप्त करने के लिए 12 साल तक एक गहरे गड्ढे में बैठकर तपस्या की थी। सिद्धि प्राप्त करने के बाद, उसने अग्नि पूजा की राख को 84 बौद्ध मंदिरों पर फेंक दिया।सिद्धि मंत्र से राख से चमत्कारी राख उत्पन्न हुई और 84 बौद्ध मंदिर सहित नलेन्द्र के शास्त्रो को आश्रय देने वाले तीन धर्मगंजों में भी आग लग गई।नौवीं मंजिल पर रखे गुहासमाज और प्रज्ञापारमिता ग्रन्थों से पानी की धाराएं चलने लगी इससे कुछ शास्त्र बच गये।

तिब्बती ग्रंथ सुमपा खानपो की पैग सैम जॉन जांग के अनुवाद को लेकर वामपंथीयो का खेल
पैग सैम जीन जैग का पहला अंग्रेजी अनुवाद “शरत चंद्र दास द्वारा किया गया था, जो 1908 में प्रकाशित हुआ था।यह जानना महत्वपूर्ण है कि इसका अंग्रेजी अनुवाद मैकाले मिशन के अंतर्गत ब्रिटिश सरकार ने कराया।अनुवादित संस्करण का पहला पृष्ठ देखेंगे तो पाता होगा।एससी दास एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल के एसोसिएट सदस्य भी थे।यही समाज जिसने विभिन्न हिंदू ग्रंथों की गलत व्याख्या करने और आर्य आक्रमण मिथक के संबंध में अनेक झूठ फैलाया।
Pam Sam Jan Zong, translation sc das 1908, index

यहां एससी दास ने अपने मन से इंडेक्स में तिरथिका शब्द का अर्थ हिंदू बता दिया। बिना किसी आधार के फिर इसी शब्द के आधार पर बीएनएस यादव ने अपनी किताब में इसी इंडेक्स का रिफेरेंस लिख के अपनी बात लिख दी,और फिर डीएन झा ने यादव का रिफेरेंस देकर कुछ अपने मन से जोडकर नालंदा में भ्रामक जानकारी दी। आप देख सकते हैं ये वामपंथी इतिहासकार के अनुवादित किताब के इंडेक्स के आधार पर अपना इतिहास लिख दिया। ध्यान देने वाली बात यह है कि इस किताब का पूरा अंग्रेजी अनुवाद आज तक नहीं हुआ है केवल इस किताब के इंडेक्स का अनुवाद हुआ है। केवल इंडेक्स के आधार पर डीएन झा तक झूठ परोसा।

तिब्बती ग्रंथ सुमपा खानपो की पैग सैम जॉन जांग पर निष्कर्ष
इस पुस्तक में कहीं भी हिंदू कट्टरपंथी का कोई जिक्र नहीं।इस पुस्तक का लेखक कभी भारत नहीं आया।पूरा प्रकरण आपसी कलह का है।इसी किताब में चाणक्य का उल्लेख है, तब वामपंथी इस किताब को नहीं मानेंगे और चाणक्य को काल्पनिक बोलेंगे।इस किताब में लिखी पूरी घटना चमत्कारी है, जैसे मंत्र से राख में आग उत्पन्न होना किताबों से पानी का निकलना, क्या ये घटना वैज्ञानिक रूप से मानी जा सकती है?
इस पुस्तक में हवन या यज्ञ शब्द नहीं है। यहां स्बिन स्रेग शब्द है, जिसे वामपंथी हवन या यज्ञ बता रहे हैं।स्बिन स्रेग वैदिक यज्ञ है इसके कोई सबूत नहीं।इस पुस्तक में पूरी तरह से एक अविश्वसनीय कथा है जिसके आधार पर वामपंथी इतिहासकार हिंदू धर्म को शर्मसार करने और नालंदा में हुई इस्लामिक बर्बरता को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं।कोई भी थोड़ा सा विमाग रखने वाला व्यक्ति, वामपंथी इतिहासकारों द्वारा अपने झूठ को स्थापित करने के लिए अपनी बात को सिद्ध करने के लिए सिद्धि प्राप्ति राख से मंत्र द्वारा आग का उत्पन होना किताबों से पानी निकलना और स्वतः आत्मदाह जैसे चमत्कारों पर कैसे भरोसा कर सकता है?
सोचने वाली बात है कि क्या वे इतिहासकार डीएन झा के ऐतिहासिक शोध का स्तर है? जिसके आधार पर वे भारतीय इतिहास कांग्रेस के अध्यक्ष रहते हुए इतने बड़े दावे कर चुके हैं?
डीएन झा पर निष्कर्ष
डीएन झा ने कोई भी समकालीन प्रमाण नहीं दिया।डीएन झा ने यादव को कोट किया ,पर यादव के भी कई शब्द से छेड़खानी कि, जैसे संदिग्ध शब्द छोड़ दिया ।
और “यह कहना बहुत मुश्किल है कि यह विवरण कितना सही हो सकता है।” वाक्य को छोड़ दिया।
डीएन झा ने यादव की किताब को सोर्स माना और यादव ने जिस तिब्बती ग्रंथ को सोर्स माना वो समकालीन नहीं है और पूरी तरह से चमत्कारी घटना पर आधारित है। जैसे ही हिंदू कट्टरपंथी जैसे शब्द यादव ने अपने मन से डाल दिया।अतः सिद्ध होता है डीएन झा नालंदा पर दावा पूरी तरह झूठा है।
तारानाथ की पुस्तक का रिफेरेंस कितना सही है
एक और पुस्तक है जिसका रिफरेंस लगातार वामपंथी द्वारा देकर वे सिद्ध करने का प्रयास किया जा रहा है कि नालंदा ब्राम्हणो ने जलाई आइए इस किताब की सच्चाई जानते हैं।सबसे पहली बात यह किताब कोई समकालीन नहीं है, यह किताब नालंदा नष्ट होने के 500 से 700 वर्ष बाद लिखि गई।इस किताब के लेखक तारानाथ बौद्ध भिक्षु कभी भारत नहीं आया।इस किताब में भी पूरी घटना चमत्कारी है जैसे तिब्बती ग्रंथ पैग सैम जॉन जांग में लिखा है।
इस ग्रंथ में भी लिखा है कि अग्नि पूजा की राख चारों तरफ बिखेर दिया, मंत्र सिद्धि से राख में चमत्कारिक आग उत्पन्न हुई और आठ बौद्ध मंदिर जल गई। वो किताबों से पानी निकलने लगा जिससे कुछ शास्त्र बच गए। ऐसे चमत्कारी घटना को एतिहासिक रिफरेंस नहीं माना जा सकता।ये विज्ञान और साइंस टिफिक टेम्परामेंट के खिलाफ है।अतः इसका खंडन हो जाता है।

यहां ध्यान देने वाली बात है तारानाथ की पुस्तक में “स्बिन स्रेग” शब्द है।जिसे वामपंथी हवन या यज्ञ बता रहे हैं। जबकि ये तिब्बती बुद्धिज्म की एक अग्नि पूजा की पद्धति है जो होम या हवन की तरह है। पर स्बिन स्रेग वैदिक यज्ञ है इसका कोई सबूत नहीं।

तारानाथ की किताब पर कुछ अन्य महत्वपूर्ण बातें
नालंदा को जादू टोना और राख से जलाने के लिए तारानाथ ने दो तीर्थिकों का उल्लेख किया है।इस पुस्तक को विश्वसनीय नहीं माना जा सकता क्योंकि एक तो यह नालंदा विध्वंस के बहुत बाद का है।दूसरा यह चमत्कार और अतिशोक्ति युक्त विवरण है।जब चाणक्य के प्रमाण की बात थी तो इन्होने महावंस को यह कह कर नकार दिया कि ये मौर्यकाल के बहुत बाद का है। जबकि महावंस भी भारतीय न होकर लंका का ग्रंथ है।जब 600 साल बाद का महावंस प्रमाण नहीं है तो तारानाथ किसी घटना के लिए कैसे प्रमाण हो गया 600 700 साल बाद?
हालांकि यहां तारानाथ द्वारा वर्णित घटना पूरी चमत्कारिक और अंधविश्वास से भरकर है किंतु तारानाथ ने अपने मूल ग्रंथ में वहां ब्राह्मण नहीं लिखा है बल्कि तीर्थिक लिखा है।जबकि तारानाथ ने अपनी इसी पुस्तक में अन्य जगह ब्राह्मण को ब्राह्मण ही लिखा है।और तीर्थिक को अलग बताया है।

जैसे कि यहां एक बौद्ध भिक्षु द्वारा ब्राह्मण और तीर्थिकों को बौद्ध में बदलने का उल्लेख है।यहां तारानाथ ने दोनों को अलग लिखा है।

यहां भी निगंठ, ब्राह्मण, तीर्थिक को अलग लिखा है।
बौद्ध ग्रंथों में भी तीर्थिक अलग पहचान है।

यदि तारानाथ का तात्पर्य ब्राह्मण से होता तो वे ब्राह्मण लिखते, न कि तीर्थिक।
तारानाथ की पुस्तक में तीर्थिक और बाम्हण शब्द दोनों है


स्वयं तारानाथ ने पर्सियन राजा द्वारा तुर्क सेना के सहयोग से नालंदा विध्वंस को इसी किताब के 19 वें अध्याय में लिखा है

तारानाथ की पुस्तक में चाणक्य का उल्लेख

तारानाथ की ही पुस्तक में लिखा है नालंदा का पुननिर्माण बाम्हण ने कराया और बाम्हण ने गरुण स्तंभ बनवाया

तारा नाथ की पुस्तक पर निष्कर्ष
•तारानाथ की पुस्तक और सुमपा खानपो की पैग सम जान जंग दोनों का खंडन हमने यहां किया।दोनो समकालीन नहीं और चमत्कारी घटना पर आधारित है।ये दोनों पुस्तक ही है जिनका आधार लेकर वामपंथी बख्तियार खिलजी का बचाव कर के, नालंदा का दोषी हिंदूओ को बना रहे हैं।डीएन झा से लेकर आज के नए वामपंथी भी इन्हीं पुस्तकों को अपने प्रोपोगेंडा का आधार बना कर ये झूठ फैला रहे हैं कि नालंदा ब्राम्हणो ने जलाया।जबकि ऐसी चमत्कारी पुस्तक के घटना को एतिहासिक मानना गलत है और साथ ही ये विज्ञान और साइस टिफिक टेम्परामेंट के खिलाफ है।अगर इस पुस्तक को प्रमाण माना जाए तो इसी पुस्तक से प्रमाणित होता है कि पर्शियन राजा की सहयोग से तुर्क सेना नालंदा को विध्वंस किया।
और यह भी प्रमाणित होता है कि तीर्थिक और बाम्हण अलग है।यह भी प्रमाणित होता है कि नालंदा का पुननिर्माण बाम्हण ने कराया साथ ही गरूड़ स्तंभ का निर्माण भी बाम्हण ने ही किया।यह भी सिद्ध होता है कि चाणक्य एक ऐतिहासिक पात्र हैं।अत इन दोनों पुस्तक सिद्ध नहीं होता की नालंदा ब्राम्हण ने जलाया।
नालंदा खिलजी ने जलाया इसका समकालीन प्रमाण
वामपंथी नालंदा विषय पर समकालीन प्रमाण से भागते रहे और नवीन किताबो में लिखी बातों को तोड़ मरोड़ कर पेश करते हैं।
आइए अब हम आपको समकालीन प्रमाण से बताते हैं कि नालंदा को खिलजी ने ही जलाया था
तबकात-ए-नासिरी (समकालीन प्रमाण)
नालंदा के विनाश के बारे में समकालीन मौलाना मिन्हाज-उद-दीन की तबकात-ए-नासिरी को आधार बनाया, तबकात-ए-नासिरी में स्पष्टतः उल्लेख है कि नालंदा को बख्तियार खिलजी द्वारा जलाया और नष्ट किया गया था। इसमें उल्लेख है कि बख्तियार खिलजी 200 घोड़ों के घुड़सवार दल के साथ आया, नालंदा पर हमला किया और स्थानीय ब्राह्मणों को उसने मार डाला।
तबकात-ए-नासिरी अंश
“जब यह जीत हुई, मुहम्मद-ए-बख्तियार लूट के बड़े माल के साथ लौटा, और सुल्तान कुतुब-उद-दीन एबक के दरबार में आया, जहाँ उसे बहुत सम्मान और गौरव प्राप्त हुआ… इतना कि दरबार के अन्य रईसों को उससे जलन होने लगी”

इतना साफ समकालीन प्रमाण होने के बाद भी वामपंथी इस समकालीन प्रमाण को नजरंदाज करते हैं, और नवीन किताबो को प्रमाण के रूप में अपने हिसाब से रखतें हैं।कुछ वामपंथी तबकात-ए-नासिरी से पल्ला यह कहकर झाडते है की वहां नालंदा नहीं बल्कि ओदंतपुरी विहार का जिक्र है जिसे किला समझकर खिलजी ने हमला किया, जबकि इस बात का उनके पास कोई प्रमाण नहीं, सिर्फ उनकी ये मनगढंत बातें हैं।
अब धर्म स्वामी की जीवनी के अंश देखते हैं
तिब्बती बौद्ध भिक्षु धर्मस्वामिन (1235 ई.) द्वारा की गई है, जिन्होंने खिलजी के विनाश के कुछ वर्षों बाद नालंदा और बिहार का दौरा किया था। उन्होंने हिंदुओं द्वारा बौद्ध भिक्षुओं को दान देने और जयदेव नामक ब्राह्मण द्वारा नालंदा के अंतिम बौद्ध मठाधीश को मुस्लिम हमले से बचाने का वर्णन किया है।

धर्म स्वामी के जीवनी का अंश
तिरहुत के हिंदू राजा रामसिंह ने धर्मस्वामी से अपना पुरोहित बनने के लिए कहा। और जब उन्होंने मना कर दिया, तब भी हिंदू राजा ने उन्हें सम्मानपूर्वक बहुमूल्य उपहारों से नवाजा। यह हिंदुओं का असली चेहरा था, जो बहस और संघर्ष के बावजूद बौद्धों के साथ सौहार्दपूर्वक रहते थे।धर्म स्वामी 1234 में भारत आए तो वो नालंदा भी आए, नालंदा पर आक्रमण होने के मात्र 40 वर्ष बाद नालंदा आए।स्वयं धर्मस्वामी ने वर्णन किया है कि, कैसे नालंदा महाविहार पर सतत मुस्लिम तुर्क आक्रमण का खतरा बना हुआ था।
जिस समय धर्मस्वामी नालंदा में थे, उस समय नालंदा महाविहार के आचार्य को सूचना मिली कि नालंदा से लगभग 10 किलोमीटर दूर तुर्की सेना डेरा जमाए हुए है और वह नालंदा पर बहुत बड़ा आक्रमण करने वाली है। यह जानकर धर्मस्वामी अपने गुरु को अपनी पीठ पर लादकर सुरक्षित स्थान पर ले जाते हैं। इसलिए यह कहना कि नालंदा के पतन में मुस्लिम सेनाओं के आक्रमण की कोई भूमिका नहीं थी, यह पूर्णतः अनैतिहासिक होगा।

धर्म स्वामी ने स्पष्ट लिखा कि नालंदा को विध्वंस तुकों ने किया

तुर्कों ने मंदिर तोड़े मुर्तिया तोड़ी


तरूष्का के लिए तिब्बती में Gar log प्रयोग होता है


अन्य प्रमाण
1.इलियट और डॉसन
इलियट और डॉसन की पुस्तक “द हिस्ट्री ऑफ इंडिया, खंड ।।” में अपने तबाकत ई नसीरी के अनुवाद में लिखते हैं कि खिलजी ने विश्वविद्यालय को नष्ट कर दिया और सभी ब्राह्मणों (भिक्षुओं) को मार डाला। पुस्तकालय में तोडफोड की गई क्योंकि वहां कोई इस्लामी पाठ नहीं था
2.Will durant
Will Durant ने अपनी पुस्तक “आवर ओरिएंटल हेरिटेज में स्पष्ट रूप से कहा है कि “मुहम्मदों ने 1197 में नालंदा को जला दिया, और उसके सभी भिक्षुओं को मार डाला गया; इन कट्टरपंथियों ने जो कुछ भी बचाया उससे हम प्राचीन भारत के प्रचुर जीवन का कभी अनुमान नहीं लगा सकते।”

3.Vincent Smith
Vincent Smith ने भी लिखा की मुस्लिम आक्रमणकारी ने बौद्ध मठों पुस्तकालय को नष्ट किया, बौद्ध भिक्षु की हत्या की Vincent Smith को स्वयं अम्बेडकर कोट करते हैं। रिफेरेंस ambedkar speech writing vol 3

4.अमर्त्यसेन, नोबेल प्राइज विजेता
यहां तक कि वामपंथी झुकाव वाले अमर्त्यसेन भी इस बात से सहमत हैं कि बख्तियार खिलजी ने 1190 के दशक में नालंदा विश्वविद्यालय को नष्ट कर दिया था। पूरे परिसर में फैली बुद्ध की खूबसूरत मूर्तियों को तोड़ दी गयी 9 मंजिला लाइब्रेरी 3 दिनों तक जलती रही।

5.डॉ अम्बेडकर
बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर ने भी लिखा की नालंदा मुस्लिम आक्रमणकारी नष्ट किया।
“मुसलमान आक्रमणकारियों ने जिन बौद्ध विश्वविद्यालयों को लूटा, इनमें कुछ नाम नालंदा, विक्रमशिला, जगद्दल, ओदंतपूरी के विश्वविद्यालय हैं। उन्होंने बौद्ध मठों को भी तहस-नहस कर दिया, जो सारे देश में स्थित थे। हजारों की संख्या में भिक्षु भारत से बाहर भागकर नेपाल, तिब्बत और कई स्थानों में चले गए। मुसलमान सेनापतियों ने बहुत बड़ी संख्या में भिक्षुओं को मौत के घाट उतार दिया।”
संदर्भ – डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण वाड्मय हिंदी खंड 7 पेज नंबर 95
-डॉ. बी. आर. अम्बेडकर

उपसंहार
आप देख सकते है नालंदा पर पहले वामपंथी ने ये कहा कि नालंदा हिंदू कट्टरपंथी ने नष्ट किया।और अभी ये वामपंथी हिंदू कट्टरपंथी शब्द की जगह ब्राम्हण शब्द का उपयोग करते हुए कहा रहे हैं कि नालंदा को ब्राम्हण ने नष्ट किया ।हिंदू कट्टरपंथी की जगह अब,ब्राम्हण शब्द का उपयोग करने की मंशा यह है कि वामपंथी मुस्लिम के साथ ही बामसेफ जैसे संगठनों का समर्थन चाहते है ताकि हिंदू समाज को थोड़ा जा सके साथ ही दलितों को हिन्दू समाज के खिलाफ उपयोग किया जा सके।आप देख सकते हैं कल तक जो बाबा साहेब को मानने की बात कर रहे थे और खुद को दलित बहुजन मूलनिवासी बता रहे थे, अचानक से बाबा की नालंदा पर लिखे को मानने से इंकार कर रहे है, और ये ब्राम्हण वामपथी इतिहासकार के झूठ को मान रहे हे है ।इससे साबित होता है कि ये लोग दलित बहुजन मूलनिवासी नाम पर छिपे बामपंथी है।वरना बख्तियार खिलजी दलितो का क्या लगता है ? कौन सा दलितों के लिए कार्य किया जो बख्तियार को डिफेंड करने के लिए बाबा साहेब को नकार दें। निश्चित ही ये सब वामपंथी है।



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